कुदरत रखती है आपको सेहतमंद

प्रकृति
    • Author, फ़ियोना मैकडोनल्ड
    • पदनाम, बीबीसी कल्चर
  • प्रकाशित

हम आज तरक़्क़ी पसंद हो गए हैं. बुलंद इमारतों में रहना हमें अच्छा लगने लगा है.

इन इमारतों की तामीर के लिए हम धड़ाधड़ जंगल काट रहे हैं, ये ख़्याल किए बग़ैर कि हम ख़ुद को क़ुदरत से कितना दूर करते जा रहे हैं.

वो क़ुदरत जो हमरे वजूद को बनाए रखने के लिए ज़रूरी है.

हाल ही में बहुत से रिसर्च किए गए और ये पाया गया कि जो लोग प्रकृति के नज़दीक रहते हैं, वो बीमार कम पड़ते हैं.

उन्हें तनाव की शिकायत भी नहीं होती.

प्रोफेसर रोजर अलरिज ने बहुत से ऐसे मरीज़ों की मेडिकल रिपोर्ट का अध्ययन किया जिनके पित्ताशय या गाल ब्लैडर का ऑपरेशन हुआ था.

अपनी रिसर्च में उन्होंने पाया कि ऑपरेशन के बाद जिन मरीज़ों को ऐसे वॉर्ड में रखा गया था जहां से वो क़ुदरत का नज़ारा कर सकते थे, मतलब पेड़ पौधे, परिंदे और खुला आसमान देख सकते थे, वो जल्दी ठीक हुए.

उन्हें कम दवाओं की ज़रूरत पड़ी. इनके मुक़ाबले, बंद ठिकानों में रखे गए मरीज़ों को ठीक होने में ज़्यादा वक़्त लगा.

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ऐसी ही बातें हमें बताने, समझाने की कोशिश कुछ लोग कर रहे हैं.

वो क़ुदरत के नज़दीक जाने से हुए फ़ायदों के अपने तजुर्बे क़िताबों के ज़रिए हमसे बांट रहे हैं.

ब्रिटेन के माइकल मैकार्थी इन्हीं लेखकों में से एक हैं.

उनकी क़िताब 'द मॉथ स्नोस्टॉर्म' हाल ही में वेनराइट पुरस्कार की दौड़ में शामिल की गई है. ये पुरस्कार उन लोगों को दिया जाता है, क़ुदरत से जुड़े तजुर्बों के बारे में लिखते हैं.

'द मॉथ स्नोस्टॉर्म' में माइकल ने अपने बचपन के अनुभव लोगों से साझा किए हैं.

वो बताते हैं कि सात बरस की उम्र में उनकी मां गंभीर रूप से बीमार हो गईं थीं.

अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी वो तिल-तिलकर मर रही थीं.

उस बेहद मुश्किल दौर में उन्हें क़ुदरत से सहारा मिला था.

वो अपने पड़ोसी के बाग़ीचे में आने वाली तितलियों को गिना करती थीं. उनसे बातें करती थीं.

प्रकृति से बातचीत के ऐसे तजुर्बे लिखने वाले माइकल अकेले नहीं.

पश्चिमी देशों में इन दिनों ऐसी क़िताबें लिखने का चलन ज़ोर पकड़ रहा है. ऐसी ही क़िताब लिखी है कैथरीन नॉरबरी ने.

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जिन्होंने 'द फ़िश लैडर' में एक नदी के साथ-साथ अपना सफ़र बयां किया है.

कैथरीन भी उस वक़्त बेहद मुश्किल दौर से गुज़र रही थीं.

इसी तरह एमी लिपट्रॉट नाम की महिला ने 'द आउटरन' नाम की क़िताब में अपने गांव वापसी का तजुर्बा हमसे बांटा है.

एमी उस वक़्त शराबनोशी की आदत से जूझ रही थीं. ऐसी और भी बहुत सी क़िताबें लिखी जा रही हैं.

असल में ये चलन साल 2008 से शुरू हुआ था.

वेनराइट पुरस्कार के जज बिल लायंस कहते हैं कि ये 'न्यू नेचर राइटिंग' है.

इसमें लोग अपने निजी अनुभव को प्रकृति के बीच गुज़ारे जाने वाले वक़्त से जोड़कर देख रहे हैं.

इनमें से ज़्यादातर लोगों ने क़ुदरत के क़रीब जाने का मौ़क़ा तब निकाला जब वो ज़िंदगी की एक बड़ी चुनौती का सामना कर रहे थे.

ऐसे में राहत के लिए वो प्रकृति के पास गए. शहरों में ज़िंदगी की रफ़्तार बहुत तेज़ है.

किसी और की तो क्या ही बात की जाए यहां इंसान के पास खुद अपने लिए वक्त नहीं.

अपनी ज़रूरतों को पूरा करने की जंग दिन रात लड़ी जाती है.

वो ये जान ही नहीं पाता कि ख़ुद उस के अंदर क्या छुपा है.

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वो इन मशीनी कामों के अलावा भी और क्या कुछ कर सकता है.

इसीलिए खुद की तलाश में कुछ लोग आबादी से दूर पेड़ पौधों, पहाड़ों, समंदर के नज़दीक जाते हैं.

रिश्तों की कड़वाहट, टूटते रिश्तों का दर्द, अपनी तमाम परेशानियां क़ुदरत की गोद में जाकर डाल देते हैं.

एमी लिपट्रॉट की कहानी कुछ ऐसी ही है.

अपनी क़िताब 'द आउटरन' में वो लिखती हैं कि जब वो अपने गांव ओर्कने में रहती थीं, तो हमेशा वहां से निकल भागने के ख़्वाब सजाती थीं.

लेकिन, लंदन आने के बाद उन्हें शिद्दत से उस माहौल की कमी महसूस हुई.

शोर-गुल के बीच एमी को ओर्कने में समंदर का शांत किनारा याद आने लगा.

वो किनारे से टकराने वाली लहरों को गिनने के लिए बेताब हो गईं.

अपनी इसी बेताबी और ओर्कने वापस आकर उसे नए नज़रिए से देखने का क़िस्सा एमी ने इस क़िताब में बख़ूबी बयां किया है.

वैसे क़ुदरत की ख़ूबसूरती बयां करने का ये सिलसिला नया नहीं.

अंग्रेज़ी साहित्य में पी बी शैली से लेकर विलियम वर्ड्सवर्थ तक सबने नेचर की ख़ूबसूरती को अपने शब्दों में उकेरा है.

माइकल मैकार्थी कहते हैं अमरीकी साहित्य में भी इसकी कई मिसालें मिलती हैं.

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जैसे कि उन्नीसवीं सदी में रैल्फ़ वाल्डो एमर्सन या फिर हेनरी डेविड थोराऊ ने क़ुदरती नज़ारों को लफ़्ज़ों में बख़ूबी उकेरा था.

उन्नीसवीं सदी में ही अमरीका के जॉर्ज पर्किंस मार्श ने ये भी लिखा था कि इंसान ही क़ुदरत का सबसे बड़ा दुश्मन है.

जहां जाता है क़ुदरती चीज़ों को नुक़सान ही पहुंचाता है.

आज हम जो क्लाइमेट चेंज या फिर ग्लोबल वार्मिंग जैसे मसलों से दो-चार हैं, ये हमारी ही देन हैं.

अगर हम क़ुदरत से दिल का रिश्ता बनाए रखते, उसे अहमियत देते तो, हालात इतने बुरे भी नहीं होते.

माइकल मैकार्थी, एमी लिपट्रॉट और कैथरीन जैसे लेखक अब ये मानते हैं कि नेचर से नज़दीकी बढ़ाने की कोशिशें फिर से तेज़ हुई हैं.

लोग समंदर किनारे ज्वार-भाटा देखने जा रहे हैं. कुछ लोग नेचर वॉकिंग करने जाते हैं.

किसी को खुले आसमान तले बैठकर तारे गिनना पसंद है.

ऐसे में उनकी क़िताबों से लोगों को प्राकृतिक माहौल को बनाए रखने की कोशिश करने का हौसला मिलेगा.

वैसे, सभी लोग इससे इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते.

अमरीकी पर्यावरणविद मार्क कॉकर कहते हैं कि क़ुदरत के बारे में क़िताब लिखकर लोग समझते हैं कि उन्होंने अपनी ज़िम्मेदारी पूरी कर ली है.

जबकि हमारे आस-पास का माहौल, देहाती इलाक़ों की बसावट बिगड़ती जा रही है.

सिर्फ़ क़िताबें लिख देने से वो सही नहीं होगा. ऐसे में तो हालात और भी बुरे हो जाएंगे.

लेकिन, मैकार्थी कहते हैं कि कुछ न करने से कुछ करना तो बेहतर है.

अपनी यादों के बहाने ही सही, लोग नेचर के नज़दीक तो जा रहे हैं.

वो चिड़िया के चहचहाने की क़ीमत नहीं लगा रहे, कि एक चिड़िया साल भर में 375 बिलियन डॉलर की क़ीमत वाला गाना गा लेती है.

क़िताबें लिखने वाले तो बस उस बेशक़ीमती आवाज़ के ज़रिए शोर मचाकर, बाक़ी दुनिया को ये कह रहे हैं कि क़ुदरत से फिर से रिश्ता जोड़ो.

नेचर राइटिंग करने वाली अमरीकी लेखिका लिडिया पीली कहती हैं कि क़ुदरत के बारे में लिखे जाने से लोग उन क़िस्सों में ख़ुद को भी पाएंगे.

जो कमी लेखक ने महसूस की, वो पढ़ने वाले भी करेंगे और अपनी जड़ों को तलाशने की कोशिश करेंगे.

ऐसे में नेचर राइटिंग को पूरी तरह ख़ारिज करना ठीक नहीं.

इक्कीसवीं सदी की सबसे बड़ी चुनौती है क़ुदरत के वजूद को बचाए रखने की.

इसमें ये क़िताबें हमारे बड़े काम की साबित हो सकती हैं.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक करें</caption><url href="http://www.bbc.com/culture/story/20160729-these-could-be-the-books-we-all-need" platform="highweb"/></link>, जो <link type="page"><caption> बीबीसी कल्चर</caption><url href="http://www.bbc.com/culture" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.)

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