कोरोना लॉकडाउन: कहां जाएंगे मज़दूर और उनके परिवार

कोरोना वायरस, मज़दूर वर्ग
    • Author, मानसी दाश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 6 मिनट

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को घोषणा की कि 24 मार्च की रात 12 बजे से 21 दिनों तक पूरा देश पूरी तरह से बंद रहेगा.

उन्होंने इसे कर्फ्यू की तरह का लॉकडाउन कहा है, जिस दौरान ज़रूरी वस्तुएं और दवाएं वगैरह उपलब्ध होंगी लेकिन लोगों से कहा गया है कि वो कोरोना वायरस से बचने के लिए किसी सूरत में अपने घरों से बाहर न निकलें.

उन्होंने कहा, "मैं हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूं कि इस समय आप देश में जहां भी हैं, वहीं रहें. 21 दिनों के लिए भूल जाइए कि बाहर निकलना क्या होता है. घर में रहिए और एक ही काम कीजिए- अपने घर में रहना."

माना जा रहा है कि इसका सबसे बुरा असर भारत के मज़दूर वर्ग और असंगठित क्षेत्र पर पड़ सकता है जिनके लिए रोज़ाना काम पर जाना बेहद ज़रूरी होता है.

एक महिला

मज़दूरों, उनके परिवारों के लिए मुश्किल वक्त

जाने माने अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज़ कहते हैं, "भारत में काम करने वालों में से करीब 80 फीसदी असंगठित क्षेत्र में लगे हैं. अगर ये देखा जाए कि कितने लोग अनौपचारिक श्रम पर निर्भर करते हैं यानी रोज़ाना मज़दूरी करने के लिए बाध्य हैं तो ये ग्रामीण इलाक़ों में काम करने वालों का एक चौथाई हिस्सा है. ये अपने आप में छोटी संख्या नहीं है."

वो कहते हैं, "न केवल मज़दूर वर्ग बल्कि वो लोग जिनके पास इतना लंबा स्टेइंग पावर नहीं है उनके लिए ये बेहद मुश्किल का दौर हो सकता है, ख़ास कर पेन्शन पर निर्भर रहने वाले लोगों के लिए."

आर्थिक मामलों पर नज़र रखने वाली वरिष्ठ पत्रकार सुषमा रामचंद्रन इस बात से इत्तेफ़ाक रखती हैं. वो कहती हैं कि फिलहाल ठीक ठीक बताना मुश्किल है कि कितनी बड़ी संख्या पर इसका सीधा असर होगा.

वो कहती हैं, "भारत का असंगठित क्षेत्र काफी बड़ा है. बंदी का असर आय करने वाले सिर्फ एक व्यक्ति पर नहीं बल्कि उसके पूरे परिवार पर पड़ेगा. और ये आंकड़ा लाखों करोड़ों परिवारों में होगा."

ज्यां द्रेज़ समझाते हैं कि भारत में एक राज्य के लोग दूसरे राज्यों में जा कर काम कर रहे हैं और ऐसे में इन मज़दूरों के घर उनके काम की जगह से दूर हैं. कामबंदी के कारण उनके सामने अब 21 दिनों तक ज़िंदा रहने की मुश्किल है, क्योंकि वो ट्रेनों के कैंसल होने के कारण घर लौट नहीं पा रहे हैं.

कोरोना वायरस, मज़दूर वर्ग

ज्यां द्रेज़ सवाल करते हैं कि इन मज़दूरों से कहा जा रहा है कि अपने घरों पर रहें लेकिन उनके घर हैं कहां?

"लेकिन ये मुश्किल केवल इन लोगों तक सीमित नहीं है. गांव में रह रहे उनके परिवार उनके भेजे पैसों पर पर पूरी तरह निर्भर होते हैं. कामबंदी की सूरत में दोनों के लिए ही बहुत बड़ी समस्या खड़ी हो जाती है क्योंकि न तो काम होगा न ही कमाई.

वहीं सुषमा रामचंद्रन बताती हैं, "देश के कई हिस्सों में एक सप्ताह पहले ही लॉकडाउन जैसी स्थिति है. अब और तीन सप्ताह की मज़दूरी का ख़त्म हो जाने का अर्थ होगा कि पूरी आर्थिक गतिविधियां ठप पड़ जाएंगी. इसका असर विकास दर पर तो होगा ही लेकिन इसका असर केवल एक महीने बाद ख़त्म बहोगा ऐसा नहीं है."

"कोई भी काम एक दिन में शुरू नहीं हो सकता. कई सप्ताह तक बंद पड़े काम को शुरू करने में भी वक्त लगेगा क्योंकि जो गांव गए हैं वो वापिस आएंगे, काम शुरू करने के लिए कच्चा माल आएगा उसके बाद ही काम शुरू हो सकता है. ऐसे में सीधे तौर पर कहा जा सकता है कि सामन्य रूप से काम शुरू होने में कम से कम और दो महीनों का वक्त लग ही जाएगा."

जल्दबाज़ी में लिया गया फ़ैसला

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ज्यां द्रेज़ कहते हैं कि ऐसा लगता है कि ये फ़ैसला जल्दबाज़ी में लिया गया है और इसके लिए उचित व्यवस्था नहीं की गई है.

वो कहते हैं कि मौजूदा हालात को देखते है पूरे देश में एक तरह के बंदी करने की ज़रूरत तो है लेकिन इसके लिए पूरी व्यवस्था करने की भी ज़रूरत है.

वित्त मंत्री ने मंगलवार को ही कोरोना महामारी के मद्देनज़र डेढ़ करोड़ से कम टर्नओवर वाली कंपनियों से ब्याज़ नहीं लेने की बात की है और इनकम टैक्स रिटर्न फ़ाइल करने की तारीख़ 30 जून तक बढ़ा दी है.

वो सवाल करते हैं कि "क्या सरकार कुछ महीनों के लिए गरीबों के लिए कोई राहत योजना नहीं ला सकती थी?"

वहीं सुषमा रामचंद्रन कहती हैं, "सरकार ने फ़ैसला लेने से पहले विचार तो किया ही होगा. सरकार ने कहा है कि लोग ऑनलाइन चीज़ें खरीद सकते हैं लेकिन ये मानना पड़ेगा कि शायद पुलिस को सही जानकारी नहीं दी गई है क्योंकि सामान डिलीवरी करने वाले व्यक्ति को पुलिस ने गिरफ्तार किया है."

24 मार्च को मुंबई में पुलिस से सामान डिलीवरी के लिए जा रही गाड़ियों को जाने नहीं दिया और कुछ डिलीवरी बॉयज़ को गिरफ्तार भी किया.

ई-कॉमर्स कंपनियों के लिए काम करना मुश्किल हो रहा है क्योंकि (1) भारत में कम ही ई-कॉमर्स कंपनियां हैं (2) छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में ऑनलाइन सामान खरीदने वाले लोग कम ही हैं.

सुषमा रामचंद्रन कहती हैं कि केंद्र सरकार के पास गेहूं और चावल के स्टॉक हैं सरकार को उसका फायदा लेना चाहिए. लेकिन मुश्किल फिलहाल इन्हें लोगों तक पहुंचाने की है जिसके लिए सरकार को कदम उठाने की ज़रूरत है ताकि कमी न हो.

सरकार को सुनिश्चित करना होगा कि कैसे सामान किराना दुकान तक पहुंचे और वहां काम कर रहे लोग बंदी के कारण परेशान न हों. दुकान पर काम करने वाले लोग और मज़दूर ही होंगे और सरकार को इसके प्रति सजग होना होगा कि कैसे लोगों को कमी न हो.

बिग बास्केट
इमेज कैप्शन, जानी मानी कंपनी बिग बास्केट ने 24 मार्च को कहा कि कंपनी को इतनी बड़ी संख्या में ऑनलाइन ऑर्डर मिल रहे हैं जिन्हें वो पूरी नहीं कर पा रही है. ऐसे में कंपनी अपने मौजूदा ग्राहकों के ऑर्डर पहले पूरा करने की कोशिश कर रही है.
ग्रोफर्स
इमेज कैप्शन, 24 मार्च को जानी मानी कंपनी ग्रोफर्स का हाल भी ऐसा बिग बास्केट जैसा देखने को मिला. कंपनी को इतनी बड़ी संख्या में ऑनलाइन ऑर्डर मिले कि अस्थायी तौर पर और ऑर्डर लेने से मना कर दिया.
नेचर्स बास्केट
इमेज कैप्शन, नेचर्स बास्केट ने भी कहा कि उनके पास और डिलीवरी करने के लिए लोगों की कमी है.
अमेज़न
इमेज कैप्शन, अमेज़न ने स्पष्ट किया कि वो उन ग्राहकों की ज़रूरतों को पहले पूरा करेगा जिनकी ज़रूरतों का पूरा होना बेहद ज़रूरी है.

सुषमा रामचंद्रन कहती हैं कि "सरकार सबसे बड़ी मुश्किल अभी है सप्लाई चेन के सभी कड़ियों को ठीक से चलाना है. उत्पादन की जगह से या गोदाम से सामान दुकान तक पहुंचे और इसमें कई रुकावट न हो ये देखना बड़ी चुनौती है."

"इसमें राज्यों की भी ज़िम्मेदारी बनती है क्योंकि ज़रूरी सामान क्या हैं इसका फ़ैसला राज्य करते हैं. ये बंदी बड़े पैमाने पर है और इसलिए सप्लाई चेन को न बरकरार रखा गया तो लोगों में डर फैल सकता है."

'सरकार ग़रीबों पर ध्यान नहीं दे रही'

ज्यां द्रेज़ कहते हैं इस तरह के कदम से उन लोगों को भी ख़ास कर मुश्किल होगी जिनके लिए सरकारी अनाज जीने का सबसे महत्वपूर्ण साधन है.

वो कहते हैं, "इन लोगों को सरकार के जन वितरण प्रणाली से मदद मिलती है लेकिन चूंकि बायोमेट्रिक प्रणाली से वायरस के फैलने का ख़तरा है इस कारण फिलहाल इसके लिए ओटीपी सिस्टम लागू कर दिया है. लेकिन अंदरूनी इलाकों में जहां नेटवर्क की दिक्कत है वहां लोग इसका लाभ नहीं ले पाएंगे. सरकार को दूसरे तरीकों के बारे में सोचने की ज़रूरत है."

ज्यां द्रेज़ कहते हैं कि सरकार के पास करीब 20 साल तक काम चलाए रखने के लिए सरप्लस अनाज के भंडार हैं, लोगों को दो तीन महीने के राशन बांटने का काम सरकार कर सकती है ताकि परिवारों को चिंता न हो.

वायरस से अधिक ख़तरा बुज़ुर्गों को है. उनके पेन्शन को भी कुछ महीने के लिए बढ़ाना चाहिए ताकि वो अपने लिए सुविधा कर सकें.

सुषमा रामचंद्रन कहती हैं कि "आज से पहले ऐसा कभी हुआ ही नहीं है इस कारण इसके असर का आकलन अभी से लगाना सही नहीं होगा. लेकिन हमारे देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी है असंगठित क्षेत्र. अगर वो अचानक से काम करना बंद कर दे तो अर्थव्यवस्थआ लड़खड़ा जाएगी."

"मुझे लगता है कि मौजूदा हालातों में सरकार के शायद अधिक विकल्प नहीं थे. लेकिन पूरा दारोमदार इसको लागू करने पर है. सरकार को मज़दूरों की समस्या को भी ध्यान में रखना होगा और उनके लिए कुछ खास सहूलियत देने की ज़रूरत है.

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सुषमा रामचंद्रन कहती हैं कि "उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने कुछ दिनों पहले ही एलान किया है कि मज़दूरी कर गुज़ारा करने वालों वो महीने में एक हज़ार रुपये तक की मदद देंगे. कुछ ऐसा केंद्र सरकार या दूसरी राज्य सरकारें कर सकती हैं क्योंकि इन लोगों की आर्थिक स्थिति अचानक ही बिगड़ जाएगी."

ज्यां द्रेज़ कहते हैं, "मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि अगर रोज़गार न रहा और सरकारी राशन भी न मिला तो लोग कैसे ये मुश्किल वक्त गुज़ारेंगे?"

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