अमेरिका के कर्ज़ संकट का भारत पर कैसा असर, ऐसे ही कुछ ज़रूरी सवालों के जवाब

व्हाइट हाउस में 17 मई को कर्ज को लेकर चल रही बातचीत का ब्यौरा दिया.
इमेज कैप्शन, व्हाइट हाउस में 17 मई को कर्ज को लेकर चल रही बातचीत का ब्यौरा दिया.
    • Author, टीम बीबीसी
    • पदनाम, दिल्ली
  • प्रकाशित

अमेरिका दुनिया की आर्थिक महाशक्ति है, संसार की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, दुनिया के अनेक देशों की हालत अमेरिका में आए मामूली आर्थिक बदलाव से बनने-बिगड़ने लगती है.

अमेरिका की अर्थव्यवस्था 23 ट्रिलियन डॉलर की है. लेकिन अभी अमेरिका की चर्चा इस वजह से हो रही है कि उसे और कर्ज़ लेने की अनुमति संसद से मिलेगी या नहीं.

मामले की गंभीरता का अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन को चीन के ख़िलाफ़ बनाए गए चार देशों के मोर्चे क्वाड की बैठक ही रद्द करनी पड़ी.

चर्चा ये भी हो रही है कि ऐसे हालात पैदा हो सकते हैं जब अमेरिका कर्ज़ चुकता नहीं कर पाएगा यानी उसके डिफ़ॉल्टर होने का ख़तरा है.

ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति को और कर्ज़ लेने के लिए अमेरिकी कांग्रेस की मंज़ूरी चाहिए जिसकी राह आसान नहीं दिख रही है.

अमेरिका के कर्ज़ के इस संकट, उसकी राजनीति और उसके असर के बारे में आसान भाषा में समझने के लिए पढ़ें--

कर्ज़ की सीमा या 'डेट् सीलिंग' क्या है?

वॉशिंगटन में यूएस कैपिलट बिल्डिंग के बाहर रिपब्लिकन सीनेटरों के साथ सदन के स्पीकर केविन मैकार्थी ने मौजूदा कर्ज संकट के बारे में 17 मई को प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित किया.
इमेज कैप्शन, रिपब्लिकन सीनेटरों के साथ सदन के स्पीकर केविन मैकार्थी ने मौजूदा कर्ज़ संकट के बारे में प्रेस कॉन्फ़्रेंस किया.

डेट् सीलिंग दरअसल वह अधिकतम रक़म है, जिसे अमेरिकी सरकार अपने ख़र्चे पूरे करने के लिए उधार ले सकती है, यह रक़म अमेरिकी कांग्रेस यानी संसद तय करती है.

भारत और अमेरिका सहित दुनिया के अनेक देशों का बजट घाटे में चलता है, यानी सरकार को टैक्स से जितनी आमदनी होती है उससे कहीं अधिक उसके खर्चे होते हैं.

ऐसी स्थिति में सरकार को अपने बिल चुकाने के लिए कर्ज़ लेना पड़ता है.

अमेरिका में यह एक सामान्य प्रक्रिया है. अर्थव्यवस्था की हालत को देखते हुए अमेरिकी कांग्रेस कर्ज़ की सीमा को घटाती और बढ़ाती रहती है.

1960 से लेकर अब तक कर्ज़ की सीमा में अमेरिकी संसद ने 78 बार बदलाव किया है.

लेकिन इस बार बाइडन को विपक्षी रिपब्लिकन सांसदों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है जो कर्ज़ की सीमा को बढ़ाने के बदले कई शर्तें रख रहे हैं जिन्हें मानने को सत्ताधारी डेमोक्रेट तैयार नहीं है.

यहाँ समझने वाली बात ये भी है कि डेट् सीलिंग भविष्य के ख़र्चों के लिए नहीं है, उसका फ़ैसला बजट में होता है.

कर्ज़ लेने की सीमा का संबंध वैसे बिलों से है जिनकी तत्काल अदायगी होनी है यानी डॉलर सरकार पहले ही ख़र्च कर चुकी है या करने का वादा कर चुकी है, और अब लेनदार उसके सिर पर खड़े है, मसलन, सरकारी सेवकों का वेतन और पेंशन वग़ैरह.

क्या अमेरिका सचमुच डिफ़ॉल्टर हो सकता है?

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ज़्यादातर जानकारों का मानना है कि अमेरिका का 'डेट् सीलिंग' का संकट आर्थिक कम और राजनीतिक ज़्यादा है.

बीबीसी ने जितने विशेषज्ञों से बात की है उनमें से ज़्यादातर का यही मानना है कि अमेरिका डिफ़ॉल्टर नहीं होगा, और मौजूदा गतिरोध का हल निकल आएगा.

क्योंकि मामले को नहीं सुलझाया गया, तो इसके नतीजे भयावह हो सकते हैं.

लेकिन जिस तरह कहा जा रहा है कि X जून यानी फलाँ तारीख़ तक इसका हल निकल जाएगा, यही फलाँ तारीख़ डराने वाली है क्योंकि कोई नहीं बता पा रहा है कि यह मामला कब तक सुलझेगा.

जानकार कहते हैं कि एक जून के बाद अमेरिकी ख़ज़ाने की हालत पतली होने लगेगी.

अगर कहीं जो बाइडन कर्ज़ की सीमा बढ़वाने पर सहमति बनाने में नाकाम रहे तो क्या होगा?

कोई इस बात की संभावना से पूरी तरह कोई इनकार भी नहीं कर रहा है.

इस ज़रूरी सवाल का जवाब निवेश बैंक पैनमूर गॉर्डन के मुख्य अर्थशास्त्री साइमन फ्रेंच इस तरह देते हैं, "अगर ऐसा हुआ तो उसके सामने 2008 का वैश्विक आर्थिक संकट एक बर्थडे पार्टी की तरह लगेगा."

एक बात बिल्कुल तय है कि अगर अमेरिकी कांग्रेस ने सीमा नहीं बढ़ाई, तो अमेरिका और कर्ज़ नहीं ले पाएगा.

इसका मतलब होगा कि वह सरकारी कामों का बिल और दूसरी देनदारियाँ चुकता नहीं कर पाएगा.

इसका अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर क्या असर होगा?

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मान लीजिए कि जब आर्थिक रूप से कमज़ोर लोगों को मिलने वाली सहायता प्रभावित होगी तो बड़ी तादाद में लोग अपनी रोज़मर्रा की ज़रूरतों का बिल नहीं भर पाएँगे, जिसका सीधा असर देश की अर्थव्यवसथा पर पड़ेगा.

अमेरिका में सरकारी नौकरी करने वालों की तनख़्वाह, ग़रीब लोगों को मिलने वाले भत्तों और सरकारी सुविधाओं पर इसका सीधा असर पड़ेगा.

बहुत बड़ी तादाद में लोगों को नौकरियों से हटाना पड़ सकता है.

अब तो इसका भी अंदाज़ा मिल चुका है कि मार कितनी गहरी हो सकती है.

अमेरिकी राष्ट्रपति की आर्थिक मामलों की सलाहकार परिषद का बयान आ चुका है कि अगर कर्ज़ की सीमा बढ़ाने पर सहमति नहीं बन पाई और अनिश्चतता थोड़े समय के लिए खिंच गई तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था 6 प्रतिशत से अधिक सिकुड़ सकती है.

अमेरिकी अर्थव्यवस्था में एक प्रतिशत का संकुचन भी किसी आपदा से कम नहीं होगा जिससे करोड़ों लोगों का जीवन सीधे तौर पर प्रभावित होगा.

बीबीसी के एक पॉडकास्ट में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर मोहम्मद अल-एरीन ने बताया कि अगर अमेरिका कर्ज़ चुकाने में नाकाम रहता है तो 'देश मंदी के कुचक्र में फँस सकता है.'

दुनिया के दूसरे देशों पर क्या असर होगा?

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इमेज कैप्शन, अमेरिका में बैंक एटीएम

अब बात दुनिया पर पड़ने वाले असर की, जिसे 'नॉक ऑन इफ़ेक्ट' कहा जाता है.

इसे आप ऐसे समझ सकते हैं कि जब अमेरिका का केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में बेहद मामूली बदलाव करता है तो दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएँ उसके असर से नहीं बच पाती.

अगर 23 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था सिकुड़ती है तो दुनिया के अनेक देशों पर इसकी भारी मार पड़ेगी.

भारत जैसे देश भी इससे प्रभावित होंगे क्योंकि अमेरिका में माँग घटेगी, माँग घटने से निर्यात प्रभावित होगा जिससे दूसरे देशों की अनगिनत कंपनियाँ प्रभावित होंगी.

भारत की सॉफ़्टवेयर इंडस्ट्री पहले ही अमेरिका में माँग घटने की वजह से सुस्ती के दौर से गुज़र रही है.

समझने वाली मोटी बात ये है कि दुनिया में अब बहुत बड़े पैमाने पर कारोबार डॉलर में होता है और दुनिया के अनेक देशों के संरक्षित कोष की मुद्रा डॉलर ही है.

अगर अमेरिका कर्ज़ नहीं चुका पाता तो उसकी साख पर ही नहीं, डॉलर पर ज़ोरदार चोट पड़ेगी.

भारत जैसे देशों को इसका फ़ायदा कुछ हद तक हो सकता है लेकिन डॉलर में होने वाली ख़रीद-बिक्री में भारी उथल-पुथल होगी जो किसी भी अर्थव्यवस्था के हित में नहीं है.

ये मामला इतनी बुरी तरह क्यों फँस गया है?

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लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार की नीतियों और फ़ैसलों का विरोध करना विपक्ष के लिए कोई नई बात नहीं है.

लेकिन इस मामले में समझौता न हो पाने की बड़ी वजह ये है कि विपक्षी रिपब्लिकन सांसदों का कहना है कि सरकार का इतना पैसे ख़र्च करना लगातार जारी नहीं रह सकता.

इसके लिए वे जिस शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं, वह है 'अनसस्टेनेबल'.

अमेरिका में अगले साल राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं, इसलिए डेमोक्रेट राष्ट्रपति जो बाइडन कल्याणकारी कामों में कटौती करके अलोकप्रिय नहीं होना चाहते.

जबकि विपक्षी रिपब्लिकन उन्हें बढ़ते सरकारी ख़र्च के मुद्दे पर घेर रहे हैं.

रिपब्लिकन सांसदों की माँग है कि जो बाइडन वादा करें कि वे बजट में कटौती करेंगे, चुनाव से ठीक पहले कटौती के लिए राज़ी होना राजनीतिक तौर पर डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए घातक हो सकता है.

विपक्षी सांसदों की ये माँग भी है कि सरकारी अनुदान पाने की शर्तों को और सख़्त बनाया जाना चाहिए.

लोकप्रियता दिलाने वाले ख़र्चों में कटौती से डेमोक्रेट साफ़ इनकार कर चुके हैं.

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन यही कह रहे हैं कि मामले का हल निकल जाएगा और डिफ़ॉल्टर होने की नौबत नहीं आएगी.

लेकिन वे ये भी कह रहे हैं कि बजट और 'डेट् सीलिंग' को एक-दूसरे से जोड़ा नहीं जाना चाहिए.

किन सवालों का हल निकलने पर समझौता हो सकता है?

राष्ट्रपति जो बाइडेन

चुनाव से ठीक पहले बजट कटौती पर राज़ी होना डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए कठिन है लेकिन कई ऐसे मुद्दे हैं जिन पर चर्चा चल रही है और सहमति बनने की उम्मीद है.

अमेरिकी ख़ज़ाने में अरबों डॉलर पड़े हैं जो कोविड की महामारी के असर से निबटने के लिए अलग रखे गए थ

बाइेन प्रशासन ज़ाहिर कर चुका है कि वह उस फंड को रिलीज़ करने को तैयार हो सकता है, जो रिपब्लिकन पार्टी की माँगों में शामिल है.

सरकारी अनुदान पाने की शर्तों को सख़्त बनाना, आधुनिक टेक्नॉलोजी लाने के लिए एनर्जी कंपनियों को दिया जाने वाला अनुदान और छात्रों की कर्ज़ माफ़ी पर भी रस्साकशी चल रही है.

माना जा रहा है कि दोनों पक्ष इस रस्साकशी में अपने कुछ राजनीतिक हित साधना चाहते हैं इसलिए आसानी से समझौता नहीं हो रहा है और कोई सुलह पूरी ज़ोर-आज़माइश के बाद ही हो पाएगा.

तब तक पूरी दुनिया दम साधे इंतज़ार करती रहेगी.

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