भारत में होते तो क्या हीरों से लादते?

सादत हसन मंटो
    • Author, अली अकबर नातिक़
    • पदनाम, पाकिस्तानी शायर और लेखक
  • प्रकाशित

मंटो उन अफ़सानानिगारों में से हैं जो हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों ही मुल्क़ों में मशहूर हैं. उन्होंने छोटी कहानियां लिखीं, रेडियो और फ़िल्मों के लिए भी लिखा.

वह उपन्यासकार भी थे, पत्रकार भी और नाटककार भी. उनके नाम से कुछ निबंध भी हैं. उन पर अश्लीलता के लिए मुकदमे भी चले, दोनों मुल्कों के बंटवारे से पहले भी और बाद भी.

मंटो बंटवारे के बाद पाकिस्तान चले गए थे जहां उनकी मौत हुई. सआदत हसन मंटो ने जितने अफ़साने लिखे होंगे, उनको लेकर उतने ही किस्से उनके गुज़र जाने के बाद भी कहे सुने जाते रहे हैं.

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सादत हसन मंटो

हाल ही में दिल्ली में हुए एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए दयारे मीर (यानी दिल्ली) जाना हुआ. वहां बहुत कुछ जाना, समझा और अपनी बात भी समझाई.

सब बहुत अच्छा था मगर एक बात का ग़म खा कर पाकिस्तान लौटा. वह यह कि जो मिला उसने यही कहा, साहब पाकिस्तानियों ने मंटो को भूखा, प्यासा और नंगा करके मार दिया.

उन्हें रोटी नहीं दी, घर में चार-चार दिन भुखमरी चलती रही, यहां तक कि शराब की बजाय मंटो पानी पीने लगे थे. रहने को छत नहीं दी. रातें फुटपाथों पर गुज़ारते और दिन भर सड़कों की धूल चाटते थे मंटो.

<link type="page"><caption> (पढ़ेंः मंटो की ख्वाहिश) </caption><url href="http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2012/05/post-240.html" platform="highweb"/></link>

<link type="page"><caption> </caption><url href="http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2012/05/post-240.html" platform="highweb"/></link>अगर भारत से न जाता तो उन्हें हीरों में तौल कर रखा जाता. उसके मकान के नीचे से दूध और शराब की नहरें निकाली जातीं, हालांकि उन्हें दूध पीने से कोई रुचि नहीं थी. बैंक में उनके कई लॉकर होते जिसमें सोना चांदी और डॉलर भरे रहते.

मंटो का घर

मंटो का घर

अब मैं हैरान कि ये किस मंटो की बात कर रहे हैं?

क्या यह वही मंटो नहीं हैं जिन्हें पाकिस्तान आने के बाद लाहौर के बीचोबीच एक अच्छा सा घर दिया गया जो आज भी लक्ष्मी मैंशन में मौजूद है. हालांकि सभी जानते हैं मंटो मुंबई में किराए के एक गंदली सी खोली में रहते थे.

मंटो का घर नीदरलैंड के किसी कॉटेज की तरह हसीन था, जहां वह अपने बाल बच्चों के साथ ज़िंदगी बसर करते थे. अपनी कारोबारी मसरूफ़ियात के अलावा वह अक्सर घर पर ही रहते थे.

<link type="page"><caption> (पढ़ेंः 'हैप्पी बर्थडे मंटो') </caption><url href="http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2012/05/post-239.html" platform="highweb"/></link>

उस दौर में जब गुलाम अब्बास और सैयद रफीक़ हुसैन जैसे बड़े लेखकों को कोई पूछ नहीं रहा था और आज भी उनका कोई नाम लेने को तैयार नहीं, तब मंटो ने अपना एक-एक लफ्ज़ कैश कराया.

आर्थिक मदद

सादत हसन मंटो

पाकिस्तान की गली-गली में उनका डंका बज रहा था. अदबी पत्रिकाओं और प्रकाशकों ने मंटो से कभी एक शब्द भी मुफ़्त में नहीं लिखवाया.

अगर वह ये सब कमाई शराब के दरिया में झोंक दें तो किसी का क्या कसूर. इसके अलावा मंटो के सालिम टांगेवाले की कहानी कौन नहीं जानता.

उर्दू अदब और पाकिस्तान को मंटो पर गर्व है और उनके पाकिस्तानी दोस्तों ने भी हर लम्हा उनका ख़्याल रखा.

अक्सर दोस्त उनसे कहानी ख़रीदने के नाम पर उनकी आर्थिक मदद कर देते थे. हालांकि ख़रीदनेवालों को अफ़साने से कोई खास दिलचस्पी नहीं रहती थी.

मगर मंटो उन्हीं ख़रीदारों को अहमक समझते थे. एक बार मुझे एक साहब ने अपना नाम सार्वजनिक न करने की शर्त पर मंटो से जुड़ी एक कहानी सुनाई.

'दो हज़ार नहीं दो सौ'

सादत हसन मंटो

कहानी सुनाने वाले खुद उर्दू साहित्य के एक बड़े साहित्यकार हैं और अभी जीवित हैं. उन दिनों वे एक बड़े सरकारी ओहदे पर थे.

उन्होंने एक दिन एक अमरीकी काउंसेलेट से मंटो के अफ़सानों को अमरीका में छपवाने के लिए मदद मांगी. दूसरे दिन वह आदमी अमरीकी अधिकारी के साथ मंटो के घर पहुंचे.

<link type="page"><caption> (पढ़ेंः गुलज़ार ने याद किया मंटो को)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/2010/08/100828_manto_gulzar_mb" platform="highweb"/></link>

मंटो ने अपने अफ़सानों के लिए दो सौ रुपये मांगे. अमरीकी ने उन्हें दो हज़ार रुपये देने की पेशकश की. इस पर मंटो नाराज़ हो कर अड़ गए कि दो सौ रुपये से ज्यादा नहीं लेंगे. आखिर वे तीन सौ पर बात तय हो गई.

लेकिन हद तो ये हो गई कि अगले दिन मंटो ने उन्हीं दोनों को भला बुरा कहते हुए अख़बार में एक लेख लिख दिया. मंटो के जीवन से जुड़ी ऐसी बहुत सी मिसालें किताबों में मौजूद है.

मंटो की बीमारी

सादत हसन मंटो

अब मैं दूसरी तरफ़ आता हूँ. सब जानते हैं कि मंटो को टीबी की बीमारी थी. इस पर शराब का ये आलम था कि मटका भर-भर पीते थे.

इसमें दोस्त या रिश्तेदार एक तरफ़, पत्नी और बेटियों की भी नहीं सुनते थे और चाय पीने वालों का मज़ाक उड़ाते थे.

मुख्तार सिद्दीकी कहते हैं कि उनकी जैसी 'खुद पसंदी' इस दुनिया में किसी में नहीं होगी.

<link type="page"><caption> (पढ़ेंः मंटो के पचास बरस बाद)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/news/cluster/2005/05/050511_manto_fiftyyears.shtml" platform="highweb"/></link>

अगर कोई शख़्स खुदकुशी करने को ठान ही ले तो उसके लिए खुदा भी कुछ नहीं कर सकते. एक तरफ उन्हें खून की उल्टी आ रही हैं, दूसरी ओर वह शराब पिए जा रहे हैं और ताना यह कि पाकिस्तान ने मार दिया.

कुछ ने यह बहाना पेश किया है क्योंकि उन्हें आर्थिक तंगी थी इसलिए उसकी फ़िक्र भुलाने के लिए अधिक पीते थे.

सादत हसन मंटो

मैं उनसे पूछता हूँ कि दिल्ली और मुंबई में तो बकौल आपके उन्हें माली तंगी नहीं थी फिर वहाँ किस खुशी में वो पीते थे.

मुझे एतराज़ इस बात पर नहीं कि वो क्यों पीते थे, मैं तो सिर्फ ये कहता हूँ फिर अपनी लाई हुई मुसीबत की ज़िम्मेदारी भी खुद उठानी चाहिए.

उर्दू हिंदी विवाद

अच्छे बुरे लोग हर जगह मौजूद होते हैं, शासकों को लेखकों और कवियों से न कल कोई सरोकार था, और न आज है.

<link type="page"><caption> (पढ़ेंः 'मैं तो पेड़ पर ही रहूंगा') </caption><url href="http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2009/11/post-46.html" platform="highweb"/></link>

और यह पाकिस्तान ही नहीं भारत की भी त्रासदी है. यह भारतीय उपमहाद्वीप है. यूरोप और अमरीका नहीं कि शासक पढ़े लिखे हैं. यहां तो दोस्त ही सहारा बनते हैं और वह मंटो का सहारा बने भी.

अब यह और बात है कि वह कारखाना या मिल लगवा कर देने से रहे. आज उनकी बेटियां पाकिस्तान की एलीट क्लास का हिस्सा हैं.

सादत हसन मंटो

अगर वे भारत में रहते तो उनके साथ क्या होता?

इसका अंदाज़ा हम मीरा जी, प्रेमचंद, फिराक़ और उन्हीं तरह के अन्य कई अपमानित होते लेखकों से लगा सकते हैं जिन्हें उर्दू-हिंदी विवाद की पृष्ठभूमि में रुसवा किया जा रहा है.

इस पर भी अगर किसी को शक है तो वह वारिस अल्वी की किताब 'मंटो- एक मुताला' पढ़ ले जिसमें उन्होंने आरोप लगाया है कि मंटो भारत से कैसे अपमानित होकर निकले थे.

पाकिस्तान और पाकिस्तानियों को गालियां देने से अगर फ़ुर्सत मिले तो थोड़ी सी खोजबीन भी कर लिया करें. मंटो को लाहौर की ज़िंदगी, मुंबई की खोलियों से बहरहाल ज़्यादा पसंद थी.

सीधी सी बात है कि मंटो के बारे में इस तरह की बात करने वाले न मंटो को जानते हैं और न पाकिस्तान को.

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