ब्रह्मोस मिसाइल की ख़रीद में दिलचस्पी क्यों ले रहे हैं वियतनाम और इंडोनेशिया?

    • Author, शकील अख़्तर
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू संवाददाता
    • ........से, Delhi
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

भारत ने ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल, वियतनाम को बेचने के लिए एक समझौता किया है.

सिंगापुर में हुए शांग्री-ला डायलॉग कार्यक्रम के दौरान बीते शनिवार को सवालों का जवाब देते हुए भारत के रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने इस पर प्रतिक्रिया दी.

उन्होंने कहा कि इस संबंध में वियतनाम के साथ समझौता हो चुका है. हालांकि अभी तक इसकी आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है.

उन्होंने यह भी बताया कि इंडोनेशिया के साथ ब्रह्मोस मिसाइल की बिक्री को लेकर बातचीत अंतिम चरण में है.

14 साल से बिक्री पर चल रही थी वार्ता

भारत और वियतनाम के बीच इस सौदे पर बातचीत 2012 से चल रही है. लेकिन भारत इस समझौते को लेकर कुछ हद तक हिचकिचा रहा था.

दरअसल चीन और वियतनाम के बीच समुद्री सीमा को लेकर विवाद है. भारत को आशंका थी कि अगर वह वियतनाम को मिसाइल बेचता है, तो चीन इससे नाराज़ हो सकता है.

इससे दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ने का ख़तरा भी था.

अब भारत के रक्षा सचिव ने पुष्टि की है कि दोनों देशों के बीच समझौता हो चुका है. लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इस सौदे का आकार क्या है और कितनी मिसाइलें बेची जाएँगी? इसे अब भी गोपनीय रखा गया है.

साल 2022 में भारत ने फ़िलीपींस के साथ 375 मिलियन डॉलर का एक समझौता भी किया था.

रक्षा विश्लेषक राहुल बेदी कहते हैं, "इस समझौते के तहत फ़िलीपींस को ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम के तीन सेट दिए जाने थे. इनमें से दो पहले ही उन्हें सौंपे जा चुके हैं. फ़िलीपींस ने इन मिसाइलों को अपने तटीय इलाक़ों में तैनात किया है."

ब्रह्मोस की मारक क्षमता कैसे बढ़ी

ब्रह्मोस मिसाइल को रूस और भारत ने दो दशक से ज़्यादा समय तक साथ मिलकर विकसित किया है. इसका नाम भारत की ब्रह्मपुत्र नदी और रूस की मोस्कोवा नदी के नामों को मिलाकर रखा गया है.

यह मिसाइल हैदराबाद में बनती है. विश्लेषकों का कहना है कि इस मिसाइल को लेकर भारत और रूस के बीच हुए समझौते को सार्वजनिक नहीं किया गया है.

यह स्पष्ट है कि भारत को इसे बदलने, बेहतर बनाने और बेचने का अधिकार मिला हुआ है.

रक्षा विश्लेषक राहुल बेदी बताते हैं, "इस मिसाइल का वज़न क़रीब 3000 किलोग्राम है. इसकी लंबाई लगभग 10 मीटर है."

"इसकी शुरुआती मारक क्षमता 300 किलोमीटर थी. लेकिन भारत ने अपनी तकनीक से इसे बढ़ाकर क़रीब 500 किलोमीटर कर दिया है."

वह कहते हैं, "यह एक बेहद असरदार और सफल मिसाइल है. हमला करते समय इसकी रफ़्तार क़रीब 4000 किलोमीटर प्रति घंटा होती है."

"यह एक क्रूज़ मिसाइल है. यानी यह ज़मीन के काफ़ी क़रीब उड़ती है. इससे रडार से इसे पकड़ना मुश्किल हो जाता है. इसकी लक्ष्य भेदने की क्षमता बहुत ज़्यादा है."

राहुल बेदी आगे कहते हैं कि ब्रह्मोस एक गैर-परमाणु मिसाइल है. इसी वजह से भारत इसे दूसरे देशों को बेच पा रहा है.

उनके मुताबिक़, अगर इसमें परमाणु हथियार ले जाने की क्षमता होती, तो अंतरराष्ट्रीय समझौतों के तहत इसकी बिक्री पर रोक होती.

वो कहते हैं, "इस मिसाइल में भारत ने 85 प्रतिशत स्वदेशी तकनीक का इस्तेमाल किया है. लेकिन बाक़ी 15 प्रतिशत तकनीक, जैसे इसका इंजन और कुछ धातु के हिस्से, रूस से आते हैं. ये हिस्से भारत में नहीं बनते हैं. फ़िलहाल भारत के पास इन्हें बनाने की क्षमता भी नहीं है."

ब्रह्मोस में दिलचस्पी क्यों बढ़ी?

राहुल बेदी कहते हैं कि फ़िलीपींस, वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देश आधुनिक मिसाइलें ख़रीदने के लिए बड़ी ताक़तों के बजाय भारत का रुख़ कर रहे हैं.

इसके पीछे एक बड़ी वजह यह है कि ब्रह्मोस एक परखी हुई और सफल मिसाइल है. दूसरी अहम वजह यह है कि यह दुनिया के दूसरे देशों की तुलना में काफ़ी सस्ती है.

उनके मुताबिक़, भारत इन मिसाइलों की तैनाती, ट्रेनिंग और स्पेयर पार्ट्स बहुत कम क़ीमत पर या कई बार मुफ़्त में उपलब्ध कराता है. इसी वजह से मध्य एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देश भी इसमें दिलचस्पी दिखा रहे हैं.

इस मिसाइल का इस्तेमाल ज़मीनी लॉन्चर, जहाज़, पनडुब्बी और हवाई हमलों में किया जा सकता है.

रक्षा हलकों की ख़बरों के मुताबिक़, पिछले साल भारत और पाकिस्तान के बीच हुए संघर्ष में भी इसका इस्तेमाल हुआ था. भारत में इसकी काफ़ी तारीफ़ की गई.

हालांकि विश्लेषकों का कहना है कि इसकी आधिकारिक पुष्टि या खंडन नहीं हुआ है.

भारत का बदलता रक्षा क्षेत्र

क़रीब 25 साल पहले तक भारत के रक्षा क्षेत्र पर सरकार का पूरा नियंत्रण था. लेकिन साल 2001 के बाद निजी कंपनियों को भी रक्षा उद्योग में काम करने की अनुमति दी गई.

हाल के वर्षों में निजी कंपनियाँ बड़े स्तर पर रक्षा उत्पादन में शामिल हुई हैं. इसमें युद्धपोत और जहाज़ जैसी चीज़ें भी शामिल हैं.

ब्रह्मोस मिसाइल के कई हिस्से भी निजी कंपनियों ने बनाए हैं. भारत के रक्षा मंत्रालय का कहना है कि आने वाले वर्षों में रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करना उसका लक्ष्य है.

आत्मनिर्भर बनने के साथ-साथ भारत ने शुरू से ही अपने रक्षा उपकरण दूसरे देशों को निर्यात करने की कोशिश भी की है.

क़रीब 20 साल पहले भारत की सरकारी रक्षा कंपनी हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) ने इक्वाडोर को 7 हेलिकॉप्टर बेचे थे. लेकिन निर्यात के कुछ महीनों बाद ही इनमें से 4 हेलिकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गए. इसके बाद इक्वाडोर ने भारत के साथ यह समझौता रद्द कर दिया था.

इस घटना से एचएएल कंपनी को बड़ा झटका लगा था. यही कंपनी अब भारत के आधुनिक लड़ाकू विमान तेजस का निर्माण कर रही है.

भारत इस विमान के निर्यात की भी कोशिश कर रहा है. लेकिन पिछले साल दुबई एयर शो के दौरान एक तेजस विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया. इससे इन कोशिशों को एक बार फिर झटका लगा.

राहुल बेदी कहते हैं, "ऐसी घटनाएँ होती रहती हैं. लेकिन अंतरराष्ट्रीय कंपनियों से मुक़ाबला करने के लिए भारत को अभी लंबा रास्ता तय करना है."

हाल के वर्षों में भारत का रक्षा निर्यात बढ़ा

भारत ब्रह्मोस मिसाइल को अपने प्रमुख रक्षा हथियारों में से एक के रूप में पेश करता है.

विशेषज्ञों का कहना है कि फ़िलीपींस, वियतनाम और इंडोनेशिया के अलावा कई और देशों ने भी इस क्रूज़ मिसाइल में दिलचस्पी दिखाई है.

उनके मुताबिक़, भले ही भारत रूस की मदद के बिना ब्रह्मोस नहीं बना सकता, लेकिन दूसरे देश के साथ मिलकर बनाई गई इस मिसाइल के ज़रिये वैश्विक रक्षा बाज़ार में बड़े देशों से प्रतिस्पर्धा करना भारत के लिए बहुत अहम है.

राहुल बेदी कहते हैं कि पिछले पाँच से छह साल में भारत के रक्षा निर्यात में काफ़ी बढ़ोतरी हुई है.

वह बताते हैं, "साल 2023-24 में भारत का कुल रक्षा निर्यात क़रीब 21 हज़ार करोड़ रुपये था. 2024-25 में यह बढ़कर 28 हज़ार करोड़ रुपये हो गया. और 2025-26 में यह क़रीब 38 हज़ार करोड़ रुपये तक पहुँच गया."

उनके मुताबिक़, "रक्षा मंत्रालय ने घोषणा की है कि 2029-30 तक रक्षा उपकरणों का निर्यात 50 हज़ार करोड़ रुपये तक पहुँचाने का लक्ष्य है. इसमें ब्रह्मोस की बिक्री भी शामिल है."

भारत के रक्षा निर्यात में गोला-बारूद, ड्रोन, ब्रह्मोस, आकाश.. सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल और मल्टी-बैरल गाइडेड पिनाका मिसाइल शामिल हैं.

भारत अब इसराइल के साथ मिलकर बख़्तरबंद ड्रोन भी बना रहा है. इन ड्रोन का निर्यात इसराइल को किया जाता है.

दो साल पहले भारत ने आकाश और पिनाका मिसाइलें आर्मेनिया को बेची थीं. पिनाका एक मल्टी-बैरल मिसाइल सिस्टम है, जिसमें एक समय फ्रांस ने भी दिलचस्पी दिखाई थी.

राहुल बेदी कहते हैं कि भारत के रक्षा क्षेत्र में निजी कंपनियों की भूमिका तेज़ी से बढ़ी है.

उनके मुताबिक, इस समय भारत अपने ज़्यादातर रक्षा हथियार और उपकरण निजी और विदेशी कंपनियों के साथ मिलकर तैयार कर रहा है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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