शार्ली एब्डो, भारत पर भी कुछ असर हुआ है?

शार्ली एब्डो पत्रिका पढ़ता आदमी
    • Author, सिद्धार्थ वरदराजन
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
  • प्रकाशित

फ्रांस में शार्ली एब्डो पत्रिका पर हुआ हमला एक हिला देना वाली घटना थी. मीडिया से जुड़े होने के कारण इस घटना का विभिन्न चैनलों में व्यापक कवरेज़ देखने को मिला.

ऐसा हमला किसी भी इदारे पर होता लोगों की उसमें रुचि होती लेकिन एक अख़बार पर हमला होना थोड़ा ज़्यादा चौंकाने वाला था.

चूँकि यह मामला पत्रकारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ मामला था इसलिए भी मीडिया और जनता ने इसमें अधिक रुचि दिखाई.

शार्ली एब्डो जिस तरह का व्यंग्य अख़बार है भारत में ऐसा कोई अख़बार शायद ही कोई है.

इस घटना के बाद इस अख़बार के बारे में बहुत से लोगों को पता चला.

सकारात्मक है चर्चा होना

शार्ली एब्डो पत्रिका

मुझे लगता है कि भारत में इस घटना को लेकर लोगों के बीच व्यापक चर्चा होना सकारात्मक है.

इससे एक सहमति बनती दिखी कि अगर किसी अख़बार या पत्रिका में प्रकाशित किसी सामाग्री पर आपको आपत्ति हो तो भी उसके ख़िलाफ़ प्रतिक्रिया देने का एक तरीका होता है. इस तरह हमला करने को कोई समर्थन नहीं दे सकता.

फ्रांस में लाखों लोग पत्रिका के समर्थन में सड़क पर उतरे.

वहीं भारत में मुंबई हमले के बाद दो-तीन दिनों तक ऐसा लगा कि सियासतदां आपसी मतभेद भुलाकर एक राष्ट्रीय प्रतिक्रिया देना चाहते हैं लेकिन हमारे यहाँ चीज़ों का इतना राजनीतिकरण हो चुका है कि फ्रांस जैसी प्रतिक्रिया देखने की उम्मीद करना मुश्किल है.

भारत में प्रतिबंध और हमले

वेंडी डोनिगर की किताब द हिन्दूज़
इमेज कैप्शन, वेंडी डोनिगर की किताब द हिन्दूज़ को अदालती विवाद के बाद प्रकाशक ने वापस ले लिया था.

भारत में कई किताबों पर प्रतिबंध लगाया गया, अख़बारों और टीवी के दफ़्तरों, फ़िल्म थिएटरों पर हमले हुए लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर भारत में जितनी आवाज़ उठनी चाहिए, उतनी नहीं उठती.

शार्ली एब्डो की घटना के बाद भारत में अगर कोई प्रतिबंध की बात करता है या किसी सांस्कृतिक कलाकार के ख़िलाफ़ हिंसा करता है तो मुझे उम्मीद है कि सियासी तौर पर और आम जनता के स्तर पर ऐसी चीज़ों के ख़िलाफ़ पुरजोर आवाज़ उठाई जाएगी.

मुझे लगता है कि भारत में ऐसी चीज़ों के ख़िलाफ़ आम लोगों के सामने न आने के पीछे डर भी एक कारण है. पुलिस की जिम्मेदारी है कि वो गुंडों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करे और आम जनता के रक्षा के लिए काम करे, लेकिन ऐसा होता नहीं.

पुलिस नहीं करती कार्रवाई

फ्रेंच दूतावास

एक फ़िल्म सेंसर बोर्ड से प्रमाणपत्र पाने के बाद रिलीज़ होती है लेकिन कुछ शरारती तत्व थिएटरों पर हमला करते हैं और फ़िल्म के पोस्टर फाड़ते हैं. पुलिस ऐसे लोगों पर कार्रवाई करती नहीं प्रतीत होती इसलिए आम लोग थोड़े से डर जाते हैं.

ऐसे में अगर मुझे दोषी ठहराना होगा तो भारत की कानून व्यवस्था लागू करने वाली संस्थाओं को ठहराऊँगा.

जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला होता है तो पुलिस क्यों चुप बैठती है? ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की जाती?

पीके, आमिर ख़ान
इमेज कैप्शन, आमिर ख़ान की फ़िल्म पीके के ख़िलाफ़ कुछ लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया था.

भारतीय मीडिया ऐसे मामले में आम तौर पर एक उदार और आलोचनात्मक रुख अपनाता है.

लेकिन जब सियासतदान और पुलिस राजनीतिक कारणों से कार्रवाई करने से पीछे हट जाते हैं तो आम आदमी पीछे हट जाता है और आख़िरकार मीडिया भी पीछे हट जाता है.

ऐसे मामलों में भारतीय मीडिया को कोर्ट से भी उतनी मदद नहीं मिलती जितनी मिलनी चाहिए.

(निखिल रंजन से बातचीत पर आधारित)

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