गुजरात के शेर हुए सवा शेर

    • Author, अंकुर जैन
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

गुजरात में एशियाटिक लायंस की संख्या बीते पांच साल में 27 प्रतिशत बढ़ी है और ताज़ा आकंड़े बताते हैं कि गीर के जंगलों फिलहाल 523 शेर हैं.

गुजरात के गीर अभयारण्य में हर पांच साल पर शेरों की गिनती होती है. 2010 में पिछली गणना के दौरान इन शेरों की संख्या 411 पाई गई थी.

एशियाई शेरों को पर्शियन या इंडियन शेर भी कहा जाता है. ये अब केवल गुजरात के गीर अभयारण्य और इसके इर्द-गीर्द के इलाकों में सिमट कर रह गए हैं.

इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंसर्वेशन ऑफ नेचर यानी 'आईयूसीएन' ने कभी पूरे मध्य एशिया में फैले इन शेरों को विलुप्त हो रही प्रजाति की सूची में शामिल किया है.

सबसे बड़ी मुहिम

भारतीय वन्यजीव प्राधिकरण गुजरात ने मई में इन शेरों की गिनती की अब तक की सबसे बड़ी मुहिम की शुरुआत की.

इसके लिए 2,5000 भारतीय वन्यजीव प्राधिकरण और स्वंयसवकों को 600 टीमों में बांटा गया.

ताज़ा गणना के अनुसार गुजरात के 1,400 वर्ग किलोमीटर के सासन गीर अभयारण्य में पाए जाने वाले शेर अब 21,000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र तक फैल गए हैं.

ताज़ा आकड़ों के अनुसार कुल 523 शेरों में 109 वयस्क नर शेर, 201 वयस्क मादा शेर और 213 शावक शामिल हैं.

गुजरात वन अधिकारी सीएन पांडे का कहना है कि इस बार 'प्रत्यक्ष गणना विधि' यानी शेरों को सीधे देखकर उनकी गणना की गई है.

उन्होंने बताया, "गर्मियों में जंगल का तापमान 45 डिग्री से भी ऊपर चला जाता है. ऐसे में, शेर अमूमन नदियों या पानी वाली जगहों के आस-पास ही मिल जाया करते हैं जिससे उनको गिनने में सुविधा हुई."

जीपीएस और जीआईएस

शेरों की गणना 2015 में जीपीएस और जीआईएस की मदद से उनकी तस्वीरें ली गईं और उनके व्यवहार, गतिविधि और समूह के विस्तार का अध्ययन किया गया.

सीएन पांडे ने कहा, “गणना में जुटे लोगों ने इस बार ख़ास पहचान मसलन चेहरे के निशान, कान के आकार, पूंछ के बालों का गुच्छा, रंग और पेट की लकीरों को भी इस बार रिकॉर्ड किया. शेरों के समूह की गतिविधि, आकार और गठन की भी हर जानकारी ली गई.”

वन्यजीव अधिकारियों की एक टीम शेरों के समूह और शिकार की जगह को समझने के लिए 9 महीने पहले ही गणना की तैयारियों में जुट गई थी.

आख़िर में इन जानकारियों को नक्शे पर डाला गया और इसे गणना करने में जुटे लोगों को शेरों की मौजूदगी का पता लगाने के लिए मुहैया कराया गया.

इन शेरों की आबादी 20वीं सदी की शुरुआत में शिकार और सूखे के कारण कम होकर दर्जन भर रह गई थी.

फिर उस वक्त जूनागढ़ के नवाब महाबत खांजी ने शेरों के शिकार पर पाबंदी लगा दी थी. वे जानवरों से प्यार करते थे.

शेरों की मौत

गुजरात के गीर अभयारण्य अधिकारी संदीप कुमार का कहना है कि आज गुजरात के 8 जिलों के 1,500 गांवों में शेरों की उपस्थिति पाई गई है.

कुमार ने बताया, “अफ्रीकी शेरों की आबादी 80 फीसदी कम हो गई है जबकि एशियाई शेरों की आबादी में नियमित रूप से इजाफ़ा हो रहा है.”

हालांकि शेरों की आबादी बढ़ने से इंसानों से उनके टकराव की संभावना भी बढ़ती है.

एक आंकड़े के मुताबिक पिछले पांच सालों में इस इलाक़े में 260 शेरों की मौतें हुई हैं. वन अधिकारी स्वीकार करते हैं कि इनमें से 20 फीसदी से अधिक मौतें आकस्मिक हैं.

पिछले दो सालों में यहां 12 शेरों के हमले में 14 लोगों की मौत और114 लोग घायल हुए हैं.

गुजरात सरकार वन्यजीव संरक्षण के लिए सलाना 50 करोड़ रुपए खर्च करती है, जबकि इनमें से आधी राशि शेरों पर ख़र्च की जाती है.

लेकिन आलोचकों का कहना है कि पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए खर्च की जाने वाली भारी-भरकम राशि के मुकाबले ये राशि पांच फीसदी से भी कम है.

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