महाराष्ट्र में एक भी महिला थाना नहीं

    • Author, आयुष देशपांडे
    • पदनाम, मुंबई से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
  • प्रकाशित

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक 2014 में महाराष्ट्र में महिलाओं के खिलाफ़ हुए जुर्म के 26,693 मामले दर्ज हुए जिसमें 3,438 रेप के मामले हैं.

प्रति एक लाख महिला आबादी के हिसाब से भारत में महिलाओं के ख़िलाफ़ जुर्म में महाराष्ट्र की भागीदारी 7.9 फ़ीसदी है.

बाकी राज्यों की तरह महाराष्ट्र में भी महिलाओं की सुरक्षा चिंता का कारण है, लेकिन जहाँ बाकी प्रदेश जैसे तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान आदि राज्यों में महिला पुलिस थाने मौजूद हैं, वहीं महाराष्ट्र में अभी तक पूरी तरह से महिला पुलिस थाना एक भी नहीं है.

'महिला अधिकारी ज़्यादा ज़रूरी'

महाराष्ट्र की महिला कांस्टेबल

बीबीसी ने इस बारे में मुंबई क्राइम ब्रांच के डीसीपी धनंजय कुलकर्णी से बात की. उनका तर्क कुछ अलग है.

वो कहते हैं, "महिला पुलिस थाना होने से ज़्यादा ज़रूरी है हर थाने में महिला अधिकारी का मौजूद होना, हम महिलाओं के दर्ज कराए गए मामलों को गंभीरता से लेते हैं और तुरंत कार्रवाई भी करते है."

महिला पुलिस थाना न होने की वजह पर उन्होंने बताया, "किसी एक क्षेत्र में हम महिला थाना इसलिए नहीं बना सकते क्योंकि उस क्षेत्र में पुरुष भी रहते हैं, फिर वे शिकायत करने कहा जाएंगे और एक क्षेत्र में एक ही पुलिस थाना होता है."

परेशानी

सड़क पर महिलाएं

पुणे में रह रही कल्पना आइटी फ़र्म में काम करती हैं.

उनकी शिकायत है कि एक महिला पुलिस अधिकारी से वो जिस तरह बिना झिझक बात कर सकती हैं, और वो जिस तरह परेशानी को ज़्यादा बेहतर समझ सकती हैं, वो पुरुष अधिकारी नहीं समझ सकते.

मुंबई की 24 साल की युवती नाम न बताने की शर्त पर अपनी आप बीती कुछ यूँ बताती हैं, "2014 में मुंबई के बांद्रा इलाके में मैं अपने एक मित्र के साथ देर रात घर जा रही थी, तब कुछ लोगों ने मेरे साथ ज़बरदस्ती की."

"इस हादसे की शिकायत करने जब मैं पुलिस थाने पहुचीं तब वहाँ मौजूद अधिकारियों ने मेरे पहनावे को लेकर सवाल उठाए. उन्होंने मुझ पर ही आरोप लगा दिए. ऐसे में अगर महिला अधिकारी होती तो वो मेरी हालत को बेहतर समझ सकती थी."

सवाल

ताज़ा जनगणना के मुताबिक़, राज्य में क़रीब साढ़े पांच करोड़ (5,41,31,277) महिलाएँ हैं.

लेकिन महिला अधिकारों के लिए काम कर रही मुंबई की परसिस सिधवा महिला थानों का होना ज़रूरी नहीं मानतीं.

लेकिन वे कहती हैं, “ज़रूरी है कि जो अधिकारी शिकायत दर्ज कर रहा है वो पीड़ित को सहयोग दें और बेहतर होगा अगर एक महिला अधिकारी ही पीड़ित का बयान दर्ज करे."

डीसीपी धनंजय कुलकर्णी न सिर्फ़ महिला थानों की ज़रूरत पर सवाल उठाते हैं बल्कि उनका ये भी कहना है आने वाले निकट भविष्य में महाराष्ट्र सरकार का महिला पुलिस थाना बनाने की कोई योजना भी नहीं है.

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