होर्मुज़ स्ट्रेट पर इतना जोख़िम क्यों उठा रहा है ईरान?

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इमेज कैप्शन, ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की अमेरिका और इसराइल के हमलों में मौत हो गई थी
    • Author, आमिर आज़मी, बीबीसी फ़ारसी
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 6 मिनट

स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ पर नियंत्रण को लेकर अमेरिका के साथ कई दिनों तक चले टकराव के बाद, ईरान के नेताओं के सामने शायद तीन विकल्प हैं. इनमें से किसी से भी जीत का साफ़ रास्ता नहीं दिखता.

पहला कदम यह है कि अमेरिका की ज़्यादातर मांगें मान ली जाएं. जिसमें कमर्शियल जहाज़ों पर हमले रोककर होर्मुज़ स्ट्रेट से सुरक्षित और बिना रोक-टोक आवाजाही की गारंटी देना, ईरान के पास मौजूद ज़्यादा एनरिच किए गए यूरेनियम के भंडार को खत्म करना या कम करना, और ग्लोबल न्यूक्लियर वॉचडॉग की कड़ी जांच-पड़ताल को मंज़ूरी देना. जैसी बातें शामिल हैं.

इसके बदले में ईरान अपने बंदरगाहों पर अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी को खत्म करने, प्रतिबंधों में राहत और आगे के हमलों से सुरक्षा की मांग कर सकता है.

शायद यह सबसे कम खर्चीला विकल्प है, लेकिन राजनीतिक रूप से सबसे महंगा भी है.

अगर होर्मुज़ स्ट्रेट को फिर से खोल दिया जाता है, लेकिन उसके प्रबंधन में ईरान की भूमिका को आधिकारिक मान्यता नहीं मिलती तो यह ईरान के लिए उस नए दबाव वाले हथियार (डिटरेंट) को छोड़ने जैसा होगा, जिसे ईरान में कई लोग अब अपनी मिसाइलों, क्षेत्रीय सहयोगियों (प्रॉक्सी) और यहां तक कि अपने परमाणु कार्यक्रम से भी अधिक असरदार मानने लगे हैं.

होर्मुज़ स्ट्रेट क्या ईरान की नई ताकत है?

होर्मज़ स्ट्रेट

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इमेज कैप्शन, होर्मुज़ स्ट्रेट दुनिया के सबसे व्यस्त तेल परिवहन चैनलों में से एक है, जो दुनिया के लगभग 20% तेल और एलएनजी का रास्ता है.

पहली बार ईरान ने यह दिखाया है कि उसके ऊपर किए गए किसी भी हमले की कीमत सिर्फ़ उसे ही नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी तुरंत चुकानी पड़ सकती है.

ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लंबे समय से एक ऐसे अधिकार के तौर पर पेश किया गया है, जिसे छोड़ने के लिए ईरान को मज़बूर नहीं जा सकता.

अगर हमलों के बाद ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर सख्त शर्तें मान लेता है, तो यह संदेश जाएगा कि अमेरिका ने सैन्य ताकत के दम पर ईरान को झुका दिया.

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इसके बाद अमेरिका और उसके सहयोगी, ईरान से उसके मिसाइल कार्यक्रम और हिज़्बुल्लाह, इराकी शिया समूहों तथा यमन के हूतियों जैसे सहयोगी संगठनों से रिश्ते खत्म या सीमित करने की भी मांग कर सकते हैं.

दूसरा विकल्प:

दूसरा रास्ता यह है कि ईरान संघर्ष को और तेज़ कर दे. वह अमेरिकी ठिकानों, जहाज़ों और खाड़ी देशों की अहम सुविधाओं पर हमले बढ़ा सकता है, ताकि तेल महंगा हो जाए और वैश्विक आर्थिक परेशानी बढ़े. इससे ईरान को उम्मीद होगी कि अमेरिका और उसके सहयोगी समझौते के लिए तैयार हो जाएंगे.

इसमें सबसे ज़्यादा सैन्य जोखिम है. अगर किसी हमले में बहुत ज़्यादा लोग मारे जाते हैं या खाड़ी क्षेत्र के बुनियादी ढांचे को गंभीर नुकसान पहुंचता है, तो ईरान के पड़ोसी देश सीधे तौर पर इस संघर्ष में शामिल हो सकते हैं और ईरान को एक बड़े गठबंधन का सामना करना पड़ सकता है.

तीसरा विकल्प:

तीसरा विकल्प मौजूदा अस्थिरता को बनाए रखना है: शिपिंग और एनर्जी मार्केट पर इतना दबाव बनाए रखना कि अपना दबदबा बना रहे, लेकिन इतना भी नहीं कि अमेरिका के साथ फिर से पूर्ण युद्ध छिड़ जाए.

तीसरा विकल्प मौजूदा हालात को लंबे समय तक बनाए रखने का है और यही ईरान की अब तक की रणनीति से मेल खाता है.

ईरान का मानना रहा है कि उसे अपने से ज़्यादा ताकतवर दुश्मन को हराने की ज़रूरत नहीं है. अगर वह तब तक टिके रह सकता है, जब तक उसका दुश्मन लड़ाई जारी रखने की इच्छा खो न दे, तो सिर्फ़ उसका बचा रहना ही उसकी जीत माना जा सकता है.

लेकिन दूसरी ओर, आर्थिक प्रतिबंध, युद्ध से हुआ नुकसान और बढ़ती महंगाई देश के भीतर लगातार दबाव बढ़ा रहे हैं."

अगर ईरान लंबे समय तक होर्मुज़ स्ट्रेट का इस्तेमाल हथियार के तौर पर करता रहेगा तो दूसरे देश ऊर्जा और सामान बाहर भेजने के नए रास्ते खोज सकते हैं, जिससे ईरान की ताक़त उतनी ही कम हो सकती है.

ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बग़र ग़ालिबाफ़ ने इस विरोधाभास को माना है. उनका तर्क है कि होर्मुज़ स्ट्रेट का महत्व इससे गुज़रने वाले जहाज़ों की संख्या बढ़ाने में है न कि उसे कम करने में. अगर यह जलमार्ग हमेशा असुरक्षित रहता है तो दुनिया ईरान से बचकर निकलने के दूसरे रास्ते खोजने लगेगी.

ईरान में कौन ले रहा निर्णय?

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इमेज कैप्शन, ईरान का मिसाइल प्रोग्राम, क्षेत्रीय गठबंधन और होर्मुज स्ट्रेट में रणनीति, रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के प्रभाव के केंद्र में हैं

मामले को और जटिल बनाने वाली बात यह है कि ईरान किस आधार पर और कैसे फैसले लेता है, इसे लेकर अभी भी काफी अनिश्चितता है.

ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई के समय में चुने हुए नेताओं, धार्मिक संस्थाओं और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के बीच के विवादों को अंत में सुप्रीम लीडर ही सुलझाते थे. महीनों के युद्ध और खामेनेई के बेटे मोजतबा की नई लीडरशिप के बाद सत्ता का वह संतुलन अब उतना साफ़ नहीं है.

राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान और उनके राजनयिक आर्थिक दबाव कम करने और देश में स्थिरता वापस लाने के लिए समझौते के पक्ष में हो सकते हैं.

वहीं दूसरी ओर, संसद के कट्टरपंथी नेता, ताकतवर गैर-निर्वाचित संस्थाएं और रूढ़िवादी मीडिया यह मान सकते हैं कि अगर ईरान बड़े समझौते करता है तो इससे ईरान की वैचारिक नींव कमज़ोर होगी और उसके समर्थक उससे दूर हो सकते हैं.

सबसे बड़ा सवाल सशस्त्र बलों, खासकर रिवोल्यूशनरी गार्ड्स से जुड़ा है. ईरान का मिसाइल प्रोग्राम, क्षेत्रीय गठबंधन और होर्मुज स्ट्रेट में रणनीति रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के प्रभाव के केंद्र में हैं, फिर भी यह स्पष्ट नहीं है कि तनाव बढ़ाने और बातचीत के फैसलों में इसके कमांडरों की कितनी अहमियत है.

ईरान के सामने मौजूद तीन विकल्पों का असर सरकार के अलग-अलग हिस्सों पर एक जैसा नहीं पड़ेगा. व्यावहारिक सोच वाले नेता शायद किसी समझौते के पक्ष में हों, कट्टरपंथी शायद डटे रहने को बेहतर समझें, जबकि कुछ सैन्य कमांडर तनाव बढ़ने को ईरान की मोल-भाव करने की स्थिति को मज़बूत करने वाला मान सकते हैं.

इसलिए, सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि ईरान कौन-सा रास्ता चुनता है, बल्कि यह भी है कि वह फ़ैसला लेने का अधिकार किसके पास है.

ईरान के लोगों का क्या कहना है?

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इमेज कैप्शन, ईरान अमेरिका संघर्ष लंबा खिंचने से ईरान के आम लोगों को भी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.

नेताओं के लिए संघर्ष और मुश्किल हालात लंबे समय तक झेलना एक राजनीतिक रणनीति हो सकती है, लेकिन आम जनता के लिए यह कहीं ज़्यादा कठिन और दर्दनाक होता है.

जून में ईरान और अमेरिका ने मिलिट्री ऑपरेशन रोकने, होर्मुज़ स्ट्रेट को फिर से खोलने और अगले 60 दिनों में युद्ध खत्म करने के समझौते पर पहुंचने के लिए एक समझौते (MoU) पर हस्ताक्षर किए थे.

लेकिन इस समझौते के तीन हफ़्ते बाद होर्मुज़ स्ट्रेट में जहाज़ों पर ईरानी हमलों और उसके जवाब में अमेरिकी हमलों के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने युद्धविराम खत्म कर दिया.

एक महिला ने बीबीसी फ़ारसी सेवा से कहा कि जब दोबारा युद्ध शुरू हुआ तो उन्हें बहुत ज्यादा दुख हुआ था.

महिला ने कहा, "उन्हें उम्मीद थी कि इस समझौता से दोनों पक्षों को बाकी विवाद सुलझाने और क्षेत्र में फिर से शांति व स्थिरता लाने का समय मिलेगा. लेकिन अब उन्हें डर है कि अब युद्ध में बुनियादी ढांचे का भारी नुकसान होगा और आम नागरिकों के साथ-साथ सैन्यकर्मियों की भी जानें जाएंगी."

ईरान की एक और महिला ने बताया कि जिस विदेशी कंपनी में वह काम करती थी वह बंद हो गई है. डॉक्टरेट की डिग्री और 17 साल का अनुभव होने के बावजूद वह पिछले चार महीनों से बेरोज़गार है.

उन्होंने कहा, "कोई भी नौकरी नहीं दे रहा है, क्योंकि किसी को नहीं पता कि आगे क्या होने वाला है. महंगाई तेजी से बढ़ रही है, बिजली और पानी की कटौती हो रही है और रात में कभी-कभी गोलियों की आवाज़ भी सुनाई देती है."

इन लोगों के अनुभव से किसी एक राजनीतिक नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता. विदेशी हमलों से ईरान के विरोधियों के मन में भी अमेरिका और इसराइल के ख़िलाफ़ गुस्सा पैदा हो सकता है. लेकिन ये घटनाएं यह भी दिखाती हैं कि प्रतिरोध के नाम पर जनता से अनिश्चित काल तक मुश्किलें सहने के लिए कहने की भी एक सीमा होती है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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