इम्यूनोथेरेपी क्या है और कैंसर के इलाज में कितनी असरदार है?

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- Author, सईदुज़्ज़मां
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
कैंसर के इलाज के लिए अब तक आमतौर पर सर्जरी, कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी का सहारा लिया जाता था. अब इस सूची में इम्यूनोथेरेपी भी जुड़ गई है.
ठाणे के जुपिटर अस्पताल में मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉक्टर चेतना बख्शी के मुताबिक़, इम्यूनोथेरेपी सिर्फ़ भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में तेज़ी से अपनाई जा रही है.
एक सदी से भी ज़्यादा समय तक हुए शोध के बाद अब इम्यूनोथेरेपी का इस्तेमाल इलाज में हो रहा है.
इससे कुछ मरीज़ों का ज़्यादा सटीक इलाज हो पा रहा है. इस तरीके से होने वाले इलाज के कम साइड इफेक्ट होते हैं और इससे लंबे समय तक कैंसर को नियंत्रण में रखने में भी मदद मिलती है.
अब भारत में भी कई तरह के कैंसर के इलाज में इम्यूनोथेरेपी का इस्तेमाल बढ़ रहा है.
कीमोथेरेपी तेज़ी से बढ़ने वाली कैंसर कोशिकाओं पर सीधे हमला करती है लेकिन इस प्रक्रिया में कई स्वस्थ कोशिकाओं को भी नुकसान पहुंचता है. वहीं इम्यूनोथेरेपी शरीर की अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) को कैंसर की पहचान करने और उससे लड़ने में मदद करती है.
हालांकि, डॉक्टर अब भी इसे चमत्कारिक इलाज बताने से बचने की सलाह देते हैं.
इसकी सफलता काफी हद तक कैंसर के प्रकार, मरीज़ की सेहत और बीमारी की जैविक प्रकृति यानी उसकी बायोलॉजी पर निर्भर करती है.

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इम्यूनोथेरेपी और कीमोथेरेपी में क्या अंतर है?

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कीमोथेरेपी में दवाओं के ज़रिए तेज़ी से विभाजित होने वाली कैंसर कोशिकाओं को नष्ट किया जाता है. लेकिन कीमोथेरेपी सिर्फ कैंसर कोशिकाओं पर ही असर नहीं डालती, बल्कि शरीर की स्वस्थ और तेज़ी से बढ़ने वाली कोशिकाओं को भी नुकसान पहुंचाती है.
इसी वजह से बाल झड़ना, उल्टी, थकान और संक्रमण का ख़तरा जैसे कई साइड इफेक्ट्स (विपरीत प्रभाव) देखने को मिलते हैं.
वेदांता मेडिकल रिसर्च फाउंडेशन की मेडिकल डायरेक्टर डॉ. भावना सिरोही कहती हैं, "कीमोथेरेपी कैंसर कोशिकाओं को मारती है, लेकिन यह शरीर की सभी तेज़ी से विभाजित होने वाली कोशिकाओं पर भी असर डालती है, इसलिए शरीर की सामान्य कोशिकाएं भी प्रभावित होती हैं. यही कारण है कि कीमोथेरेपी के कई साइड इफेक्ट होते हैं."
वहीं, इम्यूनोथेरेपी अलग तरीके से काम करती है.
यह सीधे कैंसर पर हमला नहीं करती, बल्कि शरीर के इम्यून सिस्टम को मज़बूत और सक्रिय बनाती है, ताकि वह कैंसर कोशिकाओं को पहचानकर उन्हें खत्म कर सके.
डॉक्टर सिरोही के मुताबिक, "इम्यूनोथेरेपी शरीर के इम्यून सिस्टम को कैंसर कोशिकाओं को पहचानने और खत्म करने की ट्रेनिंग देती है."
आसान भाषा में समझें तो कीमोथेरेपी सीधे कैंसर पर हमला करती है, जबकि इम्यूनोथेरेपी शरीर को कैंसर से लड़ने के लिए तैयार करती है.
इम्यूनोथेरेपी के साइड इफेक्ट्स क्या हैं?

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डॉक्टरों के मुताबिक, इम्यूनोथेरेपी में आमतौर पर कीमोथेरेपी की तुलना में कम साइड इफेक्ट्स होते हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि इसके कोई दुष्प्रभाव नहीं होते.
यह इलाज शरीर के इम्यून सिस्टम को सक्रिय करता है, इसलिए कभी-कभी शरीर स्वस्थ अंगों पर भी हमला करने लगता है.
डॉक्टर सिरोही कहती हैं, "कोई भी दवा बिना साइड इफेक्ट के नहीं होती. यह कहना गलत होगा कि कीमोथेरेपी के दुष्प्रभाव होते हैं, लेकिन इम्यूनोथेरेपी के नहीं. दोनों के अपने दुष्प्रभाव होते हैं."
डॉक्टर बख्शी के अनुसार, "इम्यूनोथेरेपी शरीर की इम्यून कोशिकाओं को कैंसर पर हमला करने के लिए सक्रिय करती है. लेकिन कभी-कभी ये कोशिकाएं ज़रूरत से ज़्यादा सक्रिय होकर सामान्य कोशिकाओं को भी प्रभावित करने लगती हैं, खासकर थायरॉयड और एड्रिनल जैसी हार्मोन बनाने वाली ग्रंथियों को."
"इसके कारण हाइपोथायरॉयडिज़्म, शरीर में स्टेरॉयड की कमी, सोडियम का स्तर कम होना और थकान जैसी समस्याएं हो सकती हैं."
इम्यूनोथेरेपी कैसे काम करती है?

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इम्यूनोथेरेपी के दो प्रमुख प्रकार हैं: सीएआर टी-सेल थेरेपी और इम्यून चेकपॉइंट इनहिबिटर्स.
सीएआर टी-सेल थेरेपी एक आधुनिक और व्यक्तिगत इलाज है, जिसका इस्तेमाल फ़िलहाल मुख्य रूप से कुछ तरह के ब्लड कैंसर में किया जाता है.
इस प्रक्रिया में डॉक्टर मरीज़ के शरीर से टी-सेल निकालते हैं. ये खास इम्यून कोशिकाएं होती हैं, जो शरीर में बाहरी खतरों को पहचानकर खत्म करती हैं.
लैब में इन कोशिकाओं में आनुवंशिक बदलाव किए जाते हैं, ताकि वे कैंसर कोशिकाओं को बेहतर तरीके से पहचान सकें. इसके बाद इन्हें दोबारा मरीज़ के शरीर में डाला जाता है.
ये बदली हुई कोशिकाएं कैंसर को पहचानकर उस पर ज़्यादा प्रभावी तरीके से हमला करती हैं.
फिलहाल, इस थेरेपी का इस्तेमाल मुख्य रूप से ब्लड कैंसर के इलाज में किया जा रहा है.
इम्यून चेकपॉइंट इनहिबिटर्स क्या हैं?

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इम्यूनोथेरेपी की दूसरी प्रमुख श्रेणी इम्यून चेकपॉइंट इनहिबिटर्स है. फ़िलहाल यह इम्यूनोथेरेपी का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला तरीका है.
कई बार कैंसर कोशिकाएं शरीर के इम्यून सिस्टम को धोखा देने के लिए ऐसे 'ऑफ स्विच' सक्रिय कर देती हैं, जिससे इम्यून कोशिकाएं उन पर हमला नहीं करतीं.
चेकपॉइंट इनहिबिटर दवाइयां इन 'ऑफ स्विच' को ब्लॉक कर देती हैं, जिससे इम्यून सिस्टम सक्रिय बना रहता है.
इसके बाद टी-सेल कैंसर को ख़तरे के रूप में पहचानकर उस पर हमला कर पाती हैं.
इस तकनीक को विकसित करने वाले वैज्ञानिकों को साल 2018 में नोबेल पुरस्कार भी मिला था. आज इन दवाइयों का इस्तेमाल दुनिया भर में, भारत सहित, फेफड़ों के कैंसर, सर्वाइकल कैंसर और कुछ कोलोरेक्टल कैंसर के इलाज में किया जा रहा है.
हालांकि, हर प्रकार के कैंसर में इम्यूनोथेरेपी समान रूप से असरदार नहीं होती.
डॉक्टर सिरोही कहती हैं, "कुछ ऐसे कैंसर हैं, जिनमें इम्यूनोथेरेपी उतनी अच्छी तरह काम नहीं करती, जैसे ब्रेन कैंसर और ब्रेस्ट कैंसर. यह लिवर कैंसर में भी काम कर सकती है, लेकिन उतनी प्रभावी नहीं होती, जितनी फेफड़ों के कैंसर, सर्वाइकल कैंसर, एमएसआई-हाई कोलोरेक्टल कैंसर और स्किन कैंसर में होती है."
क्या इम्यूनोथेरेपी कैंसर का इलाज है?

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डॉक्टरों का कहना है कि इम्यूनोथेरेपी को कैंसर का 'पक्का इलाज' कहना सही नहीं होगा.
कुछ प्रकार के कैंसर में इम्यूनोथेरेपी मरीज़ों के ठीक होने की संभावना को काफी बढ़ा सकती है या लंबे समय तक बीमारी को नियंत्रण में रखने में मदद कर सकती है.
डॉक्टर सिरोही कहती हैं, "कुछ कैंसर में इम्यूनोथेरेपी से मरीज़ों के ठीक होने की संभावना बढ़ती है. इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि यह हर कैंसर को पूरी तरह ठीक कर देती है या बिल्कुल असर नहीं करती."
किसी मरीज़ को इम्यूनोथेरेपी दी जा सकती है या नहीं, यह ट्यूमर के प्रकार, उसकी अवस्था और शरीर में उसकी स्थिति जैसी कई बातों पर निर्भर करता है.
यह भी ज़रूरी नहीं कि हर मरीज़ को इम्यूनोथेरेपी दी जा सके.
डॉक्टर सिरोही के अनुसार, "हर मरीज़ को इम्यूनोथेरेपी नहीं दी जा सकती. इसका फ़ायदा किसी को 70%, किसी को 100% और किसी को सिर्फ 20% तक हो सकता है. यह पूरी तरह कैंसर के प्रकार और मरीज़ की स्थिति पर निर्भर करता है."
कमांड हॉस्पिटल, लखनऊ के मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉक्टर मनजीत अहलावत कहते हैं, "जिन मरीज़ों में इम्यूनोथेरेपी असर करती है, उनमें इसका फायदा लंबे समय तक बना रह सकता है."
भारत में इम्यूनोथेरेपी का खर्च कितना है?

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भारत में इम्यूनोथेरेपी की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक इस पर होने वाला खर्च है. यह इलाज पारंपरिक कीमोथेरेपी की तुलना में काफी महंगा होता है.
इलाज का कुल खर्च इस बात पर निर्भर करता है कि कौन-सी दवा दी जा रही है, कैंसर का प्रकार क्या है और इलाज कितने समय तक चलेगा.
डॉक्टरों के मुताबिक, कुछ मामलों में इलाज एक से दो साल तक चल सकता है.
कुल खर्च लगभग 2-3 लाख रुपये से शुरू होकर 30-40 लाख रुपये या उससे भी ज़्यादा तक जा सकता है. कुछ दवाइयों की एक डोज़ की कीमत ही कई लाख रुपये होती है.
डॉक्टर सिरोही कहती हैं, "अगर किसी दवा की एक डोज़ 4 लाख रुपये की है और मरीज़ को 17 डोज़ की जरूरत है, तो आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि कुल खर्च कितना होगा."
हालांकि, कई दवा कंपनियां मरीज़ों के लिए सहायता योजनाएं भी चलाती हैं. कुछ मामलों में अगर 17 डोज़ की ज़रूरत हो, तो उनमें से 8 डोज़ मुफ्त दी जाती हैं.
फिर भी भारत में, जहां ज़्यादातर लोग इलाज का खर्च खुद उठाते हैं, यह इलाज अब भी बहुत महंगा माना जाता है.

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क्या कैंसर के इलाज का भविष्य है इम्यूनोथेरेपी?

इम्यूनोथेरेपी पूरी तरह से कीमोथेरेपी या रेडियोथेरेपी की जगह नहीं ले रही है. बल्कि, यह कैंसर के इलाज का एक महत्वपूर्ण नया विकल्प बनती जा रही है.
अब डॉक्टर बेहतर परिणाम के लिए इम्यूनोथेरेपी को कीमोथेरेपी, सर्जरी या रेडिएशन के साथ मिलाकर इस्तेमाल कर रहे हैं.
डॉक्टर मनजीत अहलावत कहते हैं, "जब इम्यूनोथेरेपी को कीमोथेरेपी के साथ दिया जाता है, तो कई बीमारियों में बेहतर रिज़ल्ट देखने को मिलते हैं."
डॉक्टर बख्शी कहती हैं, "हम आमतौर पर 'पूरी तरह ठीक हो गया' जैसे शब्द इस्तेमाल नहीं करते. लेकिन हमने देखा है कि कुछ मरीज़ों में इम्यूनोथेरेपी से जीवनकाल काफी बढ़ सकता है."
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, "मेरे पास ऐसे मेटास्टेटिक लंग कैंसर के मरीज़ हैं, जिन्होंने इम्यूनोथेरेपी ली और 10 साल बाद भी जीवित हैं. मैं इसे पूरी तरह इलाज नहीं कहूंगी, क्योंकि बीमारी दोबारा लौट सकती है, लेकिन कुछ मामलों में यह जीवन को काफी लंबा कर सकती है."
रिसर्चर्स अब नई इम्यूनोथेरेपी दवाओं और अलग-अलग इलाजों के संयोजन पर काम कर रहे हैं, ताकि यह पता लगाया जा सके कि किन मरीज़ों को इससे सबसे ज़्यादा फायदा हो सकता है.
इम्यूनोथेरेपी कोई चमत्कारिक इलाज नहीं है. लेकिन जिन मरीज़ों पर यह असर करती है, उनके लिए यह कैंसर के इलाज की तस्वीर बदल रही है.
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