जेलों में पिसने को मजबूर

जेल, छत्तीसगढ़
    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, बस्तर, छत्तीसगढ़ से
  • प्रकाशित

लंबे समय से नक्सली हिंसा से जूझ रहे छत्तीसगढ़ की जेलों को 'नक्सलियों की पाठशाला' कहा जाता है

देश के विभिन्न जेलों में रह रहे विचाराधीन क़ैदियों के हाल और हालात पर बीबीसी हिन्दी पेश कर रही है विशेष शृंखला.

पढ़ें इस सिरीज़ की सातवीं कहानी

सुनील (बदला हुआ नाम) पेशे से सरकारी अध्यापक हैं और उनकी नियुक्ति बस्तर के नारायणपुर ज़िले में स्थित सबसे संवेदनशील अबूझमाड़ के इलाक़े में है.

उनका कहना है कि कोडेनार गांव में जिस दिन स्वास्थ्य शिविर लगा उसके अगले दिन उन्हें नक्सली समर्थक बताकर गिरफ़्तार कर लिया गया.

कई सालों तक उनके ख़िलाफ़ केस चला लेकिन फिर उन्हें अदालत ने बरी कर दिया.

सिर्फ सुनील ही नहीं, बस्तर की जेलों में कई ऐसे क़ैदी हैं जिन्हें नक्सली समर्थक होने के आरोप में बंद कर दिया गया हो.

दूसरा मामला बुधराम का है जिन्हें एक नक्सली हिंसा के मामले में गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया गया.

छह महीनों तक जेल में रहने के बाद बुधराम को बाइज़्ज़त बरी कर दिया गया.

पिसते लोग

बुधराम, छत्तीसगढ़
इमेज कैप्शन, बुधराम

बस्तर स्थित बुधराम के गाँव में जब मेरी उनसे मुलाक़ात हुई तो उनका कहना था कि माओवादी अगर अपने संगठन का विस्तार कर रहे हैं तो इसमें बहुत बड़ी भूमिका पुलिस और प्रशासन की है.

बुधराम ख़ुशकिस्मत थे कि उन्हें एक अच्छा वकील रखने का मौक़ा मिल गया और वो भी इस लिए कि उनका गाँव उतना सुदूर नहीं है जितना बस्तर की जेलों में बंद दूसरे 'बेगुनाह' आदिवासियों का.

चूँकि बस्तर का इलाक़ा सुरक्षा बलों और माओवादियों के बीच चल रहे संघर्ष का केंद्र है, इस इलाक़े के आदिवासी इस संघर्ष में पिस रहे हैं.

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नारायणपुर में साप्ताहिक हाट लगता है और इस हाट में सुदूर इलाक़ों में रहने वाले आदिवासी कई मीलों का सफर पैदल तय कर पहुँचते हैं.

लेकिन अब इन साप्ताहिक हाटों पर पुलिस की नज़र है क्योंकि यहाँ जंगलों से आने वाले आदिवासियों के नाम और गाँवों के नाम दर्ज किए जाते हैं.

अबूझ़माड़, नक्सल

नारायणपुर के साप्ताहिक हाट में मेरी नज़र कुछ आदिवासी नौजवानों पर पड़ी जो धनौरा गाँव से आये हुए थे.

पुलिस ने उनकी तलाशी लेते हुए उन्हें इस बात का अहसास कराया कि वो एक संवेदनशील इलाक़े से आते हैं और उन पर नज़र रखी जा रही है.

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नाराज़गी

सड़कों पर पुलिस के तलाशी अभियान से लोग क्षुब्ध नज़र आ रहे थे.

कई सालों से आदिवासियों के मामले लड़ते रहने वाले वकीलों का मानना है कि 'निर्दोष' अनपढ़ आदिवासी जब नक्सल जेल जाते हैं तो उन्हें इल्म तक नहीं होता कि उनके साथ हो क्या रहा है.

सोनी, सोढ़ी
इमेज कैप्शन, सोनी सोढ़ी

मगर बाद में जब वो जेल से बाहर निकलकर आता है तो वो एक वामपंथी विचारक बन चुका होता है.

वकील अरविंद चौधरी कहते हैं कि निर्दोष लोगों को अगर फ़र्ज़ी मामलों में फंसाया जाता है तो वो मुख्यधारा से खुद को अलग मानने लगते हैं. उन्हें प्रशासनिक तंत्र पर विश्वास नहीं रह जाता है.

वो कहते हैं, "आदिवासी स्वभाव से शर्मीले होते हैं. इसी लिए वो खुलकर कुछ नहीं कह पाते. इसी कमज़ोरी का फायदा सुरक्षा बल के जवान उठाते हैं."

<link type="page"><caption> पढ़िये शृंखला की तीसरी कहानी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/12/141210_undertrials_bbc_series_03_women_issue_vr" platform="highweb"/></link>

'कौन करेगा भरपाई'

आदिवासियों की बात की जाए तो बस्तर के दंतेवाड़ा की शिक्षक सोनी सोढ़ी का उदाहरण सामने है.

हालांकि उन्हें पांच मामलों में बरी कर दिया गया है मगर उनके पति अनिल फुटाने जब निर्दोष साबित होकर जेल से बाहर निकले तो उनके चार साल सलाखों के पीछे बीत चुके थे.

जगदलपुर, जेल

बीबीसी से बात करते हुए वो कहती हैं, "निर्दोष रहते हुए भी उन्हें इतने साल जेल में रहना पड़ा. इससे उनकी मानसिक स्थिति काफी खराब हो चुकी थी. फिर बाहर निकलते ही वो फालिज का शिकार हो गए और दम तोड़ दिया. अब उनका जेल में बिताया हुआ वक़्त और वो नुकसान जो हमारे परिवार ने उठाया है, उसकी भरपाई कौन करेगा? "

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छत्तीसगढ़ में निर्दोष आदिवासियों को जेल में बंद किए जाने के माओवादियों के आरोप के बाद सरकार ने मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्य सचिव निर्मला बुच के नेतृत्व में एक कमेटी का गठन किया है.

कमेटी ने भी अपनी सुनवाई के दौरान स्वीकार किया है कि कई निर्दोष आदिवासी ऐसे हैं जिन्हे जेल में बंद रखा गया है.

कमेटी ने सरकार को 249 ऐसे आदिवासी पुरूष और महिलाओं की सूची सरकार को सौंपी है जिन्हे निर्दोष होने के तौर पर चिन्हित किया गया है.

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