तीन हज़ार रुपये के लिए नंगे पांव 'अमृत दौड़ मैराथन' जीतने वाली एक मां की कहानी

रमाबाई रणवीर

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इमेज कैप्शन, बेटी की किताबों के लिए पैसा जुटाने के खातिर प्रतियोगिता में दौड़ने वाली मां रमाबाई रणवीर
    • Author, श्रीकांत बंगाले
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 6 मिनट

"जब तक मेरी सांस चलेगी, मैं बेटियों को पढ़ाऊंगी. सांस रुकने के बाद जो होगा, सो होगा. लेकिन एक मां के रूप में मैं अपना फ़र्ज़ ज़रूर निभाऊंगी."

रमाबाई रणवीर जब यह बात कहती हैं, तो उसमें सिर्फ़ जोश नहीं होता, उसमें पूरी ज़िंदगी के संघर्ष से पैदा हुआ दृढ़ संकल्प दिखाई देता है.

बीड ज़िले के अंबाजोगाई में रहने वाली 47 वर्षीय इस मां को 29 अगस्त 2026 को पूरे महाराष्ट्र ने देखा. क्योंकि उन्होंने तीन किलोमीटर की दौड़ नंगे पांव जीत ली थी.

लेकिन यह कहानी सिर्फ़ एक दौड़ में मिली जीत की नहीं है. यह एक मां की अपनी बेटियों की शिक्षा के लिए लगाई गई दौड़ की कहानी है.

29 अगस्त को अंबाजोगाई में 'अमृत दौड़ मैराथन' आयोजित की गई थी. रमाबाई ने दौड़ने का कोई अभ्यास नहीं किया था.

उनके पास स्पोर्ट्स शूज़ नहीं थे. ट्रैकसूट भी नहीं था. उनके शरीर पर साड़ी थी और पैरों में साधारण चप्पलें. दौड़ के लिए उनके पास बस यही सामान था.

वह बताती हैं, "मेरी बेटी सुबह मेरे पास आई और बोली- मां, मुझे दौड़ने जाना है."

मैंने पूछा, "कहां?"

वह बोली, "यहीं पास में प्रतियोगिता है. उसमें इनाम मिलेगा. मुझे कॉपी और पेन खरीदने हैं."

उनकी छोटी बेटी की पढ़ाई नांदेड़ में चल रही है. वह पिछले कुछ दिनों से किताबों के लिए पैसे मांग रही थी.

रमाबाई कहती हैं, "आठ दिनों तक उसने मुझसे बात ही नहीं की. क्योंकि मैं उसे पैसे नहीं दे पाई थी. मैंने प्रतियोगिता की बात सुनी तो ठान लिया कि दौड़ मैं लगाऊंगी, मुझे यह दौड़ हर हाल में जीतनी है."

तीन किलोमीटर की दौड़ के दौरान उनकी चप्पलें बार-बार पैरों से निकल रही थीं. आख़िर में उन्होंने चप्पलें हाथ में उठा लीं और नंगे पांव दौड़ती रहीं.

जब दौड़ ख़त्म हुई, तो पहला स्थान उन्हीं का था. इनाम के तौर पर उन्हें तीन हज़ार रुपये मिले.

जब उनसे पूछा गया, "उन पैसों का क्या किया?" तो रमाबाई का जवाब सिर्फ़ एक वाक्य में था.

"तीन हज़ार रुपये बेटी को किताबों के लिए दे दिए."

एक मां की ज़िंदगी की दूसरी दौड़

रमाबाई रणवीर

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इमेज कैप्शन, रमाबाई जिस एकेडमी में विद्यार्थियों के लिए भोजन पकाने का काम करती हैं, वहीं पर उनकी बड़ी बेटी पुलिस भर्ती परीक्षा की तैयारी कर रही है
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लेकिन रमाबाई की ज़िंदगी की असली दौड़ तो बहुत पहले शुरू हो गई थी.

साल 2012 में उनके पति का निधन हो गया था. इसके बाद दो छोटी बेटियों और पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई.

उनकी अपनी पढ़ाई केवल सातवीं कक्षा तक हुई थी. लेकिन बेटियां अपनी पढ़ाई बीच में न छोड़ें, इस बात पर वह हमेशा अडिग रहीं.

उनकी बेटी पूजा रणवीर बताती हैं, "जब पापा का निधन हुआ, तब हम बहुत छोटे थे. मेरी मां चाहती तो दोबारा शादी कर सकती थी लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. उन्होंने हमारे लिए पूरी ज़िंदगी मेहनत करने का फ़ैसला किया."

रमाबाई खुद बताती हैं कि उन्हें जो भी काम मिला, उन्होंने वह किया.

वह कहती हैं, "मैंने लोगों के खेतों में काम किया. सोयाबीन की ठेकेदारी ली. चने की ठेकेदारी ली. खेतों से हल्दी इकट्ठा की, उसे उबाला और बेचा. जो भी काम मिला, वह किया."

आज वह अंबाजोगाई की ज्ञानदीप एकेडमी में खाना बनाने का काम करती हैं. पिछले एक साल से वह छात्रों के लिए भोजन तैयार कर रही हैं.

इसी एकेडमी में उनकी बड़ी बेटी पुलिस भर्ती परीक्षा की तैयारी कर रही है. उनकी छोटी बेटी नांदेड़ में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही है.

ज्ञानदीप एकेडमी के प्रोफ़ेसर दत्ता दराडे कहते हैं, "उन्होंने सिर्फ़ पूरे महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि पूरे देश के सामने एक उदाहरण पेश किया है. उन्होंने दिखाया है कि चाहे कितनी भी मुश्किलें आएं, उनका सामना केवल आत्मविश्वास के बल पर किया जा सकता है."

'मेरी बेटियों को मेरी तरह ज़िंदगी न जीनी पड़े'

रमाबाई रणवीर अपनी बेटी पूजा की पढ़ाई के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहतीं
इमेज कैप्शन, रमाबाई रणवीर अपनी बेटी पूजा की पढ़ाई के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहतीं

रमाबाई के सपने बहुत बड़े नहीं हैं, लेकिन वे पूरी तरह स्पष्ट हैं.

वह कहती हैं, "जैसे डॉ. बाबासाहेब ने दुनिया को ठंडी छांव दी, वैसे ही मैं अपनी दोनों बेटियों को देना चाहती हूं."

उनके लिए 'ठंडी छांव' का मतलब सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन है.

वह आगे कहती हैं, "वे एक छत के नीचे सुख से रहें. उन्हें कीचड़ में न जाना पड़े और न ही धूप-बारिश में काम करना पड़े. जैसे मैं काम करती हूं, वैसा मेरी बेटियों को न करना पड़े."

उनकी ये बातें उनके पूरे संघर्ष का सार बयां करती हैं.

उनकी बस इतनी इच्छा है कि उनकी बेटियां अधिकारी बनें, अपने पैरों पर खड़ी हों और मज़दूरी वाली ज़िंदगी न जीनी पड़े.

रमाबाई का नंगे पांव दौड़ने वाला वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया. पूरे महाराष्ट्र में उनकी सराहना हुई.

इसके बाद उनके संघर्ष की कहानी पर राष्ट्रीय मीडिया ने भी ध्यान दिया. द हिंदू, टाइम्स ऑफ़ इंडिया और इकॉनॉमिक टाइम्स जैसे अख़बारों ने भी उनके बारे में ख़बरें प्रकाशित कीं.

ख़ास बात यह है कि शायद रमाबाई को इस बात का अंदाज़ा भी नहीं है कि उनके संघर्ष की चर्चा पूरे देश में हुई है.

उनके लिए सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण क्या है?

बेटियों की फ़ीस, किताबें और उनकी आगे की पढ़ाई.

व्यवस्था पर सवाल

सोमनाथ घोवले

रमाबाई की कहानी सामने आने के बाद कई लोगों ने इसे "संघर्ष और जज़्बे की प्रेरणादायक कहानी" कहा.

लेकिन लेखक और शोधकर्ता सोमनाथ घोलवे इस कहानी को एक अलग नज़रिए से देखते हैं.

वह लिखते हैं, "भारत के मध्यम वर्ग को यह जज़्बे और संघर्ष की कहानी लग सकती है. बहुत से लोग मां की मेहनत और त्याग की सराहना करेंगे. लेकिन कितने लोग यह सोचेंगे कि ऐसी परिस्थिति उस पर आई ही क्यों?"

घोलवे के मुताबिक़, रमाबाई सिर्फ़ एक प्रतियोगिता में नहीं दौड़ीं. वह अपनी बेटियों की शिक्षा के लिए समाज, अर्थव्यवस्था और राजनीतिक व्यवस्था से भी लड़ रही हैं.

वह कहते हैं, "हम मां का संघर्ष देखते हैं, लेकिन दूसरी तरफ़ नहीं देखते. यह घटना सरकार, सामाजिक व्यवस्था और अर्थव्यवस्था की कमियों को भी उजागर करती है."

उन्होंने अपनी पोस्ट में एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया है. रमाबाई चर्चा में इसलिए आईं क्योंकि उन्होंने दौड़ जीत ली.

लेकिन ऐसी न जाने कितनी मांएं हैं, जो हर दिन खेती, मज़दूरी और असंगठित क्षेत्र में काम करके अपने बच्चों को पढ़ा रही हैं. क्या समाज का ध्यान उनके संघर्ष पर जाता है?

मैराथन में दौड़ी महिला की बेटी पूजा रणवीर

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इमेज कैप्शन, पूजा रणवीर ने कहा कि उनकी मां ने पूरी ज़िंदगी मेहनत करने का फ़ैसला लिया

घोलवे आगे लिखते हैं, "इस मां के बारे में सबको इसलिए पता चला क्योंकि वह बेटियों की पढ़ाई के लिए दौड़ी थी. लेकिन ऐसी न जाने कितनी मांएं हैं, जो हर दिन इसी तरह दौड़ रही हैं."

रमाबाई की इस कहानी में एक बेचैन कर देने वाला सवाल भी छिपा है.

क्या बेटियों की किताबों के लिए एक मां को तीन हज़ार रुपये का इनाम जीतने के लिए दौड़ लगानी पड़े, यह सिर्फ़ व्यक्तिगत ग़रीबी की कहानी है?

घोलवे का कहना, "केवल सरकारी योजनाओं की घोषणा करना काफ़ी नहीं होता. ज़रूरी यह है कि उनका लाभ प्रभावी ढंग से ज़रूरतमंद लोगों तक पहुंचे."

वह कहते हैं, "सिर्फ़ योजनाएं घोषित कर देने से यह नहीं माना जा सकता कि लोगों को उनका लाभ मिल गया. उनका प्रभावी क्रियान्वयन होना चाहिए."

हालांकि, इस विचार को एक सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण के रूप में देखना ज़रूरी है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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