क्या पाकिस्तान के चरमपंथी समूह आईएएसआई के हथियार हैं?

जैश ए मोहम्मद प्रमुख मसूद अज़हर की ये तस्वीर फरवरी 2000 में पाकिस्तान के कराची में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ली गई थी.
इमेज कैप्शन, जैश ए मोहम्मद प्रमुख मसूद अज़हर की ये तस्वीर फ़रवरी 2000 में पाकिस्तान के कराची में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ली गई थी.
    • Author, वात्सल्य राय
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित

अमरीका ने बीते साल की शुरुआत में पाकिस्तान पर चरमपंथ से मुक़ाबले में दोहरा खेल खेलने का आरोप लगाया और उसे दी जा रही मदद रोकने का ऐलान किया.

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के प्रशासन ने जो आरोप लगाया, वो नया नहीं था और अब भारत एक बार फिर ऐसे ही आरोप लगा रहा है.

भारत प्रशासित कश्मीर के पुलवामा में बीती 14 फरवरी को सीआरपीएफ के काफ़िले पर हुए हमले में 40 से ज़्यादा सुरक्षाकर्मियों की मौत हो गई. तब से भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में तनाव है.

इस हमले की जिम्मेदारी जैश-ए-मोहम्मद ने ली. भारत ने इसे लेकर पाकिस्तान को डॉजियर सौंपा है.

भारत प्रशासित कश्मीर के पुलवामा में हुए हमले के बाद मुंबई के एक विरोध प्रदर्शन की तस्वीर
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जैश पर कार्रवाई सिर्फ़ दिखावा?

पाकिस्तान ने जैश-ए-मोहम्मद के संस्थापक मसूद अज़हर के भाई समेत 44 लोगों को गिरफ़्तार करने और संपत्तियां जब्त करने की जानकारी दी है.

हालांकि, भारत में रक्षा मामलों के विशेषज्ञ पाकिस्तान की कार्रवाई को महज दिखावा बता रहे हैं.

चरमपंथरोधी अभियानों पर नज़र रखने वाले रक्षा विशेषज्ञ डॉक्टर अजय साहनी कहते हैं, " जब इन पर (पाकिस्तान पर) बहुत दबाव पड़ता है तब उस दबाव को हटाने के लिए इन्हें जो कम से कम करना होता है वो ये करते हैं. अब इन्होंने कहा है कि दो हफ़्ते तक अगर हमें सबूत नहीं मिलेंगे तो हम इनको रिहा कर देंगे."

पाकिस्तान ने जमात उद दावा को प्रतिबंधित सूची में डालने की जानकारी भी दी है. इस संगठन के प्रमुख हाफ़िज सईद हैं जिन्हें भारत साल 2008 के मुंबई हमले के लिए कठघरे में खड़ा करता है.

सईद मुंबई हमले के लिए जिम्मेदार बताए जाने वाले संगठन लश्कर ए तैयबा के भी संस्थापक हैं.

हाफिज़ सईद

साल 2001 से प्रतिबंधित संगठनों की सूची जारी करने वाली पाकिस्तान की नेशनल काउंटर टेरिरिज़्म अथॉरिटी (एनसीटीए) की लिस्ट में साल 2002 से ही जैश और लश्कर के नाम हैं. लेकिन पाबंदी के बाद भी इन समूहों के लगातार सक्रिय होने का दावा किया जाता है.

इनके लीडर मसूद अज़हर और हाफ़िज सईद पाकिस्तान में तकरीरें करते और सार्वजनिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेते नज़र आते रहे हैं.

डॉक्टर अजय साहनी कहते हैं कि ऐसा इसलिए है क्योंकि 'पाकिस्तान के तंत्र ने ही इन समूहों को हथियार की तरह तैयार किया है'.

वो कहते हैं, "इस पूरे क्षेत्र में चाहे भारत में कार्रवाई करने वाले समूह हों या फिर अफ़ग़ानिस्तान में सक्रिय समूह, ये सब पाकिस्तान की इंटरसर्विस इंटेलिजेंस (आईएसआई) के हथियार हैं."

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ
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'पाकिस्तान में हीरो था हाफिज़ सईद'

ऐसे दावों की तस्दीक कई बार पाकिस्तान की तरफ से ही होती रही है.

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने एक टीवी इंटरव्यू में माना था कि भारत और अफ़ग़ानिस्तान जिन समूहों पर दहशतगर्दी का इल्ज़ाम लगाते हैं, उन्हें कभी पाकिस्तान ने ही ट्रेनिंग दी थी.

मुशर्रफ ने इस इंटरव्यू में कहा था, " हम पूरी दुनिया से मुजाहिदीन लाए. हमने तालिबान को ट्रेंड किया. उन्हें हथियार दिए. उन्हें अंदर भेजा. वो हमारे हीरो थे. अब 1990 को लें और कश्मीर और हाफिज़ सईद वगैरह की बात करें. पाकिस्तान में उनको हीरो जैसी रिशेप्सन दी गई. उनकी ट्रेनिंग भी होती थी. हम उनके सपोर्ट में थे कि ये मुजाहिदीन हैं जो इंडियन आर्मी से लड़ेंगे अपने हकूक के लिए. यहां फिर लश्कर ए तैयबा वगैरह बनीं. 10-12 और भी बनीं."

वीडियो कैप्शन, भारत-पाकिस्तान: सीमा पर दोनों तरफ तबाही

चरमपंथियों को मदद

पाकिस्तान की वरिष्ठ पत्रकार और रक्षा मामलों की जानकार मरियाना बाबर कहतीं हैं कि जो समूह पाकिस्तान की विदेश नीति को बढ़ाने में सहायक थे, उन्हें एक दौर में भरपूर मदद मिली.

वो कहती हैं, " शुरू में हमारी विदेश नीति के तहत इन समूहों को समर्थन दिया गया था. हथियार भी दिए गए थे. ट्रेनिंग भी दी गई थी. मगर सरकारी एजेंसियों के दिल में था कि ये तो कहीं और ( भारत प्रशासित कश्मीर में) कुछ कर रहे हैं. अफ़गान तालिबान हमारे उत्तरी हिस्से में थे. हक्कानी नेटवर्क पाकिस्तान में था. सोवियत यूनियन को मारते-मारते वो ट्रेंड हो गए थे."

जलालुद्दीन हक़्क़ानी पाकिस्तान बेस में अपने दो गुरिल्ला लड़कों के साथ
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दहशतगर्द समूहों की बढ़ती संख्या की वजह से दुनिया के कई देश आरोप लगाने लगे कि पाकिस्तान 'चरमपंथियों की ऐशगाह' बन गया है. पाकिस्तान ऐसे आरोपों से इनकार करता है लेकिन कई देश दावा करते हैं कि एनसीटीए की प्रतिबंधित सूची में शामिल 68 संगठनों में से कई नाम बदलकर सक्रिय हैं.

डॉक्टर अजय साहनी पाकिस्तान के चरमपंथी समूहों की जानकारी देते हैं.

"सभी समूहों का अलग-अलग प्रोफाइल है. बलोच समूह हैं, वो विद्रोही समूह हैं. बलूचिस्तान से इन्होंने जिस तरह का बर्ताव किया है उसे लेकर लोगों में बहुत नाराज़गी है. शियाओं के ख़िलाफ समूहों को भी सरकार ने ही तैयार किया. तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान जैसे समूह इनके साये से निकलकर इनका ही विरोध करने लग गए. चौथे समूह, वो हैं जो इनके वफ़ादार हैं. ये भारत के ख़िलाफ और अफ़ग़ानिस्तान में सक्रिय हैं."

पाकिस्तान में पेशावर के एक स्कूल पर दिसंबर 2014 में हुए हमले में 150 से ज़्यादा लोग मारे गए थे.
इमेज कैप्शन, पाकिस्तान में पेशावर के एक स्कूल पर दिसंबर 2014 में हुए हमले में 150 से ज़्यादा लोग मारे गए थे.

चुनिंदा समूहों पर कार्रवाई

रक्षा विशेषज्ञ दावा करते हैं कि जो समूह सरकार के काबू से बाहर हो गए उनकी तपिश पाकिस्तान ने भी महसूस की. पेशावर के एक स्कूल पर दिसंबर 2014 में हुए हमले के बाद चरमपंथ पर रोक लगाने के लिए 20 सूत्रीय एक्शन प्लान तैयार हुआ.

हालांकि, डॉक्टर अजय साहनी दावा करते हैं कि कार्रवाई सिर्फ उन्हीं समूहों के ख़िलाफ हुई जिनसे पाकिस्तान और उसकी सेना को ख़तरा था

वो कहते हैं, "तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के ख़िलाफ़ बहुत ऑपरेशन हुए. कराची में जितने समूह थे, उन सबको ख़त्म कर दिया गया. इनके मुताबिक दहशतगर्दी वही है जो इनके ख़िलाफ हो रही है. ये जो कहते हैं कि हम दशहतगर्दी के शिकार हैं तो ये अपनी दहशतगर्दी के शिकार हैं. इन समूहों को पाकिस्तान ने ही बनाया था."

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान
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चरमपंथी समूहों के ख़िलाफ हालिया कार्रवाई की वजह एक और है.

मनी लॉन्ड्रिंग और चरमपंथ की फंडिंग पर नज़र रखने वाली फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) ने चरमपंथ को वित्तीय मदद रोकने में नाकाम रहने पर बीते साल पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट में डाल दिया और मरियाना बाबर कहती हैं कि अब पाकिस्तान के सामने ब्लैक लिस्ट में आने का ख़तरा है.

"सबसे जरूरी बात ये है कि एफएटीएफ ने पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट में डाला हुआ है. उसकी वजह से पाकिस्तान पर बहुत दबाव है. इसमें बहुत सी शर्तें होती हैं. जैसे दहशतगर्दों को ख़त्म करें. इनकी संपत्तियां जब्त करें. इनके हथियारों पर पाबंदी लगाएं."

मरियाना बाबर बताती हैं कि चरमपंथियों की संपत्तियां जब्त करने के लिए पाकिस्तान ने कानून में भी बदलाव किया है.

कतर में अमरीका और अफ़ग़ान तालिबान के बीच हुई बैठक के दौरान ली गई तस्वीर

अफ़ग़ानिस्तान में कामयाब पाक रणनीति?

लेकिन डॉक्टर अजय साहनी पाकिस्तान में हो रही कार्रवाइयों को संशय की नज़र से देखते हैं. वो याद दिलाते हैं कि पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय आपत्तियों के बाद भी मुंबई हमले के अभियुक्त ज़की उर रहमान लखवी को रिहा कर दिया था.

डॉक्टर साहनी अमरीका का जिक्र करते हुए कहते हैं, " अमरीका ने मदद रोक दी लेकिन इससे पाकिस्तान का रवैया नहीं बदला. जब ये अफ़ग़ानिस्तान की तरफ देखते हैं तो अपनी फतह देखते हैं. इस वक़्त एक सुपर पावर (अमरीका) भागने को खड़ा हुआ है. वो कहता है कि हमें कोई शांति समझौता करा दो हम तो निकल जाएंगे. बाकी अफ़ग़ान संभालें. तो अगर एक इतनी बड़ी ताक़त से ये नहीं दबे तो आप सोचते हैं कि ग्रे लिस्ट और ब्लैकलिस्ट और संयुक्त राष्ट्र की पाबंदियों से घबराने और अपना रवैया बदलने वाले हैं."

लेकिन, पाकिस्तान के रक्षा विशेषज्ञ अफ़ग़ान तालिबान को लेकर उसकी नीति का बचाव करते हैं.

मरियाना बाबर कहती हैं, "अफ़गान तालिबान पर संयुक्त राष्ट्र ने पाबंदी लगाई हुई थी. आज वो कहां हैं आज वो बैठे हैं मॉस्को में और दोहा में और अमरीका से बातचीत कर रहे हैं. भारत का भी एक अनाधिकारिक प्रतिनिधिमंडल मॉस्को गया था. ये भी आप देखें कि जो बंदा पहले दहशतगर्द था वो अब आपके साथ मेज पर बैठकर खाना खा रहा है. पाकिस्तान की ये रणनीति थी कि हम पाकिस्तान तालिबान के साथ अपना संपर्क नहीं तोड़ेंगे. ये ऐसा समहू है जो हुकूमत में आएगा. तो हम क्यों अमरीका के कहने पर अपने ताल्लुक काट दें."

पाकिस्तान के पेशावर में भारत विरोधी प्रदर्शन के दौरान सेना के समर्थन में नारे लगाते लोग
इमेज कैप्शन, पाकिस्तान के पेशावर में बुधवार को भारत विरोधी प्रदर्शन के दौरान सेना के समर्थन में नारे लगाते लोग

किस राह को चुनेगा पाकिस्तान?

हालांकि, मरियाना बाबर ये ज़रूर कहती हैं कि पाकिस्तान की सेना ने दावा किया है कि पाकिस्तान में मौजूद चरमपंथियों को धीरे-धीरे ख़त्म किया जाएगा.

वो कहती हैं, "ये अभी कहना कि वो वाकई ऐसा करने के लिए गंभीर हैं, उनके पास इतने संसाधन हैं और ऐसा करने के लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति है, ये देखने के लिए इंतज़ार करना होगा"

लेकिन, डॉक्टर अजय साहनी बिना इंतज़ार ही फ़ैसला सुना देते हैं.

"देखिए एक ज़माने पहले (ज़ुल्फिकार अली) भुट्टो ने कहा था, हम घास खाएंगे लेकिन एटम बम जरूर बनाएंगे. इसका यही रवैया रहा है कि हम एक मिलिट्री फोर्स, चाहे वो रेगुलर फोर्स हो या फिर टेररिस्ट फोर्स हो, को बढ़ाते चले जाएंगे. चाहे देश को बाकी कितना भी नुकसान हो."

पाकिस्तान भुट्टो के दौर से चालीस साल आगे बढ़ चुका है. प्रधानमंत्री इमरान ख़ान नया पाकिस्तान बनाने की बात करते हैं. नए पाकिस्तान का सबसे बड़ा इम्तिहान यही है कि वो कौन सी राह चुनता है.

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