भारत में क्या क्षेत्रीय दलों की भूमिका लगातार सीमित होती जा रही है? - द लेंस

भारत में क्या क्षेत्रीय दलों की भूमिका लगातार सीमित होती जा रही है? - द लेंस
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भारत सरकार ने 10 जून 2026 को कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सबसे लंबे समय तक चुने हुए प्रधानमंत्री होने का रिकॉर्ड बना लिया है.

पिछले एक दशक में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व ने भारतीय राजनीति की दिशा और स्वरूप, दोनों को बड़े तौर पर प्रभावित किया है.

और ये सिर्फ़ नीतिगत फ़ैसलों की नहीं बल्कि चुनावी विस्तार की भी कहानी है.

ऐसा विस्तार जिसमें कभी उत्तर और पश्चिम भारत की मानी जाने वाली पार्टी आज बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम और पूर्वोत्तर के कई राज्यों में एक बड़ी राजनीतिक ताक़त बन चुकी है.

शिवसेना, एनसीपी, अकाली दल, बीएसपी, जेडीयू, बीजेडी से लेकर टीएमसी तक, कई क्षेत्रीय दलों ने चुनौतियों और टूट का सामना किया है.

सवाल कई हैं. क्या भारत की राजनीति एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रही है जहां क्षेत्रीय दलों की भूमिका लगातार सीमित होती जा रही है?

क्या बीजेपी का विस्तार विपक्षी क्षेत्रीय राजनीति की जगह ले रहा है? क्या भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों का दौर ढल रहा है?

द लेंस के आज के एपिसोड में इन सभी सवालों पर चर्चा की गई.

इस चर्चा में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़म मुकेश शर्मा के साथ शामिल हुए शिवसेना (शिंदे गुट) के सीनियर नेशनल कोऑर्डिनेटर डॉक्टर अभिषेक वर्मा, वरिष्ठ पत्रकार और लेखक नीलांजन मुखोपाध्याय और तृणमूल कांग्रेस नेता सागरिका घोष.

प्रोड्यूसरः शिल्पा ठाकुर, सईदुज़्जमान

गेस्ट कोऑर्डिनेटरः संगीता यादव

वीडियो एडिटिंगः मुकेश कुमार

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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