द्युति की जीत से दुनिया भर की खिलाड़ियों को फ़ायदा

द्युति चांद
    • Author, डॉक्टर पायोषनी मित्रा
    • पदनाम, सलाहकार, स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया
  • प्रकाशित

द्युति चांद केस की जीत बहुत बड़ी जीत है क्योंकि इसका असर सिर्फ़ भारतीय नहीं बल्कि विश्व खेल जगत पर पड़ेगा. दुनिया की हर महिला एथलीट इससे प्रभावित होगी क्योंकि सिर्फ़ द्युति नहीं है जिसे यह झेलना पड़ा है.

हॉर्मोन टेस्ट फेल होने के बाद पिछले साल द्युति चंद पर बैन लगा दिया गया था.

फिर द्युति ने इसे चुनौती देने की हिम्मत दिखाई और अंतरराष्ट्रीय एसोसिएशन ऑफ़ एथलेटिक्स फ़ेडरेश्नस (आईएएफ़) के फ़ैसले को चुनौती दी गई.

अभी द्युति को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुकाबलों में भाग लेने के लिए बिना शर्त अनुमति दी गई है.

हाइपरएंड्रोजेनिज़्म

कोर्ट ऑफ़ आरबिट्रेशन ऑफ़ स्पोर्ट्स (कास) में हमारे केस में एक और मुद्दा था कि हाइपरएंड्रोजेनिज़्म के आधार पर प्रतिबंध को रहना चाहिए या उसे ख़त्म कर देना चाहिए.

द्युति चांद

इस पर कास ने आईएएफ़ को कहा है कि अगर आप इस मुद्दे पर और कोई वैज्ञानिक तथ्य लेकर बात करना चाहते हो तो फिर बात की जा सकती है.

कास ने आईएएफ़ से पूछा है कि अतिरिक्त हाइपरएंड्रोजेनिज़्म वाले एथलीट को बाकी खिलाड़ियों पर जो बढ़त मिलती है उसे मापा कैसे जाता है और वह कितनी है?

अगर वह एक या दो या तीन फ़ीसदी है तो वह अन्य शारीरिक विशेषताओं की वजह से भी मिल सकती है. अगर 10-12 फ़ीसदी फ़ायदा मिलता है तो हमें चिंता करनी चाहिए.

सबका साथ

इस मुद्दे पर भारत सरकार, स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया, खेल मंत्रालय के अलावा अमरीकी विशेषज्ञों जैसे कि डॉक्टर कटरीना ने बहुत साथ दिया है.

द्युति चांद

कटरीना ने पहले दिन से मुझे राह दिखाई है. वह मुझे समझाती थीं और मैं द्युति को.

मैं और कटरीना और ब्रूट्स्की आपस में सलाह किया करते थे कि कैसे इस मामले को रखना है, कैसे सरकार को मनाया जा सकता है, द्युति को क्या-क्या तकलीफ़ हो रही है.

हम तीनों के अलावा कनाडा में कानून के विशेषज्ञ थे- जिनमें कनाडा के सुप्रीम कोर्ट के जज भी शामिल थे. उन्होंने प्रो-बोनो यानि कि निशुल्क द्युति का केस लड़ा.

इसलिए मुझे लगता है कि इसे सिर्फ़ भारतीयों की जीत कहना ठीक नहीं होगा.

यह जीत है उन लोगों की जिन्हें लगता है कि खेल को सभी लोगों को लेकर चलना चाहिए. खेल में सिर्फ़ प्रतिस्पर्धा, सिर्फ़ जोश नहीं होना चाहिए. इसे सबको शामिल करके चलने वाला होना चाहिए. इसका नैतिक पक्ष मजबूत होना चाहिए.

जैसी हैं, वैसी ही रहेंगी खिलाड़ी

द्युति चांद

मैंने ऐसी कई महिला एथलीट के साथ काम किया है जिनकी साथ भेदभाव हुआ है. पिंकी प्रमाणिक के साथ भी मैं काम कर चुकी हूं.

मैं शोध करती हूं और एथलीट के साथ बहुत नज़दीकी से जुड़ती हूं. इसलिए इस मामले में मेरी समझ बहुत अलग है.

मैं इसे सिर्फ़ एक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे के रूप में नहीं देखती. यह सिर्फ़ एक वैज्ञानिक मुद्दा नहीं है, यहां हम लोगों के बारे में बात कर रहे हैं.

महिला एथलीटों पर दबाव होता है कि वह ख़ास तरह की दिखें, ख़ास तरह के कपड़े पहनें. मीडिया भी कहता है कि विज्ञापन में तभी आओगी जब लंबे बाल रखोगी, अच्छी बात करोगी, ठीक से बर्ताव करोगी.

जब भी कोई लड़की खिलाड़ी बनती है तो उसकी छोटी-छोटी बात पर ध्यान दिया जाता है. इस नियम पर भी यह बात लागू होती है.

द्युति चांद

आज यह कहा जा सकता है कि जो भी लड़कियां खेल की दुनिया में आती हैं वह कह सकती हैं कि मैं जो भी हूं ऐसी ही रहूंगी. मुझे लोगों को ख़ुश करने के लिए या कुछ बनने के लिए कुछ बनने की कोशिश नहीं करनी पड़ेगी.

(डॉक्टर पायोषनी मित्रा जादवपुर विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ़ मीडिया, कम्युनिकेशन एंड कल्चर के खेल, यौन-रुझान के आधार पर यौन शोषण और भेदभाव, यौन समरूपता और/या इंटरसेक्सुअलिटी पर शोध प्रोजेक्ट की निदेशक हैं. भारत सरकार का खेल और युवा मामलों के मंत्रालय इस प्रोजेक्ट को सहायता प्रदान करता है. इसके अलावा वह स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया में लिंगभेद और खेल मुद्दों की सलाहकार भी हैं.)

(बीबीसी हिंदी की प्लानिंग एडिटर रूपा झा से बातचीत पर आधारित)

<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> आप यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>