ईयू ने एफटीए फाइनल होने से पहले भारत को मिला जीएसपी किया निलंबित

भारत-ईयू
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अमेरिकी टैरिफ़ से पहले ही जूझ रहे भारतीय निर्यातकों को यूरोपियन यूनियन (ईयू) से भी निराशा हाथ लगी है.

ईयू ने 'जनरलाइज़्ड सिस्टम ऑफ़ प्रिफ़रेंसेज़' यानी जीएसपी के तहत कुछ वस्तुओं पर भारत को मिलने वाली आयात शुल्क छूट को एक जनवरी 2026 से निलंबित कर दिया है.

इस फ़ैसले से जिन उत्पादों पर असर होगा, उनमें खनिज, रसायन, प्लास्टिक, लोहा, स्टील, रबर, टेक्सटाइल्स, मोती और क़ीमती धातु, मोटर वाहन, मशीनरी और इलेक्ट्रिकल उपकरण शामिल हैं.

कई विशेषज्ञों ने कहा है कि ट्रंप के टैरिफ़ और ईरान पर प्रतिबंधों की नई घोषणा के बाद भारत के लिए यह नया झटका है.

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ईयू को होने वाला लगभग 87 प्रतिशत भारतीय निर्यात जीएसपी से बाहर हो जाएगा और उस पर मोस्ट फ़ेवर्ड नेशन (एमएफ़एन) का पूरा शुल्क लगेगा. रॉयटर्स के अनुसार, 1.95 अरब डॉलर के भारतीय निर्यात इससे प्रभावित होंगे.

यह फैसला यूरोपीय संघ के आधिकारिक जर्नल में अधिसूचित किया गया है. यह यूरोपीय आयोग के उस रेगुलेशन के बाद आया है, जिसे 25 सितंबर 2025 को अपनाया गया था.

जीएसपी का यह निलंबन एक जनवरी 2026 से 31 दिसंबर 2028 तक तीन साल की अवधि के लिए लागू रहेगा. इसी तरह के क़दम इंडोनेशिया और कीनिया पर भी लागू किए गए हैं.

भारत के लिए यह इसलिए भी झटका माना जा रहा है क्योंकि आगामी 27 जनवरी को भारत-यूरोपीय संघ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफ़टीए) की घोषणा हो सकती है.

भारत ने अपने 77वें गणतंत्र दिवस के मौक़े पर 26 जनवरी के दौरान ईयू के प्रतिनिधियों को ही मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया है. रॉयटर्स ने सरकारी सूत्रों के हवाले से कहा है कि यह प्रतिनिधिमंडल 25-28 के बीच भारत में रहेगा.

20 जनवरी को ही यूरोपीय कमिशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने दावोस में कहा था, "हम एक ऐतिहासिक व्यापार समझौते के बिल्कुल क़रीब हैं. वास्तव में कुछ लोग इसे 'मदर ऑफ़ ऑल डील्स' (असाधारण समझौता) कह रहे हैं."

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इमेज कैप्शन, भारत को अभी तक जीएसपी के तहत एक्सपोर्ट में विशेष रियायतें हासिल थीं

जीएसपी और एमएफ़एन शुल्क में क्या है अंतर

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जीएसपी के तहत भारतीय निर्यातक ईयू में सामान एमएफ़एन दरों से कम शुल्क पर भेज पा रहे थे.

उदाहरण के लिए, जिस टेक्स्टाइल्स उत्पाद पर एमएफ़एन के तहत 12 प्रतिशत शुल्क लगता था, उस पर जीएसपी के तहत केवल 9.6 प्रतिशत शुल्क देना पड़ता था.

एक जनवरी से निर्यातकों को अब पूरा एमएफ़एन शुल्क देना होगा, जिससे क़ीमतें की कड़ी प्रतिस्पर्द्धा में भारतीय निर्यातकों को नुकसान उठाना पड़ सकता है.

आर्थिक मामलों के जानकार अंशुमान तिवारी ने एक्स पर इसे समझाया है.

उनके अनुसार, "जीएसपी एकतरफ़ा वरीयता व्यवस्था है जबकि एफ़टीए आपसी समझौता होता है. यह यूरोपीय संघ की व्यापार नीति में क़ानूनी रूप से अलग स्तर हैं. इसी वजह से भारत के क़रीब 13 प्रतिशत निर्यात पर अब भी जीएसपी का लाभ मिल रहा था."

"इसमें मुख्य रूप से कृषि और खाद्य उत्पाद, चमड़ा, लकड़ी, कागज, फुटवियर, ऑप्टिकल और मेडिकल उपकरण, हस्तशिल्प शामिल हैं जबकि बाकी निर्यात ऊंची एमएफ़एन दरों पर चला गया है."

हालांकि रॉयटर्स के मुताबिक़, भारतीय वाणिज्य मंत्रालय ने कहा है कि यूरोपीय संघ के साथ होने वाले एफ़टीए से जीएसपी निलंबन से होने वाले नुक़सान की भरपाई होगी.

दिल्ली स्थित थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के अजय श्रीवास्तव ने रॉयटर्स को बताया कि टेक्स्टाइल्स और जूलरी एक्सपोर्ट को होने वाले नुक़सान की भरपाई अमेरिकी एक्सपोर्ट्स से होगी.

वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल
इमेज कैप्शन, यूरोपीय संघ भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार ब्लॉक है

भारत और ईयू के बीच ट्रेड

यूरोपीय कमिशन की वेबसाइट के मुताबिक़, यूरोपीय संघ भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार समूह है. साल 2024 में दोनों के बीच वस्तुओं का व्यापार 141.93 अरब डॉलर का रहा, जो भारत के कुल व्यापार का 11.5 प्रतिशत है.

भारत, यूरोपीय संघ का नौवां सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है. साल 2024 में यूरोपीय संघ के कुल वस्तु व्यापार में भारत की हिस्सेदारी 2.4 प्रतिशत रही. यह अमेरिका 17.3 प्रतिशत, चीन 14.6 प्रतिशत और ब्रिटेन 10.1 प्रतिशत से काफ़ी कम है.

पिछले एक दशक में यूरोपीय संघ और भारत के बीच व्यापार में क़रीब 90 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है.

यूरोपीय संघ भारत से जिन वस्तुओं का आयात करता है, उनमें मशीनरी और उपकरण, रसायन, बेस मेटल्स, खनिज उत्पाद और टेक्स्टाइल्स उत्पाद शामिल हैं. वहीं भारत को यूरोपीय संघ के प्रमुख निर्यात में मशीनरी और उपकरण, परिवहन उपकरण और रसायन शामिल हैं.

भारत में यूरोपीय संघ के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफ़डीआई साल 2023 में बढ़कर 165.59 अरब डॉलर पहुंच गया था.

भारत में करीब 6,000 यूरोपीय कंपनियां मौजूद हैं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

टेक्सटाइल्स
इमेज कैप्शन, भारत का टेक्स्टाइल्स सेक्टर पहले ही ट्रंप के टैरिफ़ की मुश्किलों का सामना कर रहा है

रॉयटर्स से फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशन (एफ़आईईओ) के महाप्रबंधक अजय सहाय ने कहा, "यूरोपीय संघ ने भारत के क़रीब 87 प्रतिशत निर्यात पर जीएसपी के तहत मिलने वाली टैरिफ़ छूट वापस ले ली है. इसके चलते अब ज़्यादातर उत्पादों को पूर्ण एमएफ़एन शुल्क दरों पर यूरोपीय संघ में प्रवेश करना होगा."

"इससे भारतीय निर्यातकों को पहले मिलने वाला औसतन क़रीब 20 प्रतिशत का टैरिफ़ लाभ समाप्त हो गया है."

सहाय ने कहा, "इससे बांग्लादेश और वियतनाम जैसे निर्यातकों के मुक़ाबले भारत की क़ीमत प्रतिस्पर्धा काफ़ी कमजोर हो गई है, जिन्हें अब भी जीएसपी छूट का लाभ मिल रहा है."

आर्थिक मामलों के जानकार वरिष्ठ पत्रकार अंशुमान तिवारी ने इसे 'भारत को झटका' बताया है.

उन्होंने एक्स पर लिखा, "ऐसे समय में जब नई दिल्ली "सबसे फ़ायदे वाले" मुक्त व्यापार समझौते पर दांव लगा रही थी, ब्रसल्स ने भारत के अधिकांश निर्यात यानी 87 प्रतिशत पर जीएसपी के तहत मिलने वाली टैरिफ रियायतें निलंबित कर दी हैं. इससे कपड़ा, प्लास्टिक, धातु और इंजीनियरिंग उत्पादों की लागत बढ़ेगी और यूरोपीय संघ के बाज़ार में क़ीमत को लेकर उनकी बढ़त कमज़ोर होगी."

"ऊंचे टैरिफ़ का मतलब मुनाफ़े पर दबाव के अलावा बांग्लादेश और वियतनाम जैसे प्रतिद्वंद्वियों के मुक़ाबले बढ़त का नुक़सान है. यह स्थिति ऐसे समय बन रही है, जब सीबीएएम (कॉर्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मेकैनिज़्म) और जलवायु से जुड़ी नई लागतें भी लागू होने जा रही हैं. कुल मिलाकर, भारत यूरोप में एफ़टीए बातचीत के अगले चरण में अपेक्षाकृत कमज़ोर शुरुआती स्थिति के साथ प्रवेश कर रहा है. यह याद दिलाता है कि व्यापार कूटनीति में ताक़त का संतुलन कितनी तेज़ी से बदल सकता है."

उन्होंने लिखा, "जब तक एफ़टीए लागू नहीं हो जाता और उसके तहत समान या उससे बेहतर टैरिफ़ कटौती नहीं मिलती, तब तक भारत इस सीमित जीएसपी खिड़की का समानांतर उपयोग कर सकता था. भारत के सामने असली चुनौती यह है कि सीबीएएम का निर्णायक चरण भी एक जनवरी 2026 से शुरू हुआ है, जिससे ऊंचे टैरिफ़ के ऊपर कार्बन मूल्य और इसे लागू करने से संबंधित लागत जुड़ जाएगी. व्यापार वार्ताएं जटिल होती हैं और यूरोपीय संघ एक सख़्त सौदेबाज़ माना जाता है."

जीटीआरआई के अजय श्रीवास्तव का भी कहना है, "भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते के निष्कर्ष को लेकर आशावाद ज़रूर हैं, लेकिन हक़ीक़त में भारतीय निर्यातकों को निकट भविष्य में ऊंची व्यापार बाधाओं का सामना करना पड़ेगा क्योंकि जीएसपी रियायतों का ख़त्म होना यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज़्म यानी सीबीएएम के टैक्स चरण की शुरुआत के साथ एक साथ हो रहा है."

उनके अनुसार, "एफ़टीए के लागू होने में कम से कम एक साल या उससे भी अधिक समय लग सकता है. इस दौरान यूरोपीय संघ को भारत का निर्यात ऊंचे टैरिफ़, बढ़ती लागत और कमजोर होती प्रतिस्पर्धा के दौर से गुजरेगा. यह झटका ऐसे समय लगेगा, जब वैश्विक व्यापार स्थितियां पहले से ही नाजुक बनी हुई हैं."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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