अजित सिंह के 'इतने बुरे दिन कभी ना थे'

अजित सिंह
    • Author, शरद गुप्ता
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

पिछले दो महीनों से राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष अजित सिंह बहुत चर्चा में हैं.

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में गठबंधन के लिए उनकी बातचीत बहुजन समाज पार्टी को छोड़कर अन्य सभी दलों से हो चुकी है.

पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के इकलौते बेटे अजित के लिए शायद इतने बुरे दिन पहले कभी नहीं थे.

कांग्रेस, बीजेपी हो या समाजवादी पार्टी सभी ने अजित से गठबंधन की पहली शर्त उनकी पार्टी के विलय की रखी, ताकि वे दल-बदल न कर सकें.

जब दल ही नहीं रहेगा तो बदलेंगे कैसे. सपा से उनके गठबंधन का ऐलान होने के अगले ही दिन वो टूट भी गया. कांग्रेस में उन्हें उम्मीद नहीं दिख रही. अब उन्हें केवल बीजेपी से ही जवाब की दरकार है.

अजित सिंह भारतीय राजनीति के ऐसे पुरोधा है जो लगभग हर सरकार में मंत्री रहे हैं. वे कपड़ों की तरह सियासी साझेदारी बदलते रहे हैं.

1989 के बाद वे बागपत से लगातार सांसद रहे हैं सिवाय 1999 के. उनकी दूसरी पराजय हुई 2014 में जब वे मुंबई के पुलिस कमिश्नर रहे सत्यपाल सिंह से हार गए.

बीजेपी के टिकट पर लड़े सत्यपाल भी अजित की तरह जाट हैं और बागपत के ही एक गाँव के रहने वाले हैं. वजह रही मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के बाद जाटों का बीजेपी के पक्ष में लामबंद हो जाना.

अजित के लिए यह पैरों तले ज़मीन खिसकने के मानिंद था, क्योंकि 1960 के दशक से उनके पिता चरण सिंह और उनकी मृत्यु के बाद अजित जाटों के एकमात्र नेता रहे.

पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चौधरी साहब की ही तूती बोलती थी. यानी राज्य की 150 सीटों पर उनका प्रभाव था. वे किसानों, खासतौर पर जाटों के खैरख्वाह थे.

चरण सिंह ने जाटों के साथ मुसलमान, गुर्जर और राजपूतों का समर्थन जुटाकर 'मजगर' का चुनावी समीकरण बनाया था, अजित ने उस समीकरण को बनाए रखने का कमज़ोर प्रयास किया.

वे हर चुनाव में 4-5 लोकसभा और 24-25 विधानसभा सीटें जीत जाते थे. गठबंधन की राजनीति के दौर मे उनकी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए यह काफ़ी था.

इन्हीं के दम पर अजित सिंह हर सरकार में मंत्री बन जाते. चाहे वह 1989 में वीपी सिंह की सरकार हो या 1991 में नरसिंह राव सरकार. 1999 की वाजपेयी सरकार हो या फिर 2001 की मनमोहन सिंह सरकार.

अजित जाटों के नेता तो रहे लेकिन उन्हें नाराज़ भी जमकर किया. उनके रिश्तों को लेकर इस इलाक़े में बहुत सी किंवदंतियां प्रचलित हैं. जैसे हर चुनाव में जाट अजित को हराने की क़समें खाते हैं, लेकिन वोट भी उन्हीं को देकर आते हैं.

कहा जाता है कि मतदान से पहले की रात चौधरी चरण सिंह बुज़ुर्ग जाटों के सपने में आते हैं, उन्हें याद दिलाते हैं कि चौधरी साहब के बाद अजित का ख़्याल उन्हें ही रखना है. और अजित जीत जाते हैं.

अजित की मनमानियां सहने की मानों जाटों को आदत सी हो गई है. 2012 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने मेरठ की सिवालखास सीट से यशवीर सिंह को टिकट दिया.

इलाक़े के जाट अजित के पास पहुंचे. कहा - भाई साहब, तने ग़लत आदमी नू टिकट दे दिया. अजित ने टका सा जवाब दे दिया - मैंने जिसे देना था, दे दिया. तने नहीं जंचता, तो उसे वोट मत देना. जाट वापस लौटे और यशवीर के प्रचार में जुट गए.

मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले के किसान नेता वीरेंद्र सिंह कहते हैं, "अजित ने न अपने क्षेत्र की फ़िक्र की, न अपने लोगों की. क्योंकि उन्हें तो सबकुछ विरासत में सजा-सजाया मिल गया."

कहा जा सकता है कि पाला बदलने के गुण भी अजित को विरासत में मिले हैं. उनके पिता चरण सिंह ने 1967 में पहले कांग्रेस की सरकार गिराई और फिर खुद मुख्यमंत्री बन गए.

इसी तरह 1979 में उन्होंने पहले मोरारजी देसाई का सरकार गिराई और फिर पाला बदल कर कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री बन बैठे.

अजित ने कंप्यूटर इंजीनियरिंग की थी. विदेश में 15 साल नौकरी भी की. लेकिन चौधरी चरण सिंह की मृत्यु के बाद उनकी राजनीतिक विरासत संभालने की जिम्मेदारी अजित के कंधों पर आ गई.

1989 में चौधरी साहब के शिष्य मुलायम सिंह यादव के साथ पहले पार्टी के नेतृत्व और फिर मुख्यमंत्री पद के लेकर मतभेद हुए. इतने ज्यादा कि अजित ने अलग होकर नई पार्टी बना ली -जनता दल (अजित).

उन्होंने इसी का नाम बाद में बदलकर राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) कर दिया.

1987 में जब चरण सिंह की मृत्यु हुई तब उत्तर प्रदेश विधानसभा में लोकदल के 84 विधायक थे. लेकिन अजित निजी फ़ायदे के लिए राजनीतिक समझौते करते रहे और पार्टी कमज़ोर होती गई.

आज यूपी विधानसभा में रालोद के मात्र नौ सदस्य हैं और लोकसभा में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है.

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