बनेगा इंडिया? लेकिन बिना बिजली कैसे..

    • Author, रवि प्रकाश
    • पदनाम, रांची से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
  • प्रकाशित

54 साल के प्रकाश हितमसरिया की पीवीसी पाइप बनाने वाली कंपनी कई सालों से बंद है.

बंदी के वक्त कंपनी का टर्नओवर करीब 4 करोड़ रुपये सालाना था.

प्रकाश के मुताबिक़ आईएसआई और आईएसओ प्रमाणित उनकी कंपनी की शुरुआत में ही बिजली विभाग की तरफ़ से तमाम मुश्किलें पेश आईं.

वो बताते हैं कि उनकी कंपनी के नाम लाखों का बिल आ गया जिससे उनकी कंपनी के बंद होने की नौबत आ गई.

अब 12 साल के बाद हितमसरिया फिर से अपनी कंपनी खोलने की योजना बना रहे हैं.

हितमसरिया ने बीबीसी हिन्दी को बताया कि रांची के लोअर चुटिया इलाके में स्थित उनकी कंपनी को कोकर पावर सब स्टेशन से सप्लाई मिलती थी. वहां एबीसी स्विच नहीं लगा था.

नतीजतन मामूली फाल्ट होने पर भी पावर सप्लाई रुक जाती थी. इस कारण फ़ैक्ट्री में लगा कच्चा माल बर्बाद हो जाता था.

टाटा भी गए कोर्ट

बिजली विभाग से होने वाली दिक्कतों के बारे में बताते हुए हितमसरिया कहते हैं, “झारखंड में आटा चक्की से लेकर टाटा जैसे बड़े समूह भी समय-समय पर बिजली विभाग के खिलाफ कोर्ट में गए हैं.”

35 वर्षीय मयंक माहेश्वरी एसएसएच एग्रोटेक प्राइवेट लिमिटेड के मालिक हैं. उनकी कंपनी लोहे का सरिया बनाने वाली झारखंड की एकमात्र कंपनी है. अब उन्होंने बिजली की अनुपलब्धता के कारण होने वाले घाटे की भरपाई के लिए कंपनी के शेयर लिक्विडेट किए हैं.

मयंक ने बताया कि दिसंबर 2007 में कंपनी शुरू करते वक्त बिजली को लेकर काफी परेशानी हुई. रांची के पास टाटी सिलवे इंडस्ट्रियल एरिया में स्थित उनकी कंपनी को अपने उत्पादन के लिए 33 केवीए की सप्लाई चाहिए थी.

सप्लाई करने में असमर्थता

बिजली विभाग ने इतनी सप्लाई देने में असमर्थता जताई. वो दावा करते हैं कि उसके बाद उन्होंने टाटी सिलवे पावर सब स्टेशन से अपने प्लांट तक अपने खर्च पर तार और पोल लगवाकर सप्लाई शुरू कराई.

इसके बाद भी बिजली की कमी बरकरार रही. इसका असर उत्पादन पर पड़ा और 70-80 मजदूरों और करीब 12 करोड़ रुपये तक के वार्षिक टर्नओवर वाली उनकी कंपनी घाटे में चली गई.

माहेश्वरी ने बताया, “मैंने सप्लाई दुरुस्त कराने को लेकर उर्जा सचिव, उद्योग सचिव और बिजली नियामक बोर्ड के अध्यक्ष से भी मुलाकात की. लेकिन समस्या दूर नहीं हुई.”

मयंक माहेश्वरी के मुताबिक़ झारखंड मे कोई भी उद्योग लगाकर चला लेना तब तक संभव नहीं है, जब तक कि सरकार पर्याप्त बिजली आपूर्ति नहीं कर पाए.

बिजली का गुणा-भाग

झारखंड राज्य स्मॉल स्केल इंडस्ट्रीज एसोससिएशन के अध्यक्ष शरद पोद्दार कहते हैं, “मेक इन इंडिया जैसे नारे विकसित प्रदेशों के लिए हैं. बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, असम और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में इस नारे का कोई मतलब नहीं. झारखंड में तो दर्जनों इंडस्ट्रीज सिर्फ बिजली के कारण बंद पड़ी हैं. सरकार इन्हें फिर से नहीं खुलवा पा रही तो नए उद्योग क्या लगाएगी.”

एक अनुमान के मुताबिक झारखंड में कुल 1500 मेगावाट बिजली की ज़रूरत है. जबकि यहां पीटीपीएस से 120 मेगावॉट, टीवीएनएल से 180 मेगावॉट, आईपीपी से 60 मेगावाट और सिकिदरी से (सिर्फ बारिश के मौसम में) 120 मेगावॉट बिजली का उत्पादन हो पाता है.

शरद पोद्दार,
इमेज कैप्शन, शरद पोद्दार मानते हैं कि मेक इन इंडिया जैसे नारे विकसित प्रदेशों के लिए हैं.

बाकी की बिजली के लिए सेंट्रल पूल के 400 मेगावाट और एनटीपीसी और एनएचपीसी पर निर्भरता है. अगर इन जगहों से बिजली नहीं मिली तो पावर कट लाज़िमी है.

वह भी तब जब धनबाद, बोकारो, हजारीबाग, चतरा, कोडरमा, गिरिडीह और रामगढ़ जिलों में पावर सप्लाई का पूरा जिम्मा डीवीसी (दामोदर वैली कारपोरेशन) उठा रहा है.

ऐसे में झारखंड जैसे राज्य में मेक इन इंडिया का सपना साकार करने के लिए सरकार को पहले मौजूदा हालात में ज़बरदस्त सुधार करने की ज़रूरत है.

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