राजनीति से शेयर बाज़ार पर असर पड़ता है?

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अमरीका में इस वक़्त राष्ट्रपति चुनाव का शोर है. पूरी दुनिया की नज़र इस चुनाव पर लगी है. इस चुनाव में किसके हाथ बाज़ी लगेगी, हर उम्मीदवार के हिसाब से अमरीकी विदेश नीति और आर्थिक नीति को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं.

अमरीकी बाज़ार में पैसा लगाने के इच्छुक तमाम निवेशक, सांस थामे चुनाव के नतीजे का इंतज़ार कर रहे हैं. क्योंकि जीतने वाले के हिसाब से ही अमरीका की रक्षा, विदेश और स्वास्थ्य की नीतियां तय होंगी. इसी आधार पर अमरीका में निवेश के नफ़े-नुक़सान का भी हिसाब लगेगा.

इसी तरह यूरोप में ब्रिटेन के संघ यूनियन छोड़ने को लेकर सियासत गर्म है. ब्रिटेन में इस चर्चा के ज़ोर पकड़ने के साथ ही वहां की मुद्रा ब्रितानी पाउंड की क़ीमत गिर गई.

राजनीतिक घटनाओं का कारोबार की दुनिया पर गहरा असर पड़ता है. फिर चाहे चीन की आर्थिक नीतियां हों, या अमेरिका में कर्ज़ लेने की सीमा पर पाबंदी की बहस. संसद में चर्चा हो, या बंद कमरों में बनने वाली रणनीति, राजनीति और कारोबार की दुनिया में सीधा संबंध होता है.

लोग अक्सर सोचते हैं कि कंपनियों के शेयर सिर्फ़ उसकी नीतियों की वजह से घटते-बढ़ते हैं. ये बात सच है कि किसी कंपनी की क़ीमत उसकी नीतियों और फ़ैसलों के हिसाब से घटती-बढ़ती रहती है. मगर राजनीतिक फ़ैसलों का भी कंपनियों के नफ़े-नुक़सान पर सीधा असर पड़ता है.

डोनाल्ड ट्रंप

जैसे कि अगर देश में ज़्यादा चीनी पैदा हो गई और इस पर सरकार ने चीनी के निर्यात का फ़ैसला किया. तो, इससे चीनी बनाने वाली कंपनियों को फ़ायदा होगा. सरकार के इस फ़ैसले से शेयर बाज़ार में कारोबार करने वाली चीनी कंपनियों के शेयरों के भाव चढ़ जाएंगे.

शेयर बाज़ार में पैसा लगाने वाले चतुर निवेशक इन बातों का हमेशा ख़्याल रखते हैं. किसी भी राजनीतिक फ़ैसले से उस सेक्टर की कंपनियों को फ़ायदा होगा या नुक़सान, ये अंदाज़ा लगाकर शेयरों की ख़रीद-फ़रोख़्त करना, समझदारी का काम है.

बहुत से ऐसे राजनीतिक फ़ैसले होते हैं जिनको लेकर बाज़ार बड़ी तेज़ी से चढ़ते-उतरते हैं. मसलन, अमरीकी फेडरल रिज़र्व की प्रमुख जेनेट येलेन जब कुछ कहती हैं तो उसका असर पूरी दुनिया के शेयर बाज़ारों पर पड़ता है. मगर इसका फ़ायदा उठाने के लिए आपको निवेश में उसैन बोल्ट जैसी तेज़ी दिखानी होगी.

अब, निवेशक इस तेज़ी से फ़ैसले तो ले नहीं सकते. तो बेहतर होगा कि आप किसी राजनीतिक फ़ैसले के दूरगामी नतीजों के बारे में सोचकर निवेश करें.

मसलन, अमरीका में कोई भी राष्ट्रपति बने, अगला साल कारोबार के लिहाज़ से कमज़ोर ही रहने वाला है. 1929 से लेकर अमेरिकी शेयर बाज़ार का अब तक का इतिहास तो यही कहता है.

किसी भी अमरीकी राष्ट्रपति के कार्यकाल के पहले साल में आर्थिक तरक़्क़ी की रफ़्तार धीमी ही रही है. शेयर बाज़ार ज़्यादातर किसी राष्ट्रपति के कार्यकाल के आख़िरी साल में ही बढ़ते हैं.

इसकी वजह साफ़ है. हर अमरीकी राष्ट्रपति की पहले कार्यकाल में कोशिश होती है कि वो अगली बार का चुनाव भी जीते. इसलिए वो सख़्त फ़ैसलों से कतराता रहता है. जब तेज़ी से फ़ैसले नहीं लिए जाते तो आर्थिक विकास की दर भी नहीं बढ़ती.

जब नीतियों को लेकर भ्रम होता है तो बाज़ार में काफ़ी उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है. कुछ कंपनियां अनिश्चितता के दौर में भी मुनाफ़ा कमा लेती हैं.

जिन निवेशकों को राजनीति की समझ होती है या जो ये जानते हैं कि किसी सियासी संकट का हल कैसे निकल सकता है, वो इस अस्थिरता से फ़ायदा उठा सकते हैं.

जैसे कि यूरोप में इस वक़्त ब्रिटेन के यूरोपीय संघ छोड़ने पर सियासी घमासान मचा है. अब सबकी निगाहें 23 जून को इस पर होने वाले जनमत संग्रह पर टिकी हैं.

इसमें ब्रिटेन की जनता तय करेगी कि ब्रिटेन को यूरोपीय संघ में बने रहना चाहिए या नहीं. इस सियासी संकट की वजह से लंदन का शेयर बाज़ार एफटीएसइ 100, क़रीब ढाई फ़ीसद तक गिर चुका है.

अगर, ब्रिटेन यूरोपीय संघ से अलग होने का फ़ैसला करता है तो पाउंड का गिरना तया है. इससे ब्रिटेन की एक्सपोर्ट कंपनियों का मुनाफ़ा बढ़ेगा. वहीं रिटेल और सुपरमार्केट कंपनियों को इससे नुक़सान होगा. क्योंकि ब्रिटेन से बाहर से सामान ख़रीदना उन्हें महंगा पड़ेगा.

इस नुक़सान की भरपाई कंपनियां, सामान के दाम बढ़ाकर करेंगी. यानी जो जनता यूरोपीय संघ में ब्रिटेन के रहने या न रहने पर फ़ैसला करेगी, उसे ही इसकी क़ीमत भी चुकानी होगी.

जो लोग ये मानते हैं कि ब्रिटेन, यूरोपीय संघ में बना रहेगा, वो इसके उलट निवेश के फ़ैसले करके मुनाफ़ा कमा सकते हैं.

इसी तरह अमरीकी चुनावों को लेकर भी निवेशक फ़ैसले कर सकते हैं. चाहे बर्नी सैंडर्स जीतें या हिलेरी क्लिंटन, डोनाल्ड ट्रंप जीतें या फिर टेड क्रूज़. जानकार कहते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप के जीतने पर रक्षा क्षेत्र में तेज़ी आना तय है. मगर, विदेशी कारोबार में लगी कंपनियों के शेयर गिरने तय हैं.

वजह साफ़ है. डोनाल्ड ट्रम्प, अपने भाषणों में अमरीका को ताक़तवर बनाने की बातें करते हैं. साथ ही वो बाक़ी दुनिया से अमरीकी बाज़ार को बचाने की बात भी करते हैं.

वहीं रिपब्लिकन पार्टी के ही टेड क्रूज़ के जीतने पर ऊर्जा क्षेत्र की कंपनियों के कारोबार में तेज़ी आएगी. क्योंकि चुने जाने पर वो पूरे देश में पाइपलाइन बिछाने की बात करते हैं.

वैसे किसी भी रिपब्लिकन उम्मीदवार के जीतने पर अमरीकी हेल्थ सेक्टर को नुक़सान होना तय है. वजह ये कि सबको अच्छी सेहत का वादा करने वाली राष्ट्रपति ओबामा की पॉलिसी, ओबामाकेयर की रिपब्लिकन पार्टी कट्टर विरोधी रही है.

शेयर बाज़ार के जानकार कहते हैं कि कई कंपनियां, हिलेरी क्लिंटन की जीत को लेकर बेफ़िक्र हैं. यही वजह है कि शेयर बाज़ार में ज़्यादा उठापटक नहीं देखी जा रही है. लोगों को लगता है कि इससे डेमोक्रेटिक पार्टी की नीतियां जारी रहेंगी. बहुत बड़ा बदलाव नहीं आएगा.

हिलेरी क्लिंटन की जीत से सोलर पावर सेक्टर में तेज़ी आनी तय मानिए. क्योंकि वो देश भर में पचास करोड़ सोलर पैनल लगाकर बिजली बनाने का वादा कर रही हैं. इससे सोलर एनर्जी के सेक्टर में काम करने वाली कंपनियों को फ़ायदा होगा.

वहीं उन्हीं की पार्टी के बर्नी सैंडर्स की जीत का मतलब है वित्तीय क्षेत्र में उतार-चढ़ाव आना, क्योंकि सैंडर्स ने कहा है कि वो बड़े बैंकों को ख़त्म करके छोटे-छोटे बैंक बनाएंगे.

वैसे, आप अमरीकी चुनाव में सीधे सट्टा लगाकर भी पैसे कमा सकते हैं. आयरलैंड की वेबसाइट, 'पैडी पावर' और ब्रितानी कंपनी, 'लैडब्रोक्स' ये सुविधा मुहैया करा रही है. इन वेबसाइट्स पर आप ब्रिटेन के यूरोपीय संघ में रहने या न रहने पर भी सट्टा खेल सकते हैं.

भाव ब्रिटेन के यूरोपीय संघ में बने रहने पर ज़्यादा है. वहीं अमरीकी चुनाव के मामले में हिलेरी क्लिंटन पर ज़्यादा लोग दांव लगा रहे हैं.

पैडी पावर कंपनी के रोरी स्कॉट कहते हैं कि ये सट्टेबाज़ी केवल मौज मस्ती के लिए है. इस पर अपनी ज़िंदगी भर की कमाई पूंजी लगाना ठीक नहीं.

राजनीतिक फ़ैसलों के आधार पर किसी शेयर में निवेश करना आपको थोड़ा बहुत नुक़सान दे सकता है. मगर शेयरों की क़ीमत एकदम से ज़ीरो नहीं होगी. वहीं सट्टेबाज़ी में तो आर या पार के हालात होंगे. मतलब आप जीते तो सारी रकम आपकी. और हार गए तो पूरा पैसा डूबना तय है.

अगर आप सेफ गेम खेलना चाहते हैं, तो बड़ी, नामी कंपनियों के शेयर ख़रीदिये. किसी भी बड़े सियासी उतार-चढ़ाव का इन कंपनियों पर मामूली असर ही पड़ता है.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="http://www.bbc.com/capital/story/20160413-this-is-where-the-real-profit-in-politics-sits" platform="highweb"/></link> करें, जो <link type="page"><caption> बीबीसी कैपिटल</caption><url href="http://www.bbc.com/capital" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.)

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