..जब 'नकली भगत सिंह' ना बन पाए मनोज कुमार

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ मनोज कुमार.
इमेज कैप्शन, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ मनोज कुमार.
    • Author, श्वेता सिंह
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
  • प्रकाशित

हर साल स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर देशभक्ति गीत हर गली नुक्कड़, स्कूल या सरकारी कार्यक्रमों से सुने जा सकते हैं.

फ़िल्म 'उपकार' (1967) का गाना 'मेरे देश की धरती सोना उगले', फ़िल्म 'पूरब और पश्चिम' का गाना 'भारत का रहने वाला हूँ भारत की बात सुनाता हूँ' और फ़िल्म शहीद का गाना 'ऐ वतन ऐ वतन' उन गानों की फेहरिश्त में शामिल हैं, जिन्हें हर राष्ट्रीय पर्व पर सुना जा सकता है.

लेकिन राष्ट्र प्रेम वाली इन फ़िल्मों से एक नाम जुड़ा हुआ है, वो है मनोज कुमार का.

मनोज कुमार ने देशभक्ति वाली इतनी फ़िल्में कीं और वो इतनी हिट रहीं कि उनका नाम ही 'भारत कुमार' पड़ गया.

वैसे उनका नाम था हरिकृष्ण गोस्वामी और उनका जन्म 1937 में ऐबटाबाद हुआ जो अब पाकिस्तान में है.

बीबीसी से ख़ास बातचीत में मनोज कुमार ने अपनी पुरानी यादें साझा की.

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मनोज कुमार दिलीप कुमार के साथ.
इमेज कैप्शन, दिलीप कुमार के साथ मनोज कुमार.

बचपन में परियों की कहानी की ही तरह हमारे लिए फ़िल्में भी थीं. मेरे मामू ने एक फ़िल्म दिखाई. उस फ़िल्म में दिलीप कुमार की मौत हो जाती है और फिर 20 या 25 दिन बाद हमने फिर से एक फ़िल्म देखी 'शहीद' उसमें भी वो थे.

इस फ़िल्म में भी उनकी मौत दिखाई जाती है, ये सब देख कर मैं परेशान हो गया. माँ ने पूछा तो मैंने उनसे कहा कि माँ, एक इंसान कितनी बार मरता है. माँ ने जवाब दिया एक बार. फिर मैंने पूछा और जो दो तीन बार मरे वो तो माँ ने कहा कि वो फ़रिश्ता हुआ.

अमिताभ बच्चन के साथ मनोज कुमार.
इमेज कैप्शन, अमिताभ बच्चन के साथ मनोज कुमार.

मैंने मन में सोचा कि मैं भी फ़रिश्ता बनूँगा. मेरे अंदर फ़िल्में देखने का शौक़ पैदा हो गया था और उसी दौरान मैंने फ़िल्म देखी 'शबनम' उसमें भी दिलीप कुमार साहब थे.

उस फ़िल्म में उनका नाम मनोज था मुझे ये नाम अच्छा लगा. उस दौरान हम रिफ़्यूजी कैंप में रह रहे थे और वहां अलग-अलग ज़बान बोलने वाले लोग रहते थे. वहां मनोज किसी का नाम नही था, मैंने तय किया कि जब मैं एक्टर बनूँगा तब अपना नाम मनोज रखूँगा.

भगत सिंह से लगाव

विभाजन के बाद मैं दिल्ली आ गया और फिर मुंबई. दिल्ली को मैं याद नहीं करता क्योंकि दिल्ली मैं जा सकता हूँ, लेकिन एबटाबाद और लाहौर को याद करता हूं क्योंकि मैं वहां नहीं जा सकता.

बचपन में मन एक कोरे कागज़ की तरह होता है जिस पर लिखा हुआ, कभी नहीं मिटता तो वहाँ की यादें आज भी ज़ेहन में क़ायम हैं. वहाँ का हिल स्टेशन, आर्मी हेडक्वॉर्टर, अखरोट के पेड़ मुझे बहुत याद आते हैं.

मनोज कुमार

बचपन में हमें एक नाटक करना था. गली मोहल्ले में ही शहीद भगत सिंह पर, और मेरी कद काठी ठीक थी. तो मुझे भगत सिंह का रोल दे दिया गया और जब ये नाटक हुआ तो मोहल्ले के सभी लोगों के बीच मैं स्टेज पर जाने से हिचकने लगा और मेरे मन में ख़लिश रह गई कि मैं ये न कर सका.

मेरे पिताजी ने भी कहा कि छोड़ यार तू नकली भगत सिंह भी न बन सका. उसके बाद ये भगत सिंह मेरे अंदर पनपने लगा मैं कभी पेंसिल से अपनी मूंछे बनाता, कभी पिताजी को परेशान करता.

कैसे बनी शहीद

बड़े होने के बाद मैंने भगत सिंह के बारे में पढ़ना शुरू किया जहां से मुझे कोई मैगज़ीन या कुछ भी मिलता मैं पढ़ लेता. तीन चार साल मुझे खोज में लगे. उस समय भगत सिंह पर कोई किताब नहीं छपी थी इसलिए इतना वक़्त लगा.

मैंने एक स्क्रिप्ट तैयार की और अपने दोस्त कश्यप को दिखाई और उसने ज़िद की कि मुझे इसी पर एक फ़िल्म बनानी है.

इसका क्रेडिट मैं कश्यप को ही देता हूँ. ये शहीद फ़िल्म बनी और मेरी मेहनत रंग लाई. इस फ़िल्म को नेशनल अवार्ड मिला.

दिलीप साहब की फ़िल्म शहीद क्रांतिकारियों पर होने के साथ-साथ इसमें एक लव स्टोरी भी थी. मेरी फ़िल्म शहीद दिलीप साहब की शहीद से बिलकुल अलग है.

मनोज कुमार
इमेज कैप्शन, मनोज कुमार

मैंने तो हरिकृष्ण को मनोज कुमार बनाया था. मनोज कुमार को भारत कुमार बनाया हमारी जनता ने.

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