बिहारः अति पिछड़ों पर चलेगा मोदी का जादू?

मोदी रैली
    • Author, प्रोफ़ेसर संजय कुमार
    • पदनाम, सीएसडीएस, बीबीसी हिंदी डॉटकाम के लिए
  • प्रकाशित

बिहार में चुनावों के दौरान अति पिछड़ा वर्ग की भूमिका कुछ ख़ास हो जाती है.

इसकी मुख्य वजह है इस वर्ग के मतदाताओं की भारी तादाद. राज्य में तक़रीबन 25 फ़ीसदी वोटर अति पिछड़ा वर्ग के हैं.

पिछले दो चुनावों में अति पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं का रुझान भाजपा की ओर बढ़ा है.

क्या 2010 के विधानसभा और 2014 के लोकसभा चुनावों की तरह आने वाले विधानसभा चुनाव में भी इनका रुझान भाजपा के पक्ष में बना रहेगा?

पढ़ें, बिहार में अति पिछड़ा वर्ग के वोटिंग पैटर्न की कहानी का दूसरा हिस्सा.

इस कहानी का पहला हिस्सा <link type="page"><caption> यहां पढ़ें</caption><url href="http://www.bbc.com/hindi/india/2015/08/150815_bihar_obc_voting_pattern_part_one_sr" platform="highweb"/></link>.

भाजपा की ओर झुकाव

नीतीश कुमार और सुशील मोदी

पिछले साल हुए सर्वे नतीजे बताते हैं कि जदयू से गठबंधन टूटने के बाद अति पिछड़ी जातियों के मतदाताओं का भारी संख्या में झुकाव भाजपा की ओर हुआ.

इससे साफ़ संकेत मिलता है कि अति पिछड़ी जातियों के मतदाताओं में किसी दूसरी पार्टी के मुकाबले भाजपा ज़्यादा लोकप्रिय है.

साथ ही इस बात के भी संकेत हैं कि जदयू के साथ गठबंधन की वजह से अति पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं को अपनी अोर लाने में भाजपा को सुविधा हुई.

लेकिन यह भी सच है कि इनमें से ज़्यादातर मतदाताओं ने भाजपा की बजाय नीतीश कुमार का साथ दिया था.

इस तथ्य से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि 2014 के लोकसभा चुनाव में अति पिछड़े वर्ग के मतदाताओं का झुकाव एक ओर देखा गया था.

मोदी की लोकप्रियता

मोदी समर्थक

ऐसा उस समय नरेंद्र मोदी की निजी लोप्रियता की वजह से हुआ था.

लेकिन बहुत दावे से यह नहीं कहा जा सकता कि बिहार के अति पिछड़ा वर्ग के वोटरों में भाजपा की लोकप्रियता साल 2014 जैसी ही अभी भी है.

किसी को भी संदेह हो सकता है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में इन मतदाताओं का जो रुझान था, वह अगले चुनाव में भी बना रहेगा.

उपेंद्र कुशवाहा अभी भी भाजपा के साथ हैं. इसके अलावा पार्टी वोटरों को याद दिलाने में लगी हुई है कि प्रधानमंत्री अति पिछड़ा वर्ग के हैं.

टिकट बंटरवारे में ओबीसी उम्मीदवारों को तवज्जो देकर भाजपा चतुराई दिखा रही है. इससे लगता है कि अगले विधानसभा चुनावों में वह इनके वोटों का एक बड़ा हिस्सा अपनी ओर खींचने में कामयाब हो सकती है.

उम्मीद

लालू, नीतीश और शरद यादव

मंडल आंदोलन के बाद बिहार में जब पिछड़ा वर्ग सत्ता हासिल करने में क़ामयाब हो गया तो सत्ता पर उच्च पिछड़ा वर्ग का एकाधिकार सा हो गया था.

पहले पंद्रह सालों में, राजनीतिक सत्ता किसी न किसी रूप में प्रभावी पिछड़ा वर्ग से आने वाले यादवों के पास बनी रही.

जब साल 2005 में नीतीश कुमार की अगुवाई में जदयू-भाजपा गठबंधन सत्ता में पहुंचा तो यह सत्ता कुर्मियों के हाथ में आ गई.

अति पिछड़ा वर्ग को उम्मीद थी कि सत्ता का विकेंद्रीकरण होगा और आख़िरकार फ़ायदा उन तक पहुंचेगा.

कुछ सालों तक यह उम्मीद बरक़रार भी रही, लेकिन अब लगता है कि लोग नाउम्मीद हो चुके हैं.

आकांक्षा

पिछड़े वर्ग की महिलाएं

अति पिछड़ा वर्ग के लोगों को शायद यह उम्मीद अब भाजपा से है. उन्हें लगता है कि अगर वह पार्टी चुनाव जीतती है तो सत्ता की साझेदारी से उन्हें भी फ़ायदा मिल सकता है. भाजपा की ओर झुकाव होने की असली वजह यही है.

कोई नहीं जानता कि इसमें कितनी सच्चाई है, लेकिन उन्होंने अभी भी उम्मीद नहीं छो़ड़ी है.

लोगों के विचार उम्मीद, आकांक्षा और धारणा से बदलते हैं.

विचार बदलने से वोटों का झुकाव भी बदल जाता है.

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