जलवायु परिवर्तन के कारण ऐसे बिगड़ सकता है घर का बजट

आंधी तूफान
    • Author, सेसिलिया बारिया
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़ संवाददाता
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जलवायु परिवर्तन का सीधा असर आपके बैंक खाते पर यानी आपकी जेब पर हो सकता है.

ऐसा नहीं है कि केवल चीज़ों की क़ीमतें बढ़ेंगी और हर महीने आपका बिल बढ़ेगा. अगर आप ऐसे इलाक़ों में रहते हैं, जहां बाढ़ या तूफ़ान आने की संभावना अधिक हो तो आपका घर तबाह हो सकता है या आपकी नौकरी भी जा सकती है.

बीबीसी की एक स्टडी के अनुसार, साल 1980 के बाद से साल में ऐसे दिनों की संख्या क़रीब दोगुनी हो गई है जब पारा 50 डिग्री सेल्सियस के पार रहता है.

जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र की इंटरगवर्नमेन्टल पैनल (आईपीसीसी) की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार ग्रीन हाऊस गैसों का उत्सर्जन कम कम किए जाने के बाद भी संभव है कि साल 2040 तक धरती का तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाए.

तापमान बढ़ने के साथ तूफ़ान, सूखा और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं का आना भी बढ़ने की आशंका है जिससे लोगों के जानोमाल के लिए ख़तरा बढ़ेगा.

मौसम में आने वाले बदलावों के साथ इस तरह की घटनाओं के कारण फसल बर्बाद होने का जोखिम अधिक रहेगा. इसका असर हमारी रोज़मर्रा की ज़रूरतों और भोजन, पानी और बिजली जैसी सुविधाओं पर पड़ सकता है और इनकी क़ीमतें बढ़ सकती हैं.

जलवायु परिवर्तन का असर लोगों के स्वास्थ्य पर भी होगा और इस पर उनका खर्च बढ़ेगा. रही घरों की बात तो जलवायु परिवर्तन के साथ बढ़ती गर्मी और कड़ाके की ठंड में रहने के लिए लोगों का एयर कंडीशनर और हीटर का इस्तेमाल बढ़ेगा. यानी ऊर्जा की खपत बढ़ेगी और आपका खर्च भी.

हम कह सकते हैं कि वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन के कारण धीमी होती आर्थिक विकास की दर और बढ़ती महंगाई आपकी जेब के लिए अच्छा साबित नहीं होगा.

हम आपका बता रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण आपकी जेब पर पड़ने वाले पांच बड़े असर के बारे में.

एल साल्वाडोर में खेती

1. खाने-पीने की चीज़ों की क़ीमतें बढ़ेंगी

जलवायु परिवर्तन का सबसे गंभीर असर फसलों पर पड़ेगा है. हाल के सालों में सूखा, बाढ़, आग और तूफ़ान जैसी प्रकृतिक आपदाओं का आना बढ़ा है. वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अगर धरती का तापमान इसी तरह बढ़ता रहा तो आने वाले वक्त में चीज़ें जटिल हो जाएंगी.

आईपीसीसी की रिपोर्ट बनाने वाले शोधकर्ताओं की टीम में से एक फ्रेडरिक ऑटो यूके की ऑक्सफ़र्ड यूनिवर्सिटी में रीसर्चर हैं. वो कहते हैं, "आने वाले वक्त में गर्म हवा की तीव्रता अधिक होगी और इसकी फ्रीक्वेंसी भी बढ़ेगी."

केंद्रीय अमेरिका के इलाक़े में रहने वाले लोग इस तरह का प्राकृतिक आपदाओं से जूझते रहे हैं. वहीं लातिन अमेरिका और कैरीबियाई देशों में अनाज का उत्पादन कम हुआ है. इन इलाक़ों में भीषण सूखा आना अब बड़ी बात नहीं रही.

Sequía en Honduras

प्रोफ़ेसर मर्सिडीज़ पाद्रो बुदीना स्पेन की कार्लोस यूनिवर्सिटी में सोशियोलॉजी ऑफ़ क्लाइमेट चेंड एंड सस्टेनेबल डेवेलपमेन्ट रिसर्च ग्रुप के निदेशक हैं. वो कहते हैं, "किसी भी तबाही की का असर आर्थिक गतिविधि पर पड़ता है. और इस कारण अनाज की कीमतें बढ़ती हैं."

वो कहते हैं कि ऊर्जा और पानी की क़ीमतें बढ़ेंगी तो असर अनाज के उत्पादन के साथ-साथ मार्केटिंग पर भी होगा, यानी सब कुछ मिलाकर अनाज की क़ीमतें बढ़ेंगी.

वहीं, यूनिवर्सिटी कॉलेज, लंदन में भूगोल के प्रोफ़ेसर मार्क मस्लिन कहते हैं कि क़ीमतों का बढ़ाना जलवायु परिवर्तन का वास्तविक असर होगा और इसका असर परिवार के बजट पर पड़ेगा.

बार-बार सूखा पड़ने और तापमान के बढ़ने से खेती के काम में लगने वाले लोगों की संख्या कम होने लगेगी. जानकार कहते हैं कि लोग अपनी जीविका खो देंगे और असर उत्पादन के साथ-साथ अनाज की उपलब्धता और उसकी क़ीमतों पर पड़ेगा.

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बिजली की कीमतें

2. बढ़ेगा पानी और बिजली का बिल

मार्क मस्लिन कहते हैं कि बिजली की क़ीमतों का बढ़ना सभी जगह समान नहीं होगा, क्योंकि "ये इस बात पर निर्भर करता है कि बिजली का उत्पादन कैसे होता है और सरकारें किस तरह की सब्सिडी देती हैं. "

लेकिन वो देश जो बिजली के लिए पनबिजली परियोजनाओं पर निर्भर करते हैं और जो जलवायु परिवर्तन के कारण सूखे से प्रभावित होंगे, वहां बिजली की क़ीमतों पर असर पड़ना लाज़िमी है.

हालांकि अभी कई देशों में एक ऐसी प्रक्रिया पर काम चल रहा है जिसका कम वक्त पर बुरा असर ज़रूर होगा, लेकिन लंबे वक्त में इससे लोगों को फायदा मिलेगा. कई मुल्क अभी कोयले की बजाय दूसरे स्रोतों से बिजली का उत्पादन करने की कोशिश में लगे हैं. इस बदलाव के कारण भी कीमतों में कुछ वक्त के लिए उछाल आ सकता है.

पाद्रो बुदीना कहते हैं, "घरों का बिजली का बिल तो अधिक होगा ही इस कारण बिजली से चलने वले उपकरणों की क़ीमतें भी बढ़ सकती हैं."

इसका बड़ा असर बुज़ुर्गों पर भी पड़ेगा. उनकी बिजली का ज़रूरतें तो कम नहीं होंगी लेकिन उनकी आय कम होने के कारण उनके घरों का खर्च बढ़ेगा.

रही पानी की बात तो कई जगहों पर पानी की किल्लत पहले ही देखी जा रही है और पानी के बिलों में भी बढ़ोतरी देखने को मिल रही है.

और अगर पानी बेचने वाली कंपनियों ने अगर ये फ़ैसला किया कि घरों और इंडस्ट्री को पानी की सप्लाई करेंगी तो उन्हें इस दिशा में काफी निवेश करना पड़ेगा. इसका खर्च भी अंतत: उपभोक्ता की ही जेब पर पड़ेगा.

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Mujer con chorro de agua. Misisipi, EE.UU, después del huracán Katrina.

3. दुर्घटना के लिए बीमा की कीमतें बढ़ेगी

पाद्रो बुदीना कहते हैं, "बीमा की क़ीमतें अभी से बढ़ने लगी हैं."

एक तरफ कृषि क्षेत्र, घरों और सभी तरह की आपात स्थिति के लिए बीमा की कीमतें बढ़ रही हैं तो दूसरी तरफ कई बीमा कंपनियां उन उपभोक्ताओं को रिजेक्ट कर रही हैं जिन्हें वो अधिक जोखिम में मानती हैं.

पाद्रो बुदीना साल 2005 में अमेरिका में आए तूफ़ान कैटरीना की याद दिलाते हैं और कहते हैं "ऐसे कई घर हैं जो जलवायु परिवर्तन के कारण अधिक जोखिम में हैं और घर का बीमा कराने के लिए कंपनी नहीं तलाश पाए हैं."

जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाला नुक़सान बढ़ेगा, संभव है कि बीमा की क़ीमतें भी बढ़ जाएं.

सारा डुगर्टी न्यूयॉर्क में मौजूद ग्रीन फाइनेंस सेंटर में काम करती हैं. वो कहती हैं कि, "फर्ज़ कीजिए कि आप ऐसी जगह में रहते हैं जहां आग लगने की घटनाएं आम हैं, आपके लिए बीमा की क़ीमतें बढ़ सकती हैं. या फिर आप जहां रहते हैं वहां तूफ़ान अक्सर आते हैं, तो आपका प्रीमियम बढ़ जाएगा."

कुछ ऐसा ही उन जगहों पर रहने वालों के साथ हो सकता है जिनके समुद्र के बढ़ते जलस्तर के कारण डूब जाने का ख़तरा है.

लेकिन बड़ी चिंता का विषय ये भी है कि समुद्र के जलस्तर के बढ़ने पर विस्थापन और स्थानांतरण का ख़तरा भी बढ़ेगा. इसका असर उस जगह की अर्थव्यवस्था पर तो पड़ेगा ही, बल्कि उस देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा जहां बड़ी संख्या में लोग पहुंचेंगे.

तूफान से उजड़े मकान

4. स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ेगा

वायु प्रदूषण का इंसान के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार वायु प्रदूषण से हर साल क़रीब 70 लाख लोगों की मौत होती है.

हालांकि एक अन्य स्टडी में ये आंकड़ा अधिक बताया गया है. अप्रैल में प्रकाशित हुए हार्वर्ड, बरमिंघम और लेस्टर के वैज्ञानिकों के शोध के अनुसार प्रदूषित हवा के कारण हर साल क़रीब एक करोड़ लोगों की मौत होती है.

दूसरी तरफ वैज्ञानिक ये भी चेतावनी दे रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण ऐसी माकूल स्थितियां पैदा हो रही हैं जिनमें संक्रामक रोगों के फैलने का ख़तरा बढ़ सकता है.

ब्रितानी मेडिकल जर्नल लेंसेट की हालिया सालाना रिपोर्ट 'लेंसेट काउंटडाउन' में कहा गया है कि ठंडे इलाक़ों में मलेरिया के फैलने का ख़तरा अधिक होगा जबकि उत्तरी यूरोप और अमेरिका में पेट की बीमारी पैदा करने वाले और सेप्सिस के बैक्टीरिया फैलने का ख़तरा बढ़ेगा.

वहीं, गर्म जगहों में कॉलरा और डेंगू जैसी बीमारियों का फैलना आसान हो जाएगा.

Persona en hospital con ventilador artificial

रिपोर्ट में कहा गया है कि क़रीब 60 करोड़ लोग समुद्र के जलस्तर से पांच मीटर की ऊंचाई पर रहते हैं, और उनके लिए बाढ़ और भयंकर तूफ़ानों का ख़तरा बढ़ जाएगा.

रिपोर्ट की लीड ऑथर मारिया रोमानेलो कहती हैं, "वक्त आ गया है कि हम ये समझ जाएं कि जलवायु परिवर्तन के असर से कोई भी बचा नहीं रह सकता."

हाल के सालों में दुनिया के कुछ हिस्सों में आई भीषण गर्मी का असर लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ा था.

यूनिवर्सिटी ऑफ़ वॉशिंगटन में प्रोफ़ेसर और लेंसेट की रिपोर्ट बनाने में शामिल जानकारों में से एक डॉक्टर जेरेनी हेस कहते हैं कि सिएटल के अस्पतालों में काम करते वक्त उन्होंने जलवायु परिवर्तन का असर देखा है.

वो कहते हैं, "मैंने उन स्वास्थ्यकर्मियों को देखा है जो हीट स्ट्रोक वाले मरीज़ों की देखभाल में लगे थे, घुटने टिकाकर बैठने के कारण उनके घुटनों पर जलने के घाव बन गए थे."

वो कहते हैं, "मैंने गर्मी के कारण कई लोगों को मरते हुए देखा है."

Billetes mexicanos

5- धीमा आर्थिक विकास

स्विस रे इंस्टीट्यूट के शोध में कहा गया है कि "जलवायु परिवर्तन विश्व अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा दीर्घकालिक ख़तरा है."

इसके मुताबिक़ अगर कदम नहीं उठाए गए तो अगले 30 सालों में 10 प्रतिशत और 18 प्रतिशत के बीच वैश्विक आर्थिक संकुचन मुमकिन है.

अगर धरती का तापमान 3.2 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया तो सदी के मध्य में सबसे ख़राब परिदृश्य (जीडीपी में 18 फीसदी तक की गिरावट) देखने को मिल सकती है.

दूसरे अनुमान 80 सालों में सकल घरेलू उत्पाद में करीब 10 फीसदी की संभावित गिरावट की बात करते हैं.

मापने के तरीकों के कारण गणना अलग होती है. लेकिन एक बात साफ़ है कि तेज़ी से आर्थिक दुष्प्रभाव बढ़ रहा है.

Fabrica emitiendo gases de invernadero

सबसे मुश्किल परिणाम सबसे गरीब देशों में देखे जाएंगे, विशेष रूप निचले इलाकों में स्थित, जहां बाढ़ और सूखे का प्रभाव ज़्यादा होता है.

विश्व बैंक का अनुमान है कि 2030 तक जलवायु परिवर्तन से और 132 मिलियन लोग अत्यधिक गरीबी में चले जाएंगे.

एजेंसी के मुताबिक इस मानवीय आपदा में मौसम के प्रभाव से कृषि आय में कमी, श्रमिकों की उत्पादन क्षमता में कमी , खाद्य कीमतों में वृद्धि, बढ़ती बीमारी के कारण आर्थिक नुकसान होंगे.

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विश्व बैंक में सस्टेनेबल डेवलपमेंट के उपाध्यक्ष जुएर्गन वोगेले ने लिखा है कि "विश्व में धन बढ़ रहा है और साथ ही देशों के बीच असमानता बनी हुई है और कम आय वाले देश धन के अपने हिस्से के मामले में पीछे हैं." .

इन बातों से अगर ऐसा लग रहा है कि इनका आप पर असर नहीं होगा, तो आप गलत हैं. आपकी जेब भी प्रभावित होगी.

मार्क मसलिन कहते हैं,"आप जिस देश में रहते हैं, अगर वह नवीकरणीय ऊर्जा का समर्थन करता है, तो आपके खर्च पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा."

उन्होंने कहा कि इलेक्ट्रिक गाड़ियां बेहतर होंगी और समय के साथ इनकी लागत भी कम हो सकती है.

वे बताते हैं कि स्वच्छ हवा वाले वातावरण में रहने से लोगों के स्वास्थ्य में सुधार होगा और उन्हें अपने इलाज से जुड़े बिलों को कम करने में मदद मिलेगी.

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