क्या नाबालिग के यौन उत्पीड़न के लिए शरीर को छूना ज़रूरी है?

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    • Author, दिव्या आर्य
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
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सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई हाई कोर्ट की नागपुर बेंच के उस फ़ैसले पर रोक लगा दी है जिसमें एक अभियुक्त को यौन उत्पीड़न के अपराध से इसलिए बरी कर दिया गया क्योंकि 'कपड़े उतारे बगैर शरीर को छूने' को बेंच ने यौन उत्पीड़न नहीं माना.

भारत के एटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को कहा कि यौन उत्पीड़न के मामलों के लिए, "हाई कोर्ट का ये फ़ैसला परेशान करनेवाला है, और ग़लत उदाहरण तय करता है."

ये मामला सबसे पहले निचली अदालत में सुना गया. सुनवाई में 39 वर्षीय आदमी को 12 साल की लड़की के यौन उत्पीड़न का दोषी पाया गया और सज़ा सुनाई गई.

जब उस व्यक्ति ने इसके ख़िलाफ़ मुंबई हाई कोर्ट की नागपुर बेंच हाई कोर्ट में अपील की तो कोर्ट ने कुछ सवाल उठाए. उनमें सबसे अहम ये कि बिना सहमति से ही सही, अगर एक नाबालिग का शरीर बिना कपड़े उतारे छुआ गया है तो ये कैसा अपराध माना जाए?

ये तीन साल की न्यूनतम सज़ा वाले पॉक्सो क़ानून के सेक्शन सात के तहत यौन उत्पीड़न है या एक साल की न्यूनतम सज़ा वाली भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के तहत 'महिला की लज्जा भंग करने के इरादे से किया हमला' है.

यौन उत्पीड़न

कोर्ट ने इसे यौन उत्पीड़न नहीं माना और कपड़े न हटाए जाने की बिनाह पर एक निचली अदालत के फ़ैसले में दी गई सज़ा कम कर एक साल तय कर दी.

लेकिन जानकारों के मुताबिक इस सवाल की भूमिका ही ग़लत है. क्योंकि यौन हिंसा के ख़िलाफ़ बने क़ानूनों में उत्पीड़न तय करने के लिए कपड़ों के उतारे जाने या शरीर के शरीर से छूने की कोई शर्त का उल्लेख नहीं है.

यौन हिंसा के पीड़ितों को क़ानूनी मदद देने वाली मुंबई स्थित संस्था, मजलिस लीगल सेंटर की ऑड्री डि-मेलो ने बीबीसी से कहा, "मैं इस फ़ैसले से हैरान हूं, खास तौर पर इसलिए क्योंकि न्यायपालिका की ज़िम्मेदारी होती है क़ानून को सुधारवादी रवैये से लागू करना जो इस केस में बिल्कुल नहीं हुआ. क़ानून, अपराध तय करने के लिए कपड़ों के होने या न होने को ज़रूरी नहीं मानता, बल्कि यौन हिंसा की मंशा को तवज्जो देता है. तो जो क़ानून में है ही नहीं उसे फ़ैसले की बुनियाद बनाना पीड़िता के लिए बहुत ही नकारात्मक कदम है."

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क्या कहता है क़ानून?

भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के मुताबिक, "अगर कोई व्यक्ति ज़बरदस्ती एक महिला पर उसकी लज्जा भंग करने के इरादे से हमला करे तो उसे न्यूनतम एक साल और अधिकतम पाँच साल की सज़ा दी जा सकती है."

पॉक्सो क़ानून की धारा सात के मुताबिक, "अगर कोई व्यक्ति यौन मंशा से बच्चे के गुप्तांगों या छाती को छूता है, या बच्चे को अपने या किसी और व्यक्ति के गुप्तांगों या छाती को यौन मंशा से छूने पर मजबूर करता है, या कोई और ऐसा काम करता है जिसमें पेनिट्रेशन के बिना किसी तरीके का शारीरिक संबंध बनाया जाए, तो उसे यौन उत्पीड़न का दोषी माना जाएगा."

साल 2012 में पारित किया गया पॉक्सो क़ानून ख़ास नाबालिगों के ख़िलाफ़ यौन हिंसा के अपराधों की परिभाषा, न्यायिक प्रक्रिया और दंड तय करता है.

पॉक्सो क़ानून की धारा 42 के मुताबिक अगर कोई यौन अपराध बच्चे के खिलाफ़ हो और पॉक्सो क़ानून में पहले के क़ानूनों से कोई अलग बात हो तो पॉक्सो के प्रावधानों को ही मान्य माना जाएगा.

लेकिन इस मामले में मुंबई हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने पॉक्सो की जगह आईपीसी की धारा 354 को इस्तेमाल करना सही समझा और अपराध को यौन उत्पीड़न मानने से इनकार कर दिया.

देश के 18 राज्यों में बच्चों के साथ काम करनेवाले गैर-सरकारी संगठन, 'सेव द चिल्ड्रन' के 'चाइल्ड प्रोटेक्शन' विभाग के प्रमुख प्रभात कुमार इस मामले में पीड़िता पर होनेवाले असर के नज़रिए से अपना आकलन देते हैं.

वो रेखांकित करते हैं कि पॉक्सो क़ानून बच्चों के हित को सबसे ऊपर रखने के इरादे से लाया गया था और ये उसके दिशा-निर्देश में साफ़ लिखा भी गया है.

प्रभात कुमार के मुताबिक, "इस फ़ैसले में अपराधी के पक्ष को तरजीह दी गई है और बच्चों के ख़िलाफ़ यौन अपराध के मूल नियम को किनारे किया गया है."

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जितना अपराध, उतनी सज़ा

इस मामले में हाई कोर्ट की जज ने अपराध के हिसाब से सज़ा तय करने की बात भी उठाई है.

फैसले में दी गई जानकारी के मुताबिक अभियुक्त ने खुद से 25 साल छोटी लड़की को बहलाया और एक कमरे में ले गया. उसके कपड़े उतारे बगैर उसकी छाती छूने की कोशिश की और सलवार उतारने के लिए बढ़ा.

पीड़िता के चिल्लाने पर अपने हाथ से उसका मुंह भींचा और फिर कमरा बाहर से बंद कर दिया. बेटी की चीखें सुन कर मां उसे ढूंढने लगीं और उस कमरे तक पहुंच उसे आज़ाद करवाने में कामयाब हुई.

जज ने न्यूनतम तीन साल की सज़ा को तय अपराध के लिए ज़्यादा माना है.

लेकिन प्रभात कुमार के मुताबिक अपराध की गंभीरता समझने के लिए उसका नाबालिग पर मानसिक असर जानना ज़रूरी है.

वो कहते हैं, "हिंसा का स्तर वयस्क महिलाओं में अलग मायने रख सकता है पर नाबालिगों में इतनी अहमियत नहीं रखता. बच्चे को ग़लत तरीके से छुए जाने का अहसास भर और किसी वयस्क के साथ असुरक्षित होने की भावना ही लंबे समय तक मन में गहरा असर छोड़ सकती है."

साल 2012 में निर्भया के बलात्कार के बाद तेज़ हुई क़ानून सुधार की प्रक्रिया और उससे कई दशक पहले से नारीवादी ऐक्टिविस्ट्स की कोशिशों के फलस्वरूप ही हिंसा की परिभाषा बढ़ाई गई, पीड़िता के हितों को ध्यान में रखने वाली न्याय प्रणाली तय की गई और दंड कड़े किए गए.

कई जानकारों के मुताबिक कड़े न्यूनतम दंड कई मामलों में फायदे की जगह नुकसान पहुंचा रहे हैं.

ऑड्री डि-मेलो कहती हैं, "यौन हिंसा के अपराधी हमारे समाज से ही आते हैं तो सज़ा तय करते वक्त जज उनकी पृष्ठभूमि, पहली बार किया गया अपराध, परिवार की ज़िम्मेदारी जैसे पहलूओं को भी ध्यान में रखते हैं. और हमने देखा है कि कई मामलों में न्यूनतम सज़ा कड़ी किए जाने की वजह से जज अभियुक्त को जेल भेजने की जगह बरी कर देते हैं."

उनके मुताबिक कड़ी सज़ा को इंसाफ पाने का ज़रिया मानना सही रवैया नहीं है, बल्कि अपराध को बारीकी से देखकर, सही प्रक्रिया का पालन करना बेहतर है. हालांकि वो ये कहती हैं कि ये बहस संसद और सड़क के लिए है और इस मामले में न्यायपालिका को यौन हिंसा के मौजूदा क़ानून के तहत पीड़िता को न्याय देने तक खुद को सीमित रखना चाहिए था.

सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल हाई कोर्ट के फ़ैसले पर रोक लगा दी है और महाराष्ट्र सरकार को नोटिस जारी किया है. एटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा है कि वो हाई कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर करेंगे.

(सुप्रीम कोर्ट से अतिरिक्त रिपोर्टिंग - सुचित्र मोहंती)

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