'मोरल पुलिसिंग' क्या है और इससे कौन से मौलिक अधिकार प्रभावित होते हैं?

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इमेज कैप्शन, भारतीय क़ानून में 'मोरल पुलिसिंग' नाम का कोई अलग अपराध या क़ानूनी अधिकार नहीं है.
    • Author, डिंकल पोपली
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

बिहार के जमुई में एक नाबालिग लड़की के साथ हुई यौन हिंसा के बाद एक बार फिर से 'मोरल पुलिसिंग' पर बहस छिड़ गई है.

पुलिस ने इस मामले में पॉक्सो एक्ट और भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है.

इस घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, जिसके बाद कई नेताओं की भी इस पर प्रतिक्रिया आई. वायरल वीडियो पर समाचार चैनल से बातचीत के दौरान बिहार की खेल मंत्री और जमुई से विधायक श्रेयसी सिंह के बयान को लेकर भी विवाद हुआ.

उन्होंने अपने बयान में कहा था, "मोरल पुलिसिंग भी सलीके और शालीन तरीके से की जा सकती है."

हालांकि, बाद में इस बयान के वायरल होने के बाद इस मुद्दे पर उन्होंने फिर बात की और कहा कि उनके बयान की पूरी क्लिप नहीं चलाई गई थी.

इस घटना के बाद से ये सवाल उठ रहे हैं कि आख़िर 'मोरल पुलिसिंग' क्या है?

क्या इसे भारतीय क़ानून में कोई मान्यता प्राप्त है? इससे किन मौलिक अधिकारों पर असर पड़ सकता है?

'मोरल पुलिसिंग' क्या है?

मुंबई में नैतिक पुलिसिंग के ख़िलाफ़ हुए प्रदर्शन में शामिल एक महिला (फ़ाइल फ़ोटो)
इमेज कैप्शन, मुंबई में नैतिक पुलिसिंग के ख़िलाफ़ हुए प्रदर्शन में शामिल एक महिला (फ़ाइल फ़ोटो)

भारतीय क़ानून में 'मोरल पुलिसिंग' नाम का कोई अलग अपराध या क़ानूनी अधिकार नहीं है.

आम तौर पर इस शब्द का इस्तेमाल उन कोशिशों के लिए किया जाता है, जिनमें कोई व्यक्ति या समूह अपने बनाए नैतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक या सामाजिक नियम दूसरों पर लागू करने की कोशिश करता है.

इसमें कपड़ों, दोस्ती, प्रेम संबंधों, धर्म, जाति, लिंग या किसी व्यक्ति के किसी खास जगह पर जाने को लेकर आपत्ति शामिल हो सकती है.

इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ लॉ मैनेजमेंट एंड ह्यूमैनिटीज़ में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक़, "मोरल पुलिसिंग" का मतलब पुलिस, सतर्कता (विजिलैंटी) समूहों या राजनीतिक रूप से प्रेरित गैर-राज्य तत्वों के ऐसी मनमानी निगरानी और दख़लअंदाज़ी करने से है, जिनमें वे स्वयं को संस्कृति, धर्म, जाति, नस्लीय पहचान और लैंगिक भूमिकाओं का संरक्षक मानते हुए कथित रूप से पारंपरिक भारतीय समाज की पवित्रता को विदेशी प्रभावों से बचाने का दावा करते हैं."

इसमें कोई व्यक्ति या समूह सिर्फ़ अपनी सोच के आधार पर दूसरे को रोकने, धमकाने, बेइज़्ज़त करने या सज़ा देने का अधिकार अपने पास समझने लगता है.

इसकी क़ानूनी मान्यता क्या है?

लुधियाना जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड की लॉ मेंबर डॉ. कमलजीत कौर के मुताबिक़, भारतीय क़ानून में 'मोरल पुलिसिंग' की कोई क़ानूनी मान्यता नहीं है.

वह कहती हैं कि निजी व्यक्तियों या विजिलैंटी समूहों के पास किसी व्यक्ति के कपड़ों, दोस्ती, रिश्तों, संगत या किसी स्थान पर मौजूदगी को लेकर अपनी नैतिक सोच लागू करने का कोई क़ानूनी अधिकार नहीं है.

यह समाज में आम कैसे हुई?

एक ग्राफ़िक इमेज
इमेज कैप्शन, विश्लेषक मोरल पुलिसिंग को सामाजिक नियंत्रण का एक गैर-औपचारिक तरीका बताते हैं.

चंडीगढ़ के महर चंद महाजन डीएवी कॉलेज फॉर विमेन में समाजशास्त्र के वरिष्ठ सहायक प्रोफ़ेसर डॉ. बिंदु डोगरा के मुताबिक़, "मोरल पुलिसिंग कोई नया व्यवहार नहीं है."

वह इसे समाज की 'कलेक्टिव कॉन्शियसनेस' (सामूहिक चेतना) से जोड़ते हैं.

उनके मुताबिक, "हर समाज में कुछ ऐसे नियम और मूल्य बन जाते हैं, जो यह तय करते हैं कि कौन-सा व्यवहार सही है और कौन-सा गलत."

वो कहते हैं, "ये नियम धर्म, जाति, आर्थिक वर्ग या लिंग से जुड़े हो सकते हैं. समस्या तब पैदा होती है, जब लोग यह मानने लगते हैं कि वे इन नियमों के 'रखवाले' हैं और उन्हें अपने तरीके से लागू करना भी उनकी ज़िम्मेदारी है."

डॉ. डोगरा इसे सामाजिक नियंत्रण का एक गैर-औपचारिक तरीका बताते हैं.

उनके मुताबिक़, अगर किसी व्यक्ति का व्यवहार समाज के बनाए गए नियमों के अनुसार नहीं है और कुछ लोगों को लगता है कि सामान्य क़ानूनों के ज़रिए उस व्यवहार को नियंत्रित नहीं किया जा रहा है, तो वे खुद ही उसे 'ठीक' करने की कोशिश करने लगते हैं.

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इमेज कैप्शन, विश्लेषक कहते हैं कि सामाजिक परवरिश में भी मोरल पुलिसिंग मौजूद हो सकती है

'मोरल पुलिसिंग की शुरुआत घर से भी हो सकती है'

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डॉ. बिंदु डोगरा के मुताबिक़, मोरल पुलिसिंग सिर्फ़ सड़कों पर अजनबी ही नहीं करते, बल्कि यह परिवार और सामाजिक परवरिश में भी मौजूद हो सकती है.

वह कहते हैं कि ख़ासतौर पर लड़कियों को छोटी उम्र से ही यह बताया जाने लगता है कि उन्हें क्या पहनना है, कैसे व्यवहार करना है और किन लोगों के साथ संबंध रखने हैं.

परिवार के भीतर यह नियंत्रण अक्सर इसलिए नज़र नहीं आता क्योंकि परिवार को व्यक्ति की सहायता प्रणाली के रूप में देखा जाता है.

उनके मुताबिक़, पीढ़ियों के बीच का अंतर भी इसे बढ़ा सकता है. पुरानी पीढ़ियां अपनी पारंपरिक प्रथाओं और जीवनशैली से जुड़ी रह सकती हैं, जबकि युवा पीढ़ी अगर उन्हें न माने तो इसे कई बार संस्कृति या धर्म के ख़िलाफ़ जाने के रूप में देखा जाता है.

डॉ. डोगरा कहती हैं कि 'झूठी शान के नाम पर की जाने वाली हत्याओं' को भी इसी व्यापक सामाजिक नियंत्रण के संदर्भ में देखा जा सकता है, जहां परिवार किसी रिश्ते या व्यक्तिगत पसंद को अपने पारंपरिक नियमों के ख़िलाफ़ समझकर खुद कार्रवाई करने की कोशिश करता है.

डॉ. डोगरा के मुताबिक़, मोरल पुलिसिंग हमेशा हिंसा से शुरू नहीं होती. किसी व्यक्ति के कपड़ों, उसके शरीर, दोस्ती या रिश्तों के बारे में सोशल मीडिया पर की जाने वाली लगातार आलोचना भी एक तरह के गैर-औपचारिक सामाजिक नियंत्रण का हिस्सा हो सकती हैं.

'मोरल पुलिसिंग' से कौन-से मौलिक अधिकार प्रभावित हो सकते हैं?

महिला और पुरुष बैठे हुए
इमेज कैप्शन, भारतीय संविधान का आर्टिकल 14 क़ानून के समक्ष समानता और क़ानून के समान संरक्षण की गारंटी देता है.

डॉ. कमलजीत कौर के मुताबिक़, मोरल पुलिसिंग के विभिन्न रूप संविधान में दिए गए कई मौलिक अधिकारों को प्रभावित कर सकते हैं.

आर्टिकल 14: बराबरी का अधिकार

भारतीय संविधान का आर्टिकल 14 क़ानून के समक्ष समानता और क़ानून के समान संरक्षण की गारंटी देता है.

डॉ. कमलजीत कौर के मुताबिक़, कोई समूह या व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के लिंग, कपड़ों, दोस्ती, रिश्तों या कथित नैतिकता के आधार पर उसके लिए क़ानून से अलग सामाजिक नियंत्रण की व्यवस्था नहीं बना सकता.

किसी निजी व्यक्ति को यह तय करने का अधिकार नहीं है कि कोई दूसरा व्यक्ति दोषी है और उसे क्या सज़ा मिलनी चाहिए.

आर्टिकल 19: बोलने, आने-जाने और इकट्ठा होने की स्वतंत्रता

आर्टिकल 19 नागरिकों को बोलने और विचार प्रकट करने, शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने, संगठन बनाने और देश में स्वतंत्र रूप से आने-जाने समेत कई स्वतंत्रताएं देता है.

इन पर संविधान में निर्धारित सीमाओं के भीतर ही क़ानूनी प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं.

किसी निजी व्यक्ति की नैतिक सोच अपने आप में दूसरे व्यक्ति की स्वतंत्रता पर क़ानूनी प्रतिबंध लगाने का आधार नहीं बन सकती.

आर्टिकल 21: जीवन, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, गरिमा और निजता

आर्टिकल 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है. सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फै़सलों के माध्यम से इसके दायरे में व्यक्ति की गरिमा और निजता से जुड़ी सुरक्षा को भी मान्यता मिली है.

डॉ. कमलजीत कौर के मुताबिक़, किसी व्यक्ति को सिर्फ़ इस कारण हिंसा, बेइज़्ज़ती या ज़बरदस्ती का सामना नहीं करना पड़ सकता कि किसी दूसरे व्यक्ति को उसकी पसंद ठीक नहीं लग रही है.

महिलाओं को क्यों ज़्यादा निशाना बनाया जाता है?

प्रदर्शन करतीं महिलाएं
इमेज कैप्शन, एक विश्लेषक भारत में महिलाओं के ख़िलाफ़ हमलों और मोरल पुलिसिंग में वृद्धि को मौजूदा राजनीतिक माहौल से भी जोड़ती हैं.

डॉ. बिंदु डोगरा के मुताबिक़, मोरल पुलिसिंग का एक बड़ा हिस्सा लैंगिक मानदंडों से जुड़ा हुआ है.

उनके मुताबिक़, महिलाओं को ऐतिहासिक रूप से कपड़ों, आने-जाने, रिश्तों और यौन व्यवहार के आधार पर अधिक नियंत्रित किया गया है.

वह कहते हैं कि इसके पीछे लैंगिक रूढ़िवाद और ऐसे सामाजिक ढांचे हैं, जहां महिलाओं को अक्सर पुरुषों के मुकाबले निचली स्थिति में रखा जाता है.

इस सोच को परिवार और समाज, दोनों स्तरों पर बदलने की ज़रूरत है.

समाज का कितना असर?

सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी के मुताबिक़, मोरल पुलिसिंग ऐसे समाज में बढ़ती है जहां दमनकारी और कट्टरपंथी ताक़तों का प्रभाव बढ़ जाता है.

वह इसे भारत में महिलाओं के ख़िलाफ़ हमलों और मोरल पुलिसिंग में वृद्धि को मौजूदा राजनीतिक माहौल से भी जोड़ती हैं.

हाशमी के मुताबिक़, क़ानून होने के बावजूद उन्हें लागू करने के लिए संस्थागत इच्छाशक्ति और संवेदनशीलता ज़रूरी है.

उनके मुताबिक़, मोरल पुलिसिंग से निपटने की शुरुआत घर से होनी चाहिए.

वह कहते हैं कि लड़कों की परवरिश इस तरह नहीं होनी चाहिए कि वे खुद को दूसरों पर अधिकार रखने वाला समझें.

हाशमी के मुताबिक़, यह ज़िम्मेदारी घर से शुरू होकर स्कूलों, कॉलेजों, सिनेमा, सार्वजनिक जीवन, राजनीतिक नेताओं और क़ानून लागू करने वाली एजेंसियों तक जाती है.

महिलाओं का समूह
इमेज कैप्शन, पॉक्सो एक्ट की धारा 23 के तहत बच्चे की पहचान बताने वाली जानकारी को सार्वजनिक करने पर रोक है.

इसका मानसिक प्रभाव क्या हो सकता है?

मोरल पुलिसिंग का शिकार होने वाले व्यक्ति पर इसका मनोवैज्ञानिक असर भी हो सकता है.

शबनम हाशमी के मुताबिक़, लगातार बेइज़्ज़ती, धमकी और सामाजिक समर्थन की कमी किसी व्यक्ति के लिए गंभीर मानसिक संकट का कारण बन सकती है.

वह कहती हैं कि कुछ मामलों में इसका असर गंभीर अवसाद या अन्य मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं तक हो सकता है.

हालांकि, हर सर्वाइवर पर इसका असर एक जैसा नहीं होता.

कोई 'मोरल पुलिसिंग' का निशाना बने तो क्या करे?

सबसे पहले अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करना और ज़रूरत पड़ने पर पुलिस की मदद लेना ज़रूरी है.

डॉ. कमलजीत कौर के मुताबिक़, अगर किसी घटना में ऐसा अपराध सामने आता है जिसमें एफ़आईआर दर्ज की जा सकती है, तो संबंधित व्यक्ति पुलिस के पास शिकायत कर सकता है.

मामले के तथ्यों और सबूतों के आधार पर भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराएं लागू हो सकती हैं.

इनमें महिला के साथ मारपीट या ऐसी ज़बरदस्ती, जिसका उद्देश्य उसकी गरिमा को ठेस पहुंचाना हो, यौन हिंसा, कपड़े उतारने की कोशिश, चोट पहुंचाना, गैरक़ानूनी रूप से रोकना और आपराधिक धमकी जैसे अपराध शामिल हो सकते हैं.

अगर संबंधित लड़का या लड़की नाबालिग है और ये मामला पॉक्सो एक्ट के दायरे में आता है तो बच्चे से पूछताछ और उसका बयान दर्ज करने की प्रक्रिया बाल-अनुकूल होनी चाहिए और उसे अनावश्यक रूप से अभियुक्त के संपर्क में नहीं लाया जाना चाहिए.

नाबालिग की पहचान भी क़ानून के तहत सुरक्षित रखी जाती है.

पॉक्सो एक्ट की धारा 23 के तहत बच्चे की पहचान बताने वाली जानकारी, जिसमें नाम, पता, तस्वीर, परिवार या स्कूल से संबंधित जानकारी शामिल हो सकती है, सार्वजनिक करने पर रोक है.

किशोर न्याय क़ानून की धारा 74 भी बच्चे की पहचान सार्वजनिक किए जाने से सुरक्षा प्रदान करती है इसलिए जमुई जैसे मामले में वायरल वीडियो को आगे साझा करना छात्र और छात्रा की निजता और गरिमा को और नुक़सान पहुंचा सकता है.

डॉ. कमलजीत कौर के मुताबिक़, अगर पुलिस कार्रवाई नहीं करती, तो शिकायतकर्ता बीएनएसएस की धारा 173(4) के तहत वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के पास पहुंच सकता है और ज़रूरत पड़ने पर न्यायालय का रास्ता भी अपना सकता है.

मोरल पुलिसिंग
इमेज कैप्शन, विश्लेषक मानते हैं कि मोरल पुलिसिंग के मामलों को सिर्फ लैंगिकता या सामाजिक नैतिकता के नज़रिए से नहीं, बल्कि क़ानून और अधिकारों के नज़रिए से देखा जाना चाहिए.

'मोरल पुलिसिंग' को रोकने के लिए क्या किया जा सकता है?

डॉ. बिंदु डोगरा के मुताबिक़, इसकी शुरुआत बच्चों से होनी चाहिए.

स्कूलों और कॉलेजों में सिर्फ लैंगिक संवेदनशीलता ही नहीं, बल्कि विभिन्न संस्कृतियों और सामाजिक पहचानों के प्रति संवेदनशीलता विकसित करने की भी ज़रूरत है.

वह कहते हैं कि बच्चों को यह समझाना ज़रूरी है कि हर व्यक्ति एक जैसे कपड़े नहीं पहनेगा, एक जैसा व्यवहार नहीं करेगा और न ही एक जैसी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आएगा.

इसलिए किसी अलग व्यवहार को तुरंत गलत मानने के बजाय उसे समझने की कोशिश की जानी चाहिए.

उनके मुताबिक़, सिर्फ़ किताबों का ज्ञान पर्याप्त नहीं है. विद्यार्थियों को विभिन्न सामाजिक परिस्थितियों को समझने और उनसे निपटने की व्यावहारिक समझ भी दी जानी चाहिए.

पुलिस की भूमिका भी महत्वपूर्ण

डॉ. डोगरा के मुताबिक़, ऐसे मामलों को सिर्फ लैंगिकता या सामाजिक नैतिकता के नज़रिए से नहीं, बल्कि क़ानून और अधिकारों के नज़रिए से देखा जाना चाहिए.

इसके साथ ही सर्वाइवर में यह भरोसा पैदा करना भी ज़रूरी है कि अगर उनके साथ कुछ गलत होता है, तो वे अपने स्कूल, कॉलेज, संस्थान या पुलिस को इसकी जानकारी दे सकते हैं.

खास तौर पर नाबालिगों के मामलों में परिवारों और संस्थानों द्वारा ऐसा माहौल बनाया जाना ज़रूरी है, जहां बच्चे डर या शर्म के कारण घटना छिपाने के बजाय मदद मांग सकें.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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