आयुर्वेद और होम्योपैथी पर सवाल उठाने वाले 'लिवर डॉक्टर' कौन हैं?

    • Author, विकास पांडे
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

राजागिरि अस्पताल, कोच्चि के हेपेटोलॉजी क्लिनिक के बाहर का वेटिंग रूम उम्मीद और निराशा के बीच ठहरा हुआ है.

एक आदमी चुपचाप ज़मीन को देख रहा है. वो लिवर की गंभीर बीमारी से कमज़ोर हो चुका है. उसे तुरंत इलाज की ज़रूरत है.

पास ही एक और परिवार पुरानी मेडिकल रिपोर्ट्स की फ़ाइल पकड़े बैठा है. उन्हें उम्मीद है कि अस्पताल अब भी उनके अपने को बचा सकता है.

अंदर, डॉ. सिरिएक एबी फ़िलिप्स बिल्कुल शांत हैं. एक मरीज़ उनके सामने बैठा है. फ़िलिप्स आगे झुकते हैं. एक सवाल पूछते हैं. फिर चुप हो जाते हैं.

मैंने केरल के इस क्लिनिक में दो दिन बिताए. मुझे लगा था कि मैं एक बिल्कुल अलग आदमी से मिलूंगा. फ़िलिप्स भारत के सबसे चर्चित और विवादित डॉक्टरों में से एक हैं.

उनके समर्थक उन्हें 'सबूत-आधारित चिकित्सा' का निडर समर्थक मानते हैं. आलोचक उन्हें ध्यान खींचने वाला उकसाने वाला व्यक्ति कहते हैं.

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर 3 लाख से ज़्यादा लोग उन्हें "लिवर डॉक" के नाम से फ़ॉलो करते हैं जहां उन्होंने होम्योपैथी को "झूठी चिकित्सा" कहा है.

उन्होंने वैकल्पिक चिकित्सा करने वालों को झोलाछाप कहा है. वो आलोचकों से यहां तक कह चुके हैं कि वे अपना दिमाग़ बेच आए हैं.

वैकल्पिक चिकित्सा के लोग आरोप लगाते हैं कि वो भारतीय पद्धति को नहीं समझते, और उन पर ग़लत तरीके से हमला करते हैं.

उनकी सोशल मीडिया फ़ीड में पब्लिक हेल्थ की जानकारियां भरी होती है. लेकिन इसमें कड़वी आलोचनाएं भी होती हैं.

इनमें मशहूर हस्तियों के साथ बहस भी शामिल है. उनके अंदाज़ को कई लोग असभ्य बताते हैं.

भारतीय पारंपरिक चिकित्सा से जुड़े भारत के आयुष मंत्रालय ने सिर्फ़ उन्हें लेकर दो औपचारिक समिति बैठकें की हैं.

एक बार उत्तर प्रदेश से एक पुलिस इंस्पेक्टर दो दिन की ट्रेन यात्रा करके उनसे पूछताछ करने गए. वजह थी उनकी एक सोशल मीडिया पोस्ट.

छह साल में फ़िलिप्स पर 16 क़ानूनी मामले दर्ज हुए. इनमें से कुछ अब भी चल रहे हैं.

वर्चुअल इमेज से इतर लिवर डॉक्टर

सोशल मीडिया की छवि के पीछे का इंसान असल में अलग लगा. हमारी बातचीत के दौरान वो संतुलित और धीमे बोलने वाले लगे.

लंबे समय से उनके मरीज़, सहकर्मी और उन्हें जानने वाले डॉक्टर भी ऐसा ही कहते हैं.

वो उन्हें विनम्र, सरल और शिष्ट बताते हैं.

मगर वो बिना माफ़ी मांगे कहते हैं, "यह एक गढ़ा हुआ व्यक्तित्व है."

"वे (सोशल मीडिया के आलोचक) मुझसे नफ़रत करते हैं. लेकिन मैं जो जानकारी देता हूँ, उसे ग़लत साबित नहीं कर सकते. कभी-कभी सुने जाने के लिए शोर मचाना पड़ता है. मैं ख़ास तौर पर ट्रोल्स को निशाना बनाता हूँ. ताकि वे मेरे संदेश से ध्यान न भटका सकें."

वो यह भी कहते हैं कि "अगर लोग मुझे बदतमीज़ या ग़ुस्सैल समझते हैं, जबकि यह सच नहीं है, तो मैं यह कीमत चुकाने को तैयार हूँ."

भारत की प्राचीन पारंपरिक चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद और शराब उनके निशाने पर रहती है.

आयुर्वेद पर लाखों लोग भरोसा करते हैं. इसे सरकार की मदद से चलने वाले मेडिकल कॉलेजों का समर्थन भी मिलता है. यह आम लोगों की ज़िंदगी का हिस्सा बना हुआ है.

तो फिर उन्होंने इसे चुनौती देना अपना मक़सद क्यों बनाया? और इतनी टकराव वाली सार्वजनिक छवि क्यों अपनाई?

वो कहते हैं कि इसका जवाब उनकी अपनी ज़िंदगी में छिपा है.

कौन हैं डॉ. फ़िलिप्स

फ़िलिप्स कभी डॉक्टर बनना नहीं चाहते थे. वो लेखक बनना चाहते थे. उन्हें फ़िल्में पसंद थीं. मेडिसिन उनका सपना नहीं था.

लेकिन केरल में मशहूर गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. फ़िलिप ऑगस्टिन के बेटे होने के कारण यह फ़ैसला लगभग पहले ही हो चुका था.

वो पहली बार मेडिकल प्रवेश परीक्षा पास नहीं कर सके. इसके बाद उन्होंने त्रिशूर के एक रिहायशी कोचिंग सेंटर में नौ महीने बिताए.

वहाँ 40 लड़कों के साथ तंग कमरों में रहना पड़ता था. वो याद करते हैं, "पहले हफ़्ते मैं रोते-रोते किसी तरह सोता था." हालांकि, दूसरी कोशिश में उनका चयन हो गया.

वो मुस्कुराते हुए कहते हैं, "बेंग्लुरु के सेंट जॉन्स मेडिकल कॉलेज में मैं काफ़ी ख़ुश था."

एक समय ऐसा भी आया जब उन्हें शराब के असर के चलते अपने ही प्रोफ़ेसर की देखरेख में भर्ती होना पड़ा.

मेडिसिन उनके लिए सच में तब अहम बनी जब वो कोलकाता में एमडी कर रहे थे.

वह 3,500 बिस्तरों वाला एक सरकारी अस्पताल था. वहाँ दवाओं, उपकरणों और स्टाफ़ की हमेशा कमी रहती थी.

उन्होंने देखा कि डॉक्टर डायबिटीज़ के गंभीर मरीज़ों का इलाज बिना इंसुलिन के ही कर रहे थे क्योंकि उसका स्टॉक ख़त्म हो चुका था.

उन्होंने यह भी देखा कि सीमित साधनों में डॉक्टरों को कठिन फ़ैसले लेने पड़ते थे कि किस मरीज़ को बचाया जा सकता है.

वो कहते हैं, "इतनी कम सुविधाओं के बावजूद लोग अपनी पूरी कोशिश कर रहे थे. और मरीज़ भी खुश थे, भले ही वो संघर्ष कर रहे थे. मैंने पहले कभी इंसानों के बीच ऐसा रिश्ता नहीं देखा था."

बाद में उन्होंने दिल्ली के इंस्टीट्यूट ऑफ़ लिवर एंड बाइलियरी साइंसेज़ में हेपेटोलॉजी की ट्रेनिंग ली.

वो एक अकादमिक करियर बना रहे थे. तभी उनके पिता के अस्पताल को एक बिज़नेस समूह ने अपने कब्ज़े में ले लिया.

वो अपने पिता की प्रैक्टिस को फिर से खड़ा करने के लिए दिल्ली छोड़कर चले गए.

वो कहते हैं कि यह फ़ैसला भी पूरी तरह उनका अपना नहीं था.

वैकल्पिक चिकित्सा की आचोलना का सफ़र

केरल के एक नए अस्पताल में काम करते हुए उन्होंने पहली बार शराब की लत के नुक़सान को क़रीब से देखा.

उन्होंने यह भी देखा कि बिना नियंत्रण वाली हर्बल दवाओं से कितना नुक़सान हो रहा है.

एक छह साल की बच्ची को गंभीर पीलिया और अचानक लिवर फ़ेल होने की हालत में लाया गया.

परिवार ने उसे बुख़ार और जुक़ाम के लिए घर में बना हर्बल काढ़ा दिया था.

वो कहते हैं, "उस बच्चे को बचाने की कोशिश में मैं दो हफ़्तों तक डरावने दौर से गुज़रा."

इस मामले के बाद उनकी रुचि बढ़ी. उन्होंने वैकल्पिक दवाओं और शराब की लत के असर पर पढ़ाई शुरू की.

उस समय उनके राज्य में यह समस्या बहुत फ़ैली हुई थी.

वो कहते हैं कि उन्होंने वैकल्पिक चिकित्सा के विज्ञान और इतिहास में ख़ुद को पूरी तरह लगा दिया.

वो सिर्फ़ एक डॉक्टर बनकर नहीं रहना चाहते थे. वो अपनी प्रैक्टिस में अकादमिक अनुशासन लाना चाहते थे.

उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी केस स्टडी को साझा करना शुरू किया. शुरुआत में बहुत कम लोगों ने ध्यान दिया. फिर विरोध शुरू हुआ.

लाखों लोगों की पारंपरिक चिकित्सा में गहरी आस्था है. कई लोग मानते हैं कि इस पर आधुनिक चिकित्सा के नियम लागू करना संस्कृति को मिटाने जैसा है.

आलोचक कहते हैं कि फ़िलिप्स सिर्फ़ इन मान्यताओं को चुनौती नहीं देते. वो इन पर विश्वास करने वालों को अपमानित करते हैं.

लेकिन वो पीछे नहीं हटते. वो कहते हैं, "मैं प्रैक्टिशनर को झोलाछाप नहीं कह रहा हूँ. मैं यह कह रहा हूँ कि इस पद्धति के सिद्धांत वैज्ञानिक सोच या तार्किक आधार पर नहीं टिके हैं."

"आधुनिक चिकित्सा अपनी ग़लतियों को सुधारती है. लेकिन यह परिपक्वता वैकल्पिक चिकित्सा में नहीं है. यह अपनी कमियों को मानने से इनकार करती है."

इसके बाद उन्होंने पारंपरिक भारतीय दवाओं से होने वाले लिवर नुक़सान पर कई शोध पत्र प्रकाशित किए. ये सभी पीयर-रिव्यूड जर्नल्स में छपे.

यानी ऐसे जर्नल जहां किसी शोध के प्रकाशन से पहले उस क्षेत्र के पेशेवर विशेषज्ञ उसकी समीक्षा करते हैं.

जब आयुष मंत्रालय ने उनके एक अध्ययन पर सवाल उठाए, तो उन्होंने वैज्ञानिक तथ्यों के साथ जवाब दिया.

उन्होंने भारत में बिकने वाले प्रोटीन पाउडर और जेनेरिक दवाओं की गुणवत्ता पर क्राउडफंडिंग के ज़रिये जांच भी करवाई.

'मेरे हर मरीज़ की मौत मेरे साथ रही..'

हाल ही में डॉ. फ़िलिप्स ने अपने अनुभवों पर एक किताब भी लिखी. लेकिन इस रास्ते की क़ीमत उन्हें आर्थिक और भावनात्मक तौर पर चुकानी पड़ी.

वो कहते हैं कि उनकी रोज़ की नौकरी ही किसी को भी डिप्रेशन में डाल सकती है. उनके कई मरीज़ लिवर की गंभीर बीमारी से जूझ रहे होते हैं.

शराब से जुड़ी लिवर बीमारी भारत में तेज़ी से बढ़ रही है. ख़ासकर युवाओं में. सभी को ट्रांसप्लांट नहीं मिल पाता. कुछ लोग बहुत ग़रीब होते हैं.

कुछ बहुत ज़्यादा बीमार होते हैं. कुछ शराब छोड़ नहीं पाते. अधिकतर मरीज़ों की मौत हो जाती है. ऐसे मामलों में उनका काम होता है कि जितना हो सके मौत को सहनीय बनाना.

वो कहते हैं, "आपको यह सुनिश्चित करना होता है कि आपका मरीज़ आख़िरी समय तक खुश रहे. आपको परिवार को समझाना होता है कि मरीज़ मर रहा है. और उसकी मौत गरिमा के साथ हो."

यह बताते हुए वो थोड़ी देर रुकते हैं.

वो कहते हैं कि डॉक्टरों को हमेशा एक ऐसी छवि बनाए रखनी पड़ती है जैसे वो कोई भगवान हों. एक ढाल की तरह है जो सब कुछ सह ले और ख़ुद ठीक बना रहे.

"मैं आपको बता रहा हूँ, सब कुछ बिल्कुल ठीक नहीं होता."

उन्होंने इतने मृत्यु प्रमाण पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं कि गिनती याद नहीं. और हर एक मौत का दुख उनके साथ रह जाता है.

एक बार वो गंभीर मरीज़ को लेकर जूनियर डॉक्टरों से फ़ोन पर बात कर रहे थे. उसी दौरान उनकी कार का हादसा होते-होते बचा. इसके बाद उन्होंने अपनी दिनचर्या बदल दी.

अब वो रोज़ सिर्फ़ 25 मरीज़ देखते हैं. यह संख्या उनके कई साथियों और उनके पिता से भी कम है. उनके पिता आज भी 100 से ज़्यादा मरीज़ देखते हैं.

चार साल पहले उन्होंने शराब भी छोड़ दी. वो कहते हैं, "मैं अपने मरीज़ों से शराब छोड़ने को कैसे कहता, जब मैं खुद पी रहा था."

उन्हें ऑनलाइन गेम खेलना पसंद है. वो अपने परिवार और अपने शौक़ के लिए भी समय निकालते हैं.

वो कहते हैं, "लोग सोचते हैं कि मैं हमेशा सोशल मीडिया पर रहता हूँ. लेकिन ऐसा नहीं है. मैं सीमित समय के लिए ही ऑनलाइन रहता हूँ. वो भी एक मक़सद के साथ."

शोध के साथ क़ानूनी मामलों पर ख़र्च की नौबत

उनकी पत्नी टीना कोलकाता के दिनों से उनके साथ हैं. वो मरीज़ों के साथ उनके रिश्ते को बहुत सरल शब्दों में समझाती हैं.

वो कहती हैं, "वो बहुत धैर्यवान हैं."

वो आगे कहती हैं, "अगर उन्हें मुझे कुछ बताना हो या सिखाना हो, तो वो समय लेते हैं. वो मुझे अच्छी तरह समझाते हैं."

वो थोड़ी देर रुकती हैं. "वो सोशल मीडिया पर जैसे दिखते हैं, एक इंसान के तौर पर बिल्कुल वैसे नहीं हैं."

उनके पिता डॉ. ऑगस्टीन कहते हैं कि शुरू में उन्हें अपने बेटे के सोशल मीडिया प्रोफ़ाइल से आपत्ति थी.

वो कहते हैं, "मुझे उसकी चिंता होती है. लेकिन मैं उसके काम की अहमियत भी समझता हूँ."

फिर भी इसकी व्यक्तिगत क़ीमत काफ़ी ज़्यादा रही है. छह साल में फ़िलिप्स पर कई क़ानूनी मामले दर्ज हुए.

ये मामले वैकल्पिक चिकित्सा से जुड़े विशेषज्ञों और कॉरपोरेट समूहों ने दर्ज कराए. कुछ वकीलों ने मुफ़्त में उनका पक्ष रखा.

लेकिन फिर भी उन्होंने अपनी रक्षा में लाखों रुपये ख़र्च किए.

उनके एक करीबी सहयोगी को एक साझा शोध पत्र को लेकर पूछताछ के लिए रोका गया. इसके बाद वो भारत छोड़कर चले गए.

अब कुछ शोधकर्ता उनके साथ प्रकाशित होने वाले शोध पत्रों में अपना नाम देना नहीं चाहते हैं.

फिर भी वो रुकने को तैयार नहीं हैं.

वो कहते हैं, "कानूनी ख़र्च उठाने से पहले भी मैं अपनी जेब से इन दवाओं की जांच पर पैसा ख़र्च कर रहा था. आम लोगों के लिए सच सामने लाना बहुत ज़रूरी है. ऐसा सच जो उन्हें कभी पता नहीं चलता."

"मेरे हिसाब से यह काम अपनी सुरक्षा और आराम से कहीं ज़्यादा अहम है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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