एवरेस्ट फ़तह से पहले टीम से बाहर क्यों होने वाली थी बछेंद्री?

बछेंद्री पाल
इमेज कैप्शन, बछेंद्री पाल
    • Author, हरप्रीत कौर लांबा
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
  • प्रकाशित

अगर किसी स्पोर्ट्स पर्सन के जीवन को सीख देने वाला माना जाए तो लीजेंडरी पर्वतारोही बछेंद्री पाल अपने आप में ऐसी सीख देने वाली संस्थान की तरह हैं.

बचपन से बहादुरी की मिसाल रहीं बछेंद्री पाल ने कई मुकाम बनाए हैं. उन्होंने वैसे समाज में अपनी पहचान बनाई है जहां महिलाओं को कमतर समझा जाता रहा है, उनके पढ़ने लिखने की चाहत का भी मजाक उड़ाया जाता है.

बछेंद्री पाल को कोई आयरन लेडी कहता है तो कोई प्रेरणास्रोत बताता है. तो कोई जीवन में सबकुछ हासिल करने का दमखम रखने वाली शख़्सियत. उन्हें पद्म भूषण, पद्म श्री और अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है.

बछेंद्री का जीवन असधारण उपलब्धियों से भरा रहा है. उनका जीवन प्रतिबद्धता, पैशन और कठोर अनुशासन की मिसाल रहा है.

23 मई, 1984 को वह एवरेस्ट फतह करने वाली पहली भारतीय महिला बनी थीं. 35 साल बाद जब वह पीछे मुड़कर देखती हैं तो उन्हें वे दिन याद आते हैं जिसने उनके पूरे जीवन को बदलकर रख दिया.

एवरेस्ट फतह से पहले टीम से पहले

बीते 35 सालों में टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन, जमशेदपुर की संस्थापक निदेशक के तौर पर बछेंद्री पाल ने अब तक 4500 से ज्यादा पर्वतारोहियों को माउंट एवरेस्ट फतह करने के लिए तैयार किया है.

इसके अलावा वह महिला सशक्तिकरण और गंगा बचाओ जैसे सामाजिक अभियानों से भी जुड़ी रही हैं. लेकिन उनकी पहचान भारत में पर्वतारोहण के पर्याय के रूप में बन चुकी है.

पिछले महीने उन्होंने अपनी बेमिसाल उपलब्धि की 35वीं वर्षगांठ मनाई और अब अपना पेशेवर जीवन पूरा करने के बाद आराम करने की तैयारी कर रही हैं, लेकिन उनका कहना है, ''पर्वतों को मुझसे कभी अलग नहीं किया जा सकता.''

वह कहती हैं, "पर्वत मेरी ज़िंदगी, मेरी आत्मा है. मैं पर्वतों की महिला हूं और हमेशा वैसी ही रहना चाहती हूं. मेरी एमए और बीएड की डिग्रियों का मजाक उड़ाया गया था. लोगों को विश्वास नहीं था कि लड़की ऐसा कर पाएगी. लेकिन पीछे मुड़कर देखती हूं तो संतोष होता है."

हालांकि यह सब इतना आसान भी नहीं था, एक समय ऐसा भी आया था जब उन्हें एवरेस्ट फतह करने वाली टीम से बाहर करने की नौबत आ गई थी.

इस बारे में बछेंद्री पाल बताती हैं, "बहुत लोगों को मालूम नहीं है, लेकिन 23 मई, 1984 को एवरेस्ट फतह करने से एक रात पहले मुझे टीम से बाहर करने की स्थिति आ गई थी."

"हमलोग साउथ कोल पहुंच गए थे. हम चढ़ाई करने का इंतज़ार कर रहे थे. तभी 20 सदस्यीय टीम में एक साथी को मदद की ज़रूरत थी. मैं उसकी मदद के लिए थोड़ा नीचे चली गई. उसे पानी दिया और कुछ और सामान भी. इससे हमारे कुछ साथी नाराज़ हो गए थे. उनका मानना था कि मैंने जोख़िम लेकर अपने जीवन को ख़तरे में डाला है. लेकिन टीम के साथी की मदद करके मैंने ठीक ही किया था."

"मेरे साथियों ने मुझे टीम से बाहर करने की मांग कर दी, मेरे बारे में कहा गया कि ये ओवरकॉन्फिडेंट लड़की है और बहुत कुछ हासिल नहीं कर सकती. लेकिन थैंक गॉड कि टीम लीडर ने उनकी बात नहीं सुनी. नहीं तो मैं तो एवरेस्ट फतह नहीं कर पाती."

बछेंद्री पाल

जिस गांव ने मज़ाक बनाया उनकी हीरो बनी

उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र के छोटे से गांव नौकुरी में जन्मी बछेंद्री के गांव में लड़कियों के पढ़ने लिखने और पर्वतारोहण जैसे कठिन काम करने को अच्छी नज़रों से नहीं देखा जाता था, लेकिन आज अपनी उपलब्धियों की बदौलत बछेंद्री गांव ही नहीं बल्कि आसपास के इलाके तक की दुलारी बेटी बनी हुई हैं.

जब उनकी उपलब्धियां बढ़ती गईं तो उनकी एमए और बीएड डिग्री का मज़ाक उड़ाने वाले गांव वाले उन्हें असली हीरो मानने लगे.

एवरेस्ट फतह के 35 साल पूरे होने के मौके को सेलिब्रेट करते हुए बछेंद्री बताती हैं, "उनकी आंखों में मेरे प्रति सम्मान है. ज़िंदगी मुश्किल में बिताई, बचपन में घास काटी, लकड़ी काटी, जंगल गई. इसलिए मजबूत थी. पर्वतारोहण में अपने आप दिलचस्पी हो गई थी. मजबूत इच्छाशक्ति वाली महिला थी मैं."

"महिलाओं की शिक्षा की चिंता किसी को नहीं है. मेरे माता-पिता भी मेरे पढ़ने की चाहत से खुश नहीं थे. मुझे काफी संघर्ष करना पड़ा लेकिन मैं कामयाब होने के लिए प्रतिबद्ध बनी रही."

बछेंद्री पाल

टाटा की मदद

1984 में एवरेस्ट फतह करने के बाद बछेंद्री को काफी प्रशंसा मिली लेकिन वह इस क्षेत्र में अपना करियर नहीं बना पा रही थीं. तब टाटा समूह के जेआरडी टाटा ने बछेंद्री को जमशेदपुर बुलाया और अकादमी बना कर युवाओं को प्रशिक्षण देने को कहा. इसके बाद बछेंद्री की ज़िंदगी बदल गई.

बछेंद्री बताती हैं, "मुझे अच्छी सैलरी मिल रही थी. फैसले लेने की इजाजत़ थी. चीजों को अपने हिसाब से करने की छूट थी. मेरे सामने अपना भविष्य बनाने का मौका भी था. इससे पहले किसी ने मुझ पर इतना भरोसा नहीं किया था."

"टाटा स्टील ने मुझे वित्तीय तौर पर सुरक्षित कर दिया. पर्वतारोहण को अगर छोड़ भी दें तो भी उस दौर में लोगों को नहीं लगता था कि महिलाएं अपने जीवन में अकेले कुछ हासिल कर पाएंगी. लेकिन यहां ऐसा समूह था जो मुझे पर्वतारोहण की पूरी अकादमी बनाने को कह रहा था."

गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज करा चुकी बछेंद्री पाल कहती हैं, "जब कोई मुझ पर भरोसा नहीं कर रहा था तब टाटा स्टील ने मुझपर भरोसा किया. मेरे भाईयों की पढ़ाई भी हो रही थी, टाटा ने मेरी काफी आर्थिक मदद दी."

बछेंद्री पाल

मुश्किलों का हल

यह सब इतना आसान नहीं था. बछेंद्री बताती हैं, "झारखंड में मैं उन लोगों से मिली जो भूत-प्रेत पर विश्वास कर रहे थे. मुझे उनकी मानसिकता बदलनी थी और यकीन मानिए यह केवल शिक्षा से संभव नहीं है."

"मैं उन लोगों को विभिन्न पर्वतारोहण अभियान में ले गई. मैंने उन्हें मुश्किल चुनौतियों में डाला. प्रकृति भी आपको सिखाती है. यह आपको सोचना समझना सिखाती है. जब आप आतंरिक प्रेतों को जीत लेते हैं तो बाहर का डर अपने आप खत्म हो जाता है."

एकाकी जीवन बिताने वाली बछेंद्री पाल ने पांच बच्चों को गोद लिया हुआ है. बछेंद्री एमबीए और आईआईटी से निकले उन युवाओं के साथ थीं जिन्होंने प्रोजेक्ट गंगा पर काम करना शुरू किया. इन लोगों ने एकसाथ होकर गंगा से कम से कम 55 हज़ार टन कचरे को बाहर निकाला.

वह बताती हैं, "पर्वतारोहण जीवन की खोज जैसा काम है. यह सपने और छिपी हुई प्रतिभा की खोज का काम भी है. यह केवल पर्वतों के शिखर पर झंडा फहराने का काम नहीं है. इसका अनुभव कई चीजों में मदद करता है."

बछेंद्री पाल

बछेंद्री पिछले महीने 65 साल की हो चुकी हैं. टाटा समूह ने उन्हें भावुक विदाई भी दी है. जमशेदपुर में उन्होंने अपने जीवन का काफी हिस्सा युवा प्रतिभाओं को ट्रेनिंग देते हुए बिताया है. उन्होंने कई पर्वतारोही अभियानों का नेतृत्व भी किया है. लेकिन अब वे पर्वतारोहण से इतर जीवन को देख रही हैं.

बछेंद्री पाल बताती हैं, "मैं रुकना नहीं जानती. पर्वतों ने रास्ता दिखाया था और अब फिर रास्ता दिखाएंगे. मैं देहरादून में बेस स्थापित करूंगी और दूसरी चीजों पर भी काम करूंगी. मैं ना रिटायर हो रही हूं और ना ही रुक रही हूं. बछेंद्री चलती रहेगी."

ये भी पढ़ेंः

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)