बढ़ती गर्मी और इंसान के दिमाग का ये 'कनेक्शन' जानना ज़रूरी है

हीटवेव
इमेज कैप्शन, गर्मी सिर्फ बीमारियों को नहीं बढ़ाती, यह हमें अधिक चिड़चिड़ा, गुस्सैल या अवसादग्रस्त भी बना सकती है.
    • Author, थेरेस लुथी
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

जब जेक सिर्फ़ पांच महीने के थे तो उन्हें पहली बार टोनिक-क्लोनिक का दौरा पड़ा.

पांच महीने के इस शिशु का छोटा शरीर पहले अकड़ गया और वो तेज़ी से झटका खाने लगा.

उनकी मां, स्टेफ़नी स्मिथ कहती हैं, "उस दिन बहुत ज़्यादा गर्मी थी. उसे बेहद गर्मी लग रही थी. हमने जो देखा उससे लगा कि हमने अपनी ज़िंदगी में इससे ज़्यादा भयावह मंज़र और नहीं देखा होगा. लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं था."

गर्म मौसम में जेक को बार-बार इस तरह के दौरे पड़ने लगे. जैसे ही उमस भरे, तपते हुए गर्मी के दिन आते, पूरा परिवार उनके शरीर को ठंडा रखने के इंतज़ाम करने लगता.

जेक जब 18 महीने के हुए, तो उस वक्त कराए गए एक जेनेटिक टेस्ट में पता चला कि उन्हें ड्रेवेट सिंड्रोम नाम की न्यूरोलॉजिकल बीमारी है.

ड्रेवेट सिंड्रोम में एक ऐसी मिर्गी भी शामिल है, जिससे हर 15 हज़ार में से एक बच्चा प्रभावित है.

इसमें मिर्गी के दौरे के साथ-साथ मानसिक विकास में कमी और कई अन्य समस्याएं भी हो सकती हैं, जैसे ऑटिज़्म, एडीएचडी, बोलने, चलने, खाने और नींद से जुड़ी दिक्कतें.

गर्मी या अचानक तापमान में बदलाव से मिर्गी के दौरे शुरू हो सकते हैं.

हीटवेव का न्यूरोलॉजिकल असर

हीटवेव
इमेज कैप्शन, भीषण हीटवेव हमारे मस्तिष्क के काम करने के तरीके को प्रभावित कर सकती है, जिससे व्यवहार और मूड में बदलाव आ सकता है.
छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
दिनभर
Dinbhar: आवाज़ वही, अंदाज़ नया

देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां.

एपिसोड

समाप्त

जेक अब 13 साल के हैं, लेकिन उनकी मां कहती हैं कि मौसम बदलते ही उन्हें दौरे पड़ने लगते हैं.

स्मिथ कहती हैं, "लगातार बढ़ती गर्मियां और हीटवेव पहले से ही गंभीर इस बीमारी को और मुश्किल बना रही है."

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के संजय सिसोदिया जलवायु परिवर्तन और मस्तिष्क पर उसके असर के विशेषज्ञ हैं. वो कहते हैं कि ड्रेवेट सिंड्रोम तो सिर्फ़ एक उदाहरण है. ऐसी कई न्यूरोलॉजिकल बीमारियां हैं जो बढ़ते तापमान से और भी बिगड़ जाती हैं.

मिर्गी के विशेषज्ञ सिसोदिया बताते हैं कि उन्होंने कई बार मरीज़ों के परिवारों से सुना है कि हीटवेव के दौरान उनकी परेशानी बढ़ जाती है.

वो कहते हैं, "इस तरह की बातें सुनने के बाद मैंने सोचा कि जब शरीर को गर्मी से निपटने में दिमाग की इतनी प्रक्रियाएं शामिल होती हैं तो फिर जलवायु परिवर्तन का असर दिमाग पर क्यों नहीं होगा?"

सिसोदिया ने जब इस बारे में रिसर्च पेपर पढ़ना शुरू किया तो पता चला कि मिर्गी, स्ट्रोक, एन्सेफ़लाइटिस, मल्टीपल स्केलेरोसिस, माइग्रेन और कई अन्य न्यूरोलॉजिकल बीमारियां गर्मी और उमस से और ज़्यादा बिगड़ जाती हैं.

उन्होंने पाया कि जलवायु परिवर्तन का असर हमारे मस्तिष्क पर दिखने भी लगा है.

उदाहरण के लिए, 2003 की यूरोपीय हीटवेव के दौरान जितनी अतिरिक्त मौतें हुईं, उनमें लगभग सात फ़ीसदी मौतें सीधे तौर पर न्यूरोलॉजिकल समस्याओं से जुड़ी थीं.

इसी तरह के आंकड़े 2022 की ब्रिटेन की हीटवेव में भी सामने आए.

लेकिन गर्मी सिर्फ बीमारियों को नहीं बढ़ाती. यह हमारे व्यवहार पर भी असर डाल सकती है. जैसे यह हमें अधिक चिड़चिड़ा, गुस्सैल या अवसादग्रस्त बना सकती है.

तो जब दुनिया जलवायु परिवर्तन की वजह से और गर्म होती जा रही है, ऐसे में हमें यह समझने की ज़रूरत है कि इसका असर हमारे दिमाग पर क्या होगा.

मस्तिष्क को ठंडा रखना शरीर के लिए बड़ी चुनौती

हीटवेव
इमेज कैप्शन, कई हिस्सों में जलवायु परिवर्तन की वजह से हीटवेव पहले से कहीं ज़्यादा लंबी और तेज़ होती जा रही है

मानव मस्तिष्क का तापमान औसतन शायद ही कभी हमारे शरीर के मुख्य तापमान से एक डिग्री सेल्सियस से अधिक होता है.

लेकिन हमारा मस्तिष्क शरीर के सबसे ज़्यादा ऊर्जा खपत करने वाले अंगों में से एक है. सोचने, याद रखने और अपने आसपास की दुनिया पर प्रतिक्रिया देने के दौरान मस्तिष्क काफी गर्मी खुद भी पैदा करता है.

इसका मतलब है कि हमारे शरीर को मस्तिष्क को ठंडा रखने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती है.

रक्त संचार, जो नसों के एक जाल के ज़रिए होता है, इस अतिरिक्त गर्मी को हटाने में मदद करता है और मस्तिष्क का तापमान संतुलित बनाए रखता है.

यह ज़रूरी है क्योंकि हमारे मस्तिष्क की कोशिकाएं तापमान के प्रति बहुत अधिक संवेदनशील होती हैं.

इसके अलावा, कुछ मॉलिक्यूल्स जो इन कोशिकाओं के बीच संदेश पहुंचाते हैं वे भी तापमान पर निर्भर माने जाते हैं.

यानी अगर मस्तिष्क बहुत गर्म या बहुत ठंडा हो जाए तो ये सही तरीके से काम नहीं कर पाते.

हीट वेव

संजय सिसोदिया कहते हैं, "हमें अब तक पूरी तरह नहीं पता कि मस्तिष्क के अलग-अलग हिस्से गर्मी से कैसे प्रभावित होते हैं. लेकिन हम इसे एक घड़ी की तरह सोच सकते हैं, जहां सभी पुर्जे एक साथ सही तरीके से काम नहीं कर रहे हों."

हालांकि अत्यधिक गर्मी सभी लोगों के मस्तिष्क के कामकाज को प्रभावित करती है. जैसे कि ये हमारे फ़ैसला लेने की क्षमता को घटा सकती है या हमें अधिक जोख़िम लेने के लिए प्रेरित कर सकती है.

लेकिन जिन लोगों को पहले से कोई न्यूरोलॉजिकल बीमारी है वो इसका सबसे बुरा असर झेलते हैं.

सिसोदिया बताते हैं, "थर्मोरेगुलेशन यानी शरीर के अंदर तापमान नियंत्रण खुद मस्तिष्क का ही एक काम है और अगर मस्तिष्क के कुछ हिस्से ठीक से काम नहीं कर रहे हों, तो यह व्यवस्था गड़बड़ा सकती है. जैसे मल्टीपल स्केलेरोसिस की कुछ किस्मों में देखा गया कि शरीर का मूल तापमान ही बदल जाता है."

वो समझाते हैं, "इसके अलावा, न्यूरोलॉजिकल और मानसिक बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कुछ दवाएं, जैसे सिज़ोफ्रेनिया की दवाएं, शरीर के तापमान नियंत्रण को प्रभावित करती हैं."

इससे वे लोग जिन्हें ये दवाएं दी जा रही हों, हीटस्ट्रोक (मेडिकल भाषा में हाइपरथर्मिया) के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं और उनके लिए गर्मी के कारण जान का जोखिम भी बढ़ जाता है.

गर्मी बढ़ने का न्यूरोलॉजिकल बीमारियों से लिंक

बांग्लादेश में गर्मी
इमेज कैप्शन, जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन के कारण वैश्विक तापमान बढ़ रहा है, यह हमारे शरीर और मस्तिष्क पर ज़्यादा दबाव डाल रहा है

सबूत यह भी बताते हैं कि डिमेंशिया से पीड़ित लोगों में हीटवेव के दौरान अस्पताल में भर्ती होने और मृत्यु की दर बढ़ जाती है.

इसका एक कारण उम्र हो सकता है. बुज़ुर्गों के शरीर का तापमान नियंत्रित करने की क्षमता कम हो जाती है, लेकिन उनकी सोचने-समझने की क्षमता में कमी भी इसमें भूमिका निभाती है.

इस कारण वो पर्याप्त पानी पीने, खिड़कियां बंद करने या धूप में बाहर न जाने जैसी ज़रूरी सावधानियां नहीं बरत पाते.

बढ़ते तापमान का संबंध स्ट्रोक (ब्रेन अटैक) और उससे होने वाली मौतों की संख्या में इज़ाफे से भी हो सकता है.

एक अध्ययन में 25 देशों में स्ट्रोक से मौत के आंकड़ों को देखा गया है. स्ट्रोक से होने वाली हर एक हज़ार मौतों में औसतन दो अतिरिक्त मौतें, सबसे गर्म दिनों में हुईं.

यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल ससेक्स (ब्रिटेन) में बुजुर्गों में होने वाली बीमारियों की विशेषज्ञ बेथन डेविस कहती हैं, "जब हम देखते हैं कि हर साल दुनिया भर में लगभग 70 लाख लोग स्ट्रोक से मरते हैं तो गर्मी की वजह से हर साल दस हज़ार से ज़्यादा अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं."

बेथन डेविस की टीम ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन से आने वाले सालों में यह स्थिति और बिगड़ सकती है.

टीम का कहना है कि गर्मी से होने वाले स्ट्रोक का बोझ सबसे ज़्यादा मध्यम और निम्न आय वाले देशों पर पड़ेगा, जो पहले ही जलवायु परिवर्तन से सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं. इन देशों में स्ट्रोक के मामले भी सबसे अधिक होते हैं.

वीडियो कैप्शन, AI डेटा सेंटर्स को ठंडा रखने के लिए कितना पानी इस्तेमाल हो रहा है...

एक गर्म दुनिया सबसे छोटे बच्चों के मानसिक विकास को भी नुक़सान पहुंचा रही है.

इंपीरियल कॉलेज लंदन में महिला स्वास्थ्य की प्रोफे़सर जेन हर्स्ट कहती हैं, "भीषण गर्मी और पहले प्रसव जैसी समस्याओं के बीच संबंध पाया गया है."

एक हालिया वैज्ञानिक समीक्षा में पाया गया कि हीटवेव से समय से पहले प्रसव की संभावना 26 फ़ीसदी तक बढ़ जाती है.

इससे बच्चों के मानसिक विकास में देरी हो सकती है, साथ ही उनकी बौद्धिक क्षमता कम हो सकती है.

हर्स्ट कहती हैं, "हालांकि अभी भी बहुत कुछ ऐसा है जिसे हम नहीं जानते."

जलवायु परिवर्तन की वजह से अत्यधिक गर्मी हमारे मस्तिष्क पर भी अतिरिक्त बोझ डाल सकती है. इससे न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियां, जैसे अल्ज़ाइमर या पार्किंसन पनप सकती हैं.

गर्मी मस्तिष्क की उस सुरक्षा दीवार को भी प्रभावित करती है, जो सामान्य तौर पर मस्तिष्क को विषैले तत्वों, बैक्टीरिया और वायरस से बचाती है.

यह बैरियर कमज़ोर हो जाने पर हानिकारक तत्व आसानी से मस्तिष्क तक पहुंच सकते हैं.

जानकार कहते हैं कि जैसे-जैसे तापमान बढ़ेगा, मच्छरों की संख्या भी बढ़ेगी, जो ज़ीका, चिकनगुनिया और डेंगू जैसे वायरस फैला सकते हैं. इनसे न्यूरोलॉजिकल बीमारियां भी पैदा हो सकती हैं.

स्विस ट्रॉपिकल एंड पब्लिक हेल्थ इंस्टीट्यूट के मेडिकल एंटोमोलॉजिस्ट टोबियास ज़ूटर कहते हैं, "ज़ीका वायरस भ्रूण को प्रभावित कर सकता है और माइक्रोसेफेली जैसी समस्या पैदा कर सकता है."

वो कहते हैं, "बढ़ते तापमान और कम सर्दियों की वजह से मच्छरों का प्रजनन काल जल्दी शुरू होता है और देर तक चलता है."

'ग्लोबल वार्मिंग का युग ख़त्म, अब ग्लोबल बॉयलिंग का दौर'

ग्लोबल वार्मिंग
इमेज कैप्शन, संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा था कि अब ग्लोबल वार्मिंग का दौर ख़त्म हो रहा और ग्लोबल बॉयलिंग का दौर शुरू हो रहा है

गर्मी का असर हर व्यक्ति पर अलग-अलग हो सकता है. कुछ लोग गर्म मौसम में बेहतर महसूस करते हैं, जबकि दूसरों के लिए यह बेहद तकलीफदेह हो सकता है.

सिसोदिया कहते हैं, "अलग-अलग संवेदनशीलता के पीछे कई कारण हो सकते हैं और उनमें से एक कारण आनुवंशिक प्रवृति भी हो सकती है.''

वो कहते हैं, "आज हम जो असर न्यूरोलॉजिकल बीमारियों से पीड़ित लोगों में देख रहे हैं वो आने वाले समय में उन लोगों में भी देखे जा सकते हैं जो अभी स्वस्थ हैं. जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन बढ़ेगा आगे ऐसा असर दिख सकता है.''

हीटवेव मस्तिष्क पर कई स्तरों पर असर डाल सकती हैं. हालांकि वैज्ञानिक अभी भी यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि बढ़ता तापमान हमारे मस्तिष्क को किस तरह प्रभावित करता है और क्या अधिकतम तापमान सबसे अधिक असर करता है.

सवाल ये भी हैं कि हीटवेव का दौर कितना लंबा हो तो इससे दिमाग पर असर पड़ सकता है? क्या रात का तापमान ज़्यादा खतरनाक होता है? किन लोगों को ज्यादा जोखिम है?

यही जानकारी हमें ऐसे रणनीति विकसित करने में मदद करेगी, जो गर्मी से सबसे ज़्यादा संवेदनशील लोगों की सुरक्षा कर सके.

इन रणनीतियों में हीटवेव की शुरुआती चेतावनी देने वाले सिस्टम की बहाली हो सकती है .

गर्मी की वजह से दिहाड़ी न कर पाने वाले मज़दूरों को मुआवज़ा देने के लिए बीमा योजना भी बनाई जा सकती है.

जब जुलाई 2023 को अब तक का सबसे गर्म महीना घोषित किया गया तो संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा था, "ग्लोबल वार्मिंग का युग ख़त्म हो गया है, अब ग्लोबल बॉयलिंग (उबाल) का दौर शुरू हो गया है."

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि जलवायु परिवर्तन आ चुका है और वह तेज़ी से बढ़ रहा है. ऐसे में 'हॉट ब्रेन' यानी मस्तिष्क को लेकर चिंता भी शुरू हो गई है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.