पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान में आईएस!

चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट
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इस्लामी चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट की जड़ें वैसे तो इराक़ और सीरिया में हैं.

लेकिन हाल की रिपोर्टों से ऐसे संकेत मिलते हैं कि अब उसका इरादा अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने का है.

इस्लामिक स्टेट ने एक पूर्व पाकिस्तान तालिबान कमांडर सईद ख़ान को दक्षिण एशिया में अपनी गतिविधियों की देख रेख का काम सौंपा है.

अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान पहले से ही चरमपंथ से जूझ रहे हैं और अब इस बात की आशंका है कि यहां के हालात और बिगड़ सकते हैं.

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चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट

क्या हमें चिंतित होना चाहिए: दक्षिण एशिया के ज़्यादातर चरमपंथी लड़ाके तालिबान नेता मुल्ला उमर के वफ़ादार हैं. इस बात के सबूत कम ही हैं कि हेलमंड इलाके के एक असंतुष्ट कमांडर के अलावा और कोई प्रमुख अफ़ग़ान गुट इस्लामिक स्टेट के साथ जुड़ने जा रहा है.

पाकिस्तान में सेना का पूरा नियंत्रण है. कई बार ऐसा लगा कि पाकिस्तान सरकार को तालिबान का सामना करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है.

लेकिन ज़्यादातर विशेषज्ञों की राय में इसकी वजह ये थी कि फ़ौज चरमपंथियों का इस्तेमाल अफ़ग़ानिस्तान और भारत में अपने रणनीतिक मकसद को पूरा करने के लिए करती है.

आईएस के वफ़ादार

चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट

इस बात के संकेत मिले हैं कि सेना के हमले से अलग थलग पड़ गए चरमपंथी उत्तरी वज़ीरिस्तान में इस्लामिक स्टेट से जुड़ने के बारे में सोच रहे हैं ताकि स्थानीय स्तर पर वे अपनी मौजूदगी फिर से दर्ज करा सकें.

नतीजतन इस्लामिक स्टेट के समर्थन में लिखे हुए नारे दीवारों पर देखे जा सकते हैं, आईएस के काले झंडे दिखने लगे हैं और पाकिस्तान के अलग अलग हिस्सों में इससे जुड़़ी कुछ पर्चियां बांटी गई हैं.

लेकिन अभी तक सईद ख़ान और उनके गुट ने ही इस्लामिक स्टेट से अपनी वफ़ादारी की बात कही है.

सईद ख़ान कौन है?

बैतुल्लाह मेहसूद (बाएं से)
इमेज कैप्शन, सईद खान को बैतुल्लाह मेहसूद (बाएं से) का वफादार माना जाता है.

साल 2009 से 2014 के बीच उन्होंने उत्तर पश्चिमी इलाके के कबायली बहुल ज़िले ओरकज़ई के लिए पाकिस्तानी तालिबान के कमांडर की हैसियत से काम किया था.

सईद ख़ान का प्रभाव क्षेत्र ओरकज़ई तक ही सीमित माना जाता था और उन्हें तरक्की देकर क्षेत्र की कमान सौंपने का फैसला ऐसे वक्त में आया है कि जब वे फरार हैं और उत्तर पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान में छिपने के ठिकाने तलाश रहे हैं.

चालीस पार कर चुके सईद के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने ओरकज़ई और पड़ोस के खैबर पख्तूनख्वाह के मदरसों में इस्लाम की तालीम हासिल की थी.

9/11 के बाद उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान में गठबंधन सेना के खिलाफ़ लड़ाई लड़ी थी और वे पाकिस्तानी तालिबान के नेता बैतुल्लाह मेहसूद के प्रभाव में आ गए.

ड्रोन हमले

चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट

अगस्त 2009 में एक ड्रोन हमले में बैतुल्लाह मेहसूद के मारे जाने के बाद सईद ख़ान को ओरकज़ई की कमान मिल गई. ओरकज़ई के नेता हकीमुल्लाह मेहसूद को बैतुल्लाह की जगह कमान सौंपी गई.

कहा जाता है कि सईद के हकीमुल्लाह के साथ कुछ मतभेद थे. हकीमुल्लाह की मौत भी 2013 में एक ड्रोन हमले में हो गई. उन्होंने मुल्लाह फज़लुल्लाह को हकीमुल्लाह का ओहदा दिए जाने की मुखालफत भी की थी.

शायद ये एक वजह हो सकती है कि उन्होंने तालिबान छोड़कर इस्लामिक स्टेट में शामिल होने का फैसला किया हो.

दूसरे चरमपंथियों की प्रतिक्रिया?

मुल्लाह फजलुल्लाह
इमेज कैप्शन, मुल्लाह फजलुल्लाह

जून 2014 में अबू बक्र बगदादी के खुद को खलीफा घोषित करने के ठीक दो महीने बाद अयामन अल-ज़वाहिरी ने भारतीय महाद्वीप में अल कायदा के गठन की घोषणा की थी.

इसके कुछ हफ्तों के बाद ही इस संगठन ने पाकिस्तान के नौसैनिक ठिकानों पर कराची में हमला बोल दिया.

कई लोगों का ये मानना है कि अल कायदा ने ये हमला इस्लामिक स्टेट के असर को रोकने के लिए किया था ताकि लड़ाकों की भर्ती के रास्ते बने रहें और मध्य पूर्व के दौलतमंद दान दाताओं पर असर न पड़े.

इस बात को लेकर भी कयास लगाए जा रहे हैं कि मुल्लाह फजलुल्लाह के गुट ने पिछले महीने पेशावर के स्कूली बच्चों की हत्या की कार्रवाई को अंजाम दिया था ताकि वे इस्लामिक स्टेट जैसी दरिंदगी की बराबरी कर सकें.

कहा ये भी जा रहा है कि इस्लामिक स्टेट के प्रमुख सईद ख़ान इस इलाके में अपनी पहली चरमपंथी कार्रवाई शुरू करें, पेशावर के स्कूल पर हमला किया गया.

दक्षिण एशिया में इस्लामिक स्टेट?

इस्लामिक स्टेट के संस्थापक अबू मुसाब अल ज़रक़ावी
इमेज कैप्शन, इस्लामिक स्टेट के संस्थापक अबू मुसाब अल ज़रक़ावी

1990 के बाद से ही इस क्षेत्र के चरमपंथी गुटों के सभी नेता अफ़ग़ान तालिबान के प्रमुख मुल्लाह मोहम्मद उमर के वफ़ादार रहे हैं. इस्लामिक स्टेट के संस्थापक अबू मुसाब अल ज़रक़ावी इराक़ में लड़ाई शुरू करने से पहले कई साल अफ़ग़ानिस्तान में गुजार चुके हैं.

इस्लामिक स्टेट में अबू मुसाब अल ज़रक़ावी का समर्थन करने वाले कई ऐसे नेता हैं जिन्हें अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान का कोई निजी अनुभव नहीं है और न कोई निजी जुड़ाव.

इस क्षेत्र से उनका एकमात्र संबंध यही है कि सीरिया और इराक़ में उनके कई लड़ाके पिछले कुछ सालों से अफ़ग़ानिस्तान से आ रहे हैं.

इससे क्या फर्क पड़ेगा?

तालिबान लड़ाके

पाकिस्तानी फौज का इस इलाके में एक महत्वपूर्ण रोल है. माना जाता है कि क्षेत्र में सक्रिय इस्लामी चरमपंथियों के फलने फूलने में इसकी प्रमुख भूमिका रहती है. हालांकि आधिकारिक तौर पर इसका खंडन किया जाता है.

तालिबान लड़ाके

जानकारों का कहना है कि अफ़ग़ान चरमपंथी गुटों को पाकिस्तानी मदद जारी है. लेकिन पाकिस्तानी फौज ने ये भी दिखाया है कि वे चाहें तो चरमपंथी ठिकानों को नष्ट कर सकते हैं और 2009 में स्वात और पिछले साल उत्तरी वज़ीरिस्तान में उन्होंने ये किया भी था.

कई विशेषज्ञों का मानना है कि इस्लामिक स्टेट इस इलाके में तब तक अपनी ज़मीन नहीं तैयार कर सकता है जब तक कि पाकिस्तानी फौज इसकी इजाजत न दे.

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