‘बँटवारे को भूलना मुश्किल और याद रखना ख़तरनाक’

बंटवारे की तस्वीर
    • Author, उर्वशी बुटालिया
    • पदनाम, लेखिका
  • प्रकाशित

मशहूर लेखिका कृष्णा सोबती ने कहा था कि 'भारत-पाकिस्तान के बंटवारे को भूलना मुश्किल है और याद रखना ख़तरनाक.'

उन्हीं के दौर की लेखिका अमृता प्रीतम ने बँटवारे को लेकर अपना दर्द एक नज़्म के ज़रिए बयां किया था.

इस नज़्म में उन्होंने पंजाब के महान कवि वारिस शाह को आवाज़ देकर अपनी तकलीफ़ बयां की थी. वारिस शाह ने ही हीर-रांझा की प्रेम कहानी लिखी थी.

अमृता प्रीतम ने पंजाबी में जो नज़्म लिखी थी, उसका तर्जुमा कुछ इस तरह है-

"आज पूछती हूं तुझसे ऐ वारिस शाह!

अपनी क़ब्र से जवाब दे - इश्क़ की किताब का कोई सफ़ा पलट.

जब रोई थी एक बेटी पंजाब की, तूने लिख डाला महाकाव्य .

आज लाखों बेटियां रोती हैं पंजाब की और कहती हैं तुझसे,

उठ ऐ दर्दमंद और नज़र डाल अपने पंजाब पर.

आज चारों ओर लाशें बिछी हैं और लहू से भरी है चिनाब."

बंटवारे के समय का दृश्य
इमेज कैप्शन, भारत-पाक बँटवारे को 70 साल बीत चुके

इंसानियत को मिले ज़ख़्म अब तक नहीं भरे

दोनों ही लेखिकाओं ने अपने-अपने तरीक़े से बँटवारे के पेचीदा मसलों पर अपनी राय बयां की थी. उस दौर की बेहद तकलीफ़देह घटनाओं को याद करने की मुश्किल और उनके बारे में बात करने की चुनौती को सोबती और प्रीतम ने बख़ूबी बताया था.

भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के 70 साल से ज़्यादा समय बीत चुके हैं. लेकिन दोनों देश आज तक उस तकलीफ़ से उबर नहीं सके हैं. उस दौरान इंसानियत को जो ज़ख़्म मिले, वो अब तक पूरी तरह नहीं भरे हैं.

बरसों से तारीख़ का ये पन्ना हज़ारों-लाखों घरों में ज़िंदा रहा है. तकलीफ़ का वो दौर तमाम इंसानों के दिल में ठिकाना बनाए बैठा हुआ है. बंटवारे का दर्द झेलने वालों ने हज़ार बार ये क़िस्से और आपबीती अपने घरवालों, रिश्तेदारों, दोस्तों, जानने वालों को सुनाया होगा.

उस दर्द को बार-बार बताकर बँटवारे के शिकार लोगों ने अपना दर्द कम करने की कोशिश की. उन्होंने अपने तज़ुर्बे बांटकर बताया कि उस वक़्त कैसे उन्हें अपना वतन और अपना घर-बार बँटवारे की वजह से गंवाना पड़ा था.

पानी भरते लोग

शरणार्थियों के परिवार से मेरा ताल्लुक़

मगर घरों की चारदीवारी के बाहर इन दर्द भरे क़िस्सों का कोई पुरसां हाल नहीं था. ज़्यादातर लोग तो उन बातों को सुनना भी नहीं चाहते थे. जिन लोगों ने ये क़िस्से सुने भी, उन्हें भी ये इतने अहम नहीं लगे कि इन्हें बंटवारे के इतिहास में शामिल करते.

फिर भी, भारत और पाकिस्तान का बँटवारा इतना हिंसक था, इसमें इतना ख़ून बहा था कि आज ये ज़रूरी है कि हम इसे याद रखें.

मैं कई बार ख़ुद के परिवार के अतीत के बारे में सोचती हूं. मैं शरणार्थियों के परिवार से ताल्लुक़ रखती हूं. मेरे मां-पिता दोनों को ही बँटवारे की वजह से अपना घर-बार, शहर छोड़ना पड़ा था.

हालांकि क़िस्मत अच्छी थी कि दोनों ही हिंसा का शिकार होने से बच गए थे. फिर भी बँटवारे का ज़ख़्म उनके दिलों में बहुत गहरे बैठा था. इसके बहुत से अनछुए पहलू थे, जो हमारी ज़िंदगी पर साए की तरह मंडराते रहे हैं.

शरणार्थी शिविर

मेरे नानी-मामा ने धर्म परिवर्तन कर लिया

मेरी मां के भाई उस वक़्त 20 बरस के थे. उन्होंने पाकिस्तान में ही रहने का फ़ैसला किया था. बाद में उन्होंने इस्लाम क़ुबूल कर लिया. उन्होंने मेरी नानी का भी धर्म परिवर्तन करा दिया था. वो भी मुसलमान हो गई थीं.

मेरी मां और उनके दूसरे भाई-बहन फिर कभी अपनी मां से नहीं मिले. मैं अपनी पूरी उम्र अपने मामा और नानी की कहानी सुनती आई हूं.

हालांकि मैंने उन बातों को ये सोचकर ज़्यादा तवज्जो नहीं दी कि ये तो बुज़ुर्गों के क़िस्से हैं. लेकिन, 1984 में जब दिल्ली में मैंने सिखों के ख़िलाफ़ भयंकर हिंसा देखी, तब जाकर मुझे बँटवारे के क़िस्सों की अहमियत का एहसास हुआ. तब मैंने वो क़िस्से गंभीरता से सुनने शुरू किए.

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दिल्ली में जामा मस्जिद और बस

स्वतंत्र भारत के इतिहास का काला पन्ना

आख़िर इन कहानियों को अब तक तवज्जो क्यों नहीं दी गई? क्या वो बंटवारे, आज़ादी की तारीख़ का हिस्सा नहीं हैं? क्या हम उनकी इसलिए अनदेखी करते हैं कि उस इतिहास के तमाम क़िरदार आज भी ज़िंदा हैं?

इन सवालों के जवाब तलाशना इतना आसान नहीं, मगर इतना मुश्किल भी नहीं. भारत के लिए बँटवारा आज़ादी की क़ीमत था.

जब भी हम आज़ादी का जश्न मनाने बैठते हैं, बँटवारे का दर्द उभर आता है. स्वतंत्र भारत के इतिहास का काला पन्ना है बँटवारा.

इसकी वजह से भारत के टुकड़े हो गए. हिंदुस्तान ने अपना एक हिस्सा गंवा दिया. इसीलिए इस घटना का राजनैतिक इतिहास तो याद रखा जाता है, मगर बँटवारे के मानवीय तज़ुर्बे, इंसानी तकलीफ़ के वो क़िस्से हमेशा ही दफ़्न करने की कोशिश होती रही है.

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बंटवारा

नई पीढ़ी ने नहीं ली दिलचस्पी

पाकिस्तान के लिए बँटवारे से ज़्यादा अहमियत एक नए मुल्क का बनना था. मुसलमानों का अपना वतन. इसीलिए उस दौर के ख़ून-ख़राबे को याद रखने की ज़रूरत पाकिस्तान के लोगों को महसूस नहीं होती.

उस दौर के लोगों के लिए और भी चुनौतियां थीं. बँटवारे के दौरान भड़की हिंसा की यादें भले ही ज़हन से नहीं गईं. लेकिन उस दौरान पहली चुनौती ज़िंदगी को दोबारा पटरी पर लाने की थी. अपना घर-बार लुटाकर आए लोगों के लिए उस तकलीफ़ को याद करने से ज़्यादा अहम आगे की ज़िंदगी की फ़िक्र करना था. उनके पास तकलीफ़ों को याद करने के लिए वक़्त ही नहीं था.

लोगों को कुछ बातें और घटनाएं याद रखने के लिए कुछ ऐसे लोगों की ज़रूरत होती है, जिनसे वो दर्द या ख़ुशी बांट सकें. वो क़िस्से साझा कर सकें. लेकिन बरसों से हम जैसे लोग-जिन्होंने बँटवारे का दर्द नहीं झेला था-वो ये क़िस्से सुनने को राज़ी नहीं थे. हम अपने मां-बाप या दादी-दादा से वो क़िस्से सुनने में दिलचस्पी ही नहीं लेते थे.

हिंसक घटना

अपनी महिलाओं और बच्चों को ख़ुद मारा

वैसे भी कुछ बुरी यादों को ज़हन से मिटा देना ही राहत देता है. अब बँटवारे के दौरान जो महिलाएं यौन हिंसा की शिकार हुईं, उनके लिए वो बुरा वक़्त याद करना और तकलीफ़देह होता है. ऐसे में उसे याद करने का क्या फ़ायदा? उसमें ऐसा क्या था जिसे वो याद करतीं?

वैसे ही यौन हिंसा की शिकार महिलाएं शर्मिंदगी का बोझ अपने दिल-दिमाग़ पर उठाए फिरती हैं. ऐसी तारीख़ को याद कैसे रखा जाए?

बहुत से ऐसे लोग थे जिन्होंने अपने परिवार की महिलाओं और बच्चों को अपने हाथों से मार डाला था, ताकि वो पागलपन का शिकार न हों.

ऐसे लोगों को इस बात का डर था कि उनके परिवार की महिलाओं और बच्चों को अगवा करके उनका धर्म परिवर्तन करा दिया जाएगा. आख़िर हम ऐसी हिंसक बातों को कैसे याद रखें? कौन इस बारे में बात करना चाहेगा?

अमृतसर में स्वर्ण मंदिर
इमेज कैप्शन, इतिहास के ये पन्ने बेहद अहम

क़िस्सों को याद रखना ज़रूरी

इसके बावजूद, बँटवारे का इतिहास, सिर्फ़ हिंसक वारदातों की तारीख़ नहीं है. इसमें हमदर्दी है, उम्मीद है, अल्पसंख्यकों के तमाम क़िरदारों के क़िस्से हैं.

बहुत से लोगों ने पागलपन के उस दौर में भी इंसानियत और दोस्ती को ज़िंदा बचाए रखा था.

सत्तर साल बाद भी हम बमुश्किल ही इन मानवीय पहलुओं पर ग़ौर फ़रमाते हैं.

मगर हमारे इतिहास के ये वो पन्ने हैं जो बेहद अहम हैं. इनके ज़रिए ही हम बँटवारे के असर का सही-सही आकलन कर सकेंगे. इसलिए इन क़िस्सों को याद रखना ज़रूरी है.

आज ये बहुत ज़रूरी है कि हम बँटवारे के उस दर्द को याद रखें. क्योंकि हम उसे याद रखेंगे तभी वो हमारी ज़िंदगी का अहम हिस्सा बनेंगे.

इसी तरह से हम अपने काले अतीत को समझ सकेंगे. आगे के लिए सबक़ ले सकेंगे.

(लेखिका उर्वशी बुटालिया ने बीबीसी के लिए ये लेख एक साल पहले लिखा था.)

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