1965: हाजी पीर- बारिश, अंधेरी रात, गोलियों की बौछार

    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
  • प्रकाशित

उनके पास खाने के लिए सीले हुए शकरपारे और बिस्कुट थे. तेज़ बारिश हो रही थी और मेजर रंजीत सिंह दयाल एक (1) पैरा के सैनिकों को लीड करते हुए हैदराबाद नाले की तरफ़ बढ़ रहे थे.

उनका अंतिम लक्ष्य था हाजी पीर पास, जिसको पाकिस्तान और भारत दोनों एक अभेद्य लक्ष्य मानते थे. ये पास एक ऐसी जगह पर था जहां से इसका बहुत कम लोगों के साथ कहीं तगड़े प्रदिद्वंदी के ख़िलाफ़ बचाव किया जा सकता था.

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हाजी पीर पास की ओर चढ़ाई, धीमी, रपटीली, गहरी और लंबी थी. सिर्फ़ रात के अंधेरे में ही वहां तक पहुंचने की बात सोची जा सकती थी. मेजर दयाल समय के ख़िलाफ़ भी लड़ रहे थे.

बारिश के तेज़ थपेड़ों और घोर अंधेरे के बावजूद उन्हें सुबह तक चोटी तक पहुंचना था वर्ना दिन की रोशनी में चोटी पर तैनात पाकिस्तानी सैनिकों के लिए वो सिटिंग डक (आसानी से शिकार होने वाले सैनिक) साबित होते.

हाजी पीर का सामरिक महत्व

हाजी पीर में साहसपूर्ण प्रदर्शन के लिए मेजर आरएस दयाल को महावीर चक्र दिया गया था.
इमेज कैप्शन, हाजी पीर में साहसपूर्ण प्रदर्शन के लिए मेजर आरएस दयाल को महावीर चक्र दिया गया था.

पहाड़ों पर लड़ाई हमेशा चोटियों पर होती है. हर किसी पास पर कब्ज़ा कर भी लिया जाए लेकिन अगर चोटियों पर कब्ज़ा नहीं हैं तो उसका कोई सामरिक महत्व नहीं होता है और उनका बचाव करना भी मुश्किल होता है.

हाजी पीर का सामरिक महत्व ये था कि अगर इस दर्रे पर किसी का कब्ज़ा हो तो श्रीनगर और पुंछ की दूरी मात्र 50-55 किलोमीटर रह जाती है. अगर ऐसा न हो तो पुंछ से श्रीनगर जाने के लिए पहले जम्मू जाना पड़ा है, फिर वहाँ से श्रीनगर और वहाँ से ऊड़ी... ये रास्ता करीब 600-650 किलोमीटर का होता है.

इस पर कब्ज़ा करने के लिए उस पर दो तरफ़ से हमला करने की योजना बनाई गई. पश्चिमी तरफ़ से 1 पैरा को चोटियों पर कब्ज़ा करने के आदेश मिले और पूर्व की ओर से पंजाब रेजिमेंट को हमला करने के लिए कहा गया.

झोपड़ी में 11 पाकिस्तानी सैनिक

ब्रिगेडियर अरविंदर सिंह बीबीसी स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल के साथ.
इमेज कैप्शन, ब्रिगेडियर अरविंदर सिंह बीबीसी स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल के साथ.

मेजर दयाल का पहला लक्ष्य था संक के ढलानों पर कब्ज़ा करना. इस अभियान में भाग लेने वाले ब्रिगेडियर अरविंदर सिंह याद करते हैं कि इस लक्ष्य को हासिल करने वाले पहले दो हमले असफल हो गए.

तगड़ी लड़ाई के बाद अरविंदर सिंह की कंपनी संक पर कब्ज़ा करने में सफल हो गई. उसके बाद उनका वहां काम ख़त्म था. हाजी पीर पर हमला किसी और कंपनी को बोलना था लेकिन मेजर दयाल ने अनुमति मांगी कि उनकी कंपनी को हाजी पीर पर हमला करने की इजाज़त दी जाए.

हाजी पीर की चढ़ाई चढते हुए भारतीय सैनिक.
इमेज कैप्शन, हाजी पीर की चढ़ाई चढते हुए भारतीय सैनिक.

उनके सामने 1500 फ़ीट की लगभग सीधी चढ़ाई थी. अनुमति मिलने के बाद दयाल के सैनिकों ने ऊपर चढ़ना शुरू किया.

ब्रिगेडियर अरविंदर सिंह याद करते हैं, "मौसम बहुत ख़राब था लेकिन फ़ौज में कहा जाता है कि जितना ख़राब मौसम हो, आक्रमण करने वालों के लिए उतना ही अच्छा होता है, क्योंकि रक्षण करने वाले थोड़े सुस्त हो जाते हैं. उस इलाके में ज़मीन दलदली हो चुकी थी. इस पर कब्ज़ा करने के लिए हमे तकरीबन 1500 फ़ीट ऊपर चढ़ना था और चढ़ाई का कोण लगभग 55 से 60 डिग्री था."

अरविंदर सिंह आगे बताते हैं, "रास्ते में हमें एक झोपड़ी दिखाई दी. उसमें से कुछ आवाज़ आ रही थी जब हमने उसका दरवाज़ा खटखटाया तो उसमें से 11 पाकिस्तानी सैनिक निकले. हमने उन्हें घेर लिया."

जिम्मी राव बीबीसी हिंदी के ऑफ़िस में.
इमेज कैप्शन, जिम्मी राव बीबीसी हिंदी के ऑफ़िस में.

उस अभियान में शामिल लेफ़्टिनेंट जिमी राव याद करते हैं, "हमने उन पाकिस्तानी सैनिकों को न सिर्फ़ बंदी बनाया बल्कि उन्हें अपना भारी सामान उठाने के लिए कुली की तरह इस्तेमाल किया."

डीआर मनकेकर ने अपनी किताब 22 फ़ेटफ़ुल डेज़ में लिखा है, "दयाल और उनके सैनिक तड़के साढ़े चार बजे हाजी पीर जाने वाली सड़क पर पहुंच गए थे. उन्होंने अपने सैनिकों को दो घंटे का विश्राम दिया. उन्होंने फिर ऊपर चढ़ना शुरू किया. जब वो सुबह 8 बजे चोटी पर पहुंचे, तब तक पाकिस्तानी सैनिक भारी गोला बारूद छोड़ कर वहां से भाग चुके थे. अपने पीछे वो इतना खाना छोड़ गए थे जिससे 1000 लोगों को एक महीने तक खाना खिलाया जा सकता था."

बिना नमक का मांस

मार्च के दौरान भारतीय सैनिकों को कोई रसद नहीं मिल रही थी. उन्होंने दो पहाड़ी बकरियाँ पकड़ी. संगीन से उन बकरियों को मारा गया और अफ़सरों ने अधपका मांस खाया.

उसमें पाकिस्तानी सैनिकों से छीने गए नमक का इस्तेमाल किया गया. जवानों को तो वो नमक भी नसीब नहीं हुआ. हाजी पीर पर कब्ज़ा करने के बाद दयाल ने मेजर अरविंदर सिंह को पाकिस्तानी सैनिकों के ठिकानों का जायज़ा लेने के लिए पास की पहाड़ी में भेजा.

मेजर अरविंदर ने वहाँ जो देखा, उससे उनके पैरों की ज़मीन निकल गई. वहाँ पर बहुत बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सैनिक थे जो भारतीय सैनिकों पर जवाबी हमला करने की तैयारी कर रहे थे. अरविंदर ने उसी समय उन पर हमला बोलने का फ़ैसला किया हालांकि उनके पास उस समय सिर्फ़ 65 सैनिक थे.

अरविंदर कहते हैं, "हमारी पाकिस्तानियों से हाथों से लड़ाई हुई. मैंने खुद दो लोगों को संगीन से मारा. अगर में उन्हें नहीं मारता तो वो मुझे मार डालते. इस हमले में 23 भारतीय सैनिक हताहत हुए लेकिन हमने हाजी पीर पर पूरा नियंत्रण कर लिया. उस समय बाकी बचे हुए सैनिकों में इतना भी दम नहीं था कि वो अपने पैरों पर खड़े हो पाते."

उस मंजर को याद करते हुए 50 साल बाद भी अरविंदर रोमांचित हो उठते हैं. वे कहते हैं, "मेरे ऊपर एक ग्रनेड फेंका गया और मैं नीचे गिर गया. मेरे पैर का एक हिस्सा उड़ गया. लेकिन ताज्जुब की बात थी कि मुझे बिल्कुल दर्द नहीं हो रहा थी जबकि मेरा घाव इतना गहरा था कि मुझे अपनी हड्डी तक दिखाई दे रही थी."

हाजी पीर में भारत सेना के कब्ज़े के बाद पहली तस्वीर.
इमेज कैप्शन, हाजी पीर में भारत सेना के कब्ज़े के बाद पहली तस्वीर.

इसके बाद के अनुभव का जिक्र करते हुए ब्रिगेडियर अरविंदर सिंह याद करते हैं, "दो घंटे बाद मेजर दयाल वहां पहुंचे. उन्होंने मुझे घायल अवस्था में गिरे हुए देखा. वो मुझसे बात ही कर रहे थे कि उनकी दाहिनी तरफ़ गोलियों का बर्स्ट आया. वो बाल बाल बच गए. बाद में कमांडिंग ऑफ़िसर होते हुए भी उन्होंने कई घायल सैनिकों को अपने कंधों पर उठा कर सुरक्षित जगह पर पहुंचाया."

इस अभियान में साहसपूर्ण शौर्य दिखाने के लिए मेजर रंजीत दयाल और ब्रिगेडियर ज़ोरू बख़्शी को महावीर चक्र दिया गया.

लड़ने के लिए सिर्फ़ पत्थर

सैन्य इतिहासकार फ़ारूख़ बाजवा का कहना है कि पाकिस्तान के लिए हाजी पीर का बहुत महत्व था क्योंकि युद्ध की स्थिति में यहीं से घाटी में पहुंच चुकी पाकिस्तानी सेना को रसद भेजी जानी थी और इस रास्ते के ज़रिए ही पाकिस्तान की जिब्राल्टर फ़ोर्स के लोग भारतीय कश्मीर में घुसे थे.

बाद में ब्रिटिश सैनिक रिव्यू ने भारतीय सैनिकों की यह कह कर आलोचना की कि उन्हें हाजी पीर जीतने में चार दिन लगे जबकि पाकिस्तानियों ने पूरी ताक़त से उनका मुक़ाबला नहीं किया था.

ब्रिगेडियर ज़ोरू बख़्शी हाजी पीर पर भारतीय झंडा फहराने के बाद.
इमेज कैप्शन, ब्रिगेडियर ज़ोरू बख़्शी हाजी पीर पर भारतीय झंडा फहराने के बाद.

फ़ारूख़ बाजवा कहते हैं कि भारतीय सैनिकों को हाजी पीर जीतने में भले ही चार दिन लगे हों लेकिन ये पाकिस्तानी सेना के लिए एक बहुत बड़ा धक्का था. उसकी वजह से ही जिब्राल्टर बल भारतीय कश्मीर में ही फंसे रह गए और उन्हे वापस अपने देश जाने का रास्ता ही नहीं मिल पाया.

अल्ताफ़ गौहर ने अयूब पर लिखी अपनी किताब में लिखा है, "जैसे ही हाजी पीर पर भारतीय कब्ज़े की ख़बर पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष जनरल मूसा के पास आई, वो भागते हुए विदेश मंत्री भुट्टो के घर पहुंचे और उन्हें नक्शा खोल कर दिखाया कि किस तरह जिब्राल्टर बल कश्मीर में फंस गया है.

उन्होंने भुट्टो से कहा था, "माई व्वॉएज़ हैव नथिंग बट स्टोंस टू फ़ाइट विद."(मेरे लड़कों के पास लड़ने के लिए सिर्फ़ पत्थर बचे हैं).

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