कश्मीर की पीटी उषा: दौड़ती है रोज़ 10 किलोमीटर

इंशा वादू
    • Author, माजिद जहांगीर
    • पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

वो पिछले सात सालों में 75,000 किलोमीटर की दौड़ लगा चुकी हैं. हर दिन कम से कम 10 किलोमीटर की दौड़ लगाती हैं. और बीते रविवार को 18 वर्षीया इंशा वादू ने 21 किलोमीटर लंबी दौड़ लगाई.

श्रीनगर के रैनावरी की रहने वाली इंशा ने बीते 13 सितंबर को श्रीनगर के एक रेडियो स्टेशन की तरफ़ से आयोजित अंतरराष्ट्रीय हॉफ़ मैराथन में हिस्सा लिया और तीसरे स्थान पर रहीं.

इस दौड़ के लिए 20 से 30 हज़ार लोगों ने रजिस्ट्रेशन कराया था.

इंशा तब 11वीं जमात में पढ़ती थीं, जब उन्हें दौड़ने का शौक़ पैदा हुआ और उसके बाद वो बर्फ़, बारिश, सर्दी या गर्मी की परवाह किए बिना रोज़ाना दौड़ लगाती रही हैं.

इंशा ने आज तक 30 से ज़्यादा स्वर्ण पदक और अन्य तमग़े हासिल किए हैं.

एक मध्यवर्गी परिवार से ताल्लुक़ रखने वाली इंशा इस समय बीपीएड की पढ़ाई कर रही हैं. उनके पिता एक मामूली कारोबारी हैं.

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इंशा वादू

इंशा कहती हैं, "दौड़ने का सिलसिला अचानक शुरू हुआ. मुझे तो मैट्रिक तक पता भी नहीं था कि एथलीट क्या होता है. जब मैं 11वीं में गई तो मुझे दौड़ने का शौक़ पैदा हुआ और ये शौक़ बढ़ता ही गया और मैं दौड़ती गई और अभी तक दौड़ ही रही हूँ."

उनको उम्मीद नहीं थी कि बीते रविवार को हॉफ़ मैराथन में वो तीसरा स्थान हासिल कर पाएंगी.

वो बताते हैं, "मैं तो ये सोच कर नहीं गई थी कि कोई पोज़ीशन हासिल करूँगी. मैंने तैयारी तो बहुत की थी लेकिन यक़ीन नहीं था. इसमें अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी आये थे, उनके बराबर आना कोई छोटी बात नहीं थी, ये तो ख़ुदा का करम है और फिर मेरी महनत का नतीजा."

इंशा के कोच तनवीर अहमद के मुताबिक़ इंशा ने 21 किलोमीटर की दौड़ 1 घंटा और 23 मिनट में तय की थी, जबकि पहली और दूसरी पोज़ीशन हासिल करने वाले खिलाड़ियों ने 1 घंटा 15 मिनट और 1 घंटा 18 मिनट में पूरी की थी.

कश्मीर स्पोर्ट्स काउंसिल के कोच शेख़ तुलाल कहते हैं, "इस दौड़ में कई सारी लड़कियां भाग लेने के लिए आई थीं लेकिन प्रोफ़ेशनल एथलीट रनर के रूप में इंशा अकेली लड़की थीं."

बाहर मौक़े का इंतज़ार

इंशा वादू

इंशा ने आज तक अपने राज्य से बाहर किसी मैराथन में हिस्सा नहीं लिया है. वो बताती हैं, "मुझे आज तक मौक़ा नहीं मिला कि मैं जम्मू-कश्मीर से बाहर खेल सकूं और ना ही सरकार इसमें कोई दिलचस्पी लेती है."

इंशा को इस बात की परवाह नहीं है कि वो कश्मीर में इकलौती लड़की एथलीट रनर हैं. हालांकि वो चाहती हैं कि लड़कियाँ इस मैदान में आगे आएं.

उनका कहना था, "लड़की होकर भी मुझे आज तक सड़क पर दौड़ते हुए किसी ने कुछ नहीं कहा. अगर किसी के दिल में ये डर है कि एक लड़की होकर पता नहीं लोग क्या कहेंगे तो इस डर को दिल से निकालना चाहिए."

सरकार से इंशा को सख़्त शिकायत है. वो कहती हैं, "सरकार ने हमारे लिए आज तक कुछ नहीं किया. मेरे जैसे खिलाड़ियों के लिए यहाँ कोई ढांचा नहीं है. हमारे लिए कोई भी सुविधा नहीं है. हम जो कुछ भी करते हैं अपने पैसे से करते हैं."

इंशा ख़ुद को एक दिन अंतरराष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी के रूप में देखना चाहती हैं.

सरकारी उदासीनता

कोच तनवीर
इमेज कैप्शन, इंशा को सात साल से कोचिंग दे रहे कोच तनवीर.

अपनी कामयाबी का सारा श्रेय वो अपने कोच तनवीर अहमद और परिवार को देती हैं. 29 वर्षीय तनवीर अहमद पिछले सात सालों से इंशा के कोच हैं.

वो कहते हैं, "सात साल पहले मैंने इंशा को सड़क पर दौड़ते देखा था और मुझे लगा कि ये लड़की बहुत आगे जा सकती है."

"इंशा एक ग़रीब घर की लड़की है जो मुश्किलों के बावजूद आगे बढ़ रही है. इस दौड़ में उसने उम्मीद के मुताबिक़ प्रदर्शन किया. आज तक वह जहाँ भी गईं, हमारा सिर बुलंद किया."

राज्य में खेल ढांचे को लेकर तनवीर कहते हैं, "हमारे कश्मीर में इंशा जैसे खिलाड़ी बहुत निकल सकते हैं, लेकिन उसके लिए सरकार को आगे आने की ज़रूरत है."

"मैंने सरकार के उदासीन रवैये के ख़िलाफ़ दो साल पहले श्रीनगर से जम्मू तक दौड़ भी लगाई थी, लेकिन ऐसा लगा जैसे सरकार ने कुछ देखा-सुना ही नहीं. आज तक सरकार की तरफ़ से एक पैसे की मदद नहीं मिली."

"जिन अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों के साथ इंशा का श्रीनगर में मुक़ाबला था, उन पर करोड़ों की रक़म ख़र्च होती है और इंशा जैसे खिलाड़ियों पर एक पैसा भी कोई ख़र्च नहीं करता. इंशा की अगर कोई मदद करता है तो वो गैर सरकारी लोग हैं जो कभी-कभी अपनी जेब से उनको पैसा देते हैं."

मदद की दरकार

इंशा वादू

जम्मू-कश्मीर स्पोर्ट्स काउंसिल इस बात का दावा करता है कि उन का काउंसिल खिलाड़ियों को पूरा मौक़ा देता है ताकि वह राष्ट्रीय स्तर पर खेलें.

काउंसिल के कोच शेख़ तलाल कहते हैं कि वो जब खिलाड़ियों को बाहर जाने के लिए कहते हैं तो उनके घर वाले उनको अकेला बाहर भेजने के लिए तैयार नहीं होते हैं या फिर उस समय उनको स्कूल परीक्षा की तैयारी का समय होता है.

ताहम काउंसिल के कोच कहते हैं, "हमारे कश्मीर में एथलीट रनर्स के लिए कोई ढांचा नहीं है. हुनर तो हमारे खिलाड़ियों में है लेकिन सरकार की मदद दरकार है."

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