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गाड़ियों पर नंबर प्लेट लगाने की परंपरा कब, कहां और क्यों शुरू हुई?
- Author, शारदा मियापुरम
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
हाल ही में एक वीडियो वायरल हुआ है जिसमें स्टीयरिंग व्हील पर एक बटन दबाने पर कार की नंबर प्लेट आपकी आंखों के सामने बदल जाती है.
देश के कई हिस्सों में हाल के दिनों में यातायात नियमों के उल्लंघन के जुर्माने और अन्य अपराधों से बचने के लिए वाहनों की नंबर प्लेट बदलने के आरोप में पुलिस की ओर से की गई कार्रवाई की घटनाएं बढ़ रही हैं.
हैदराबाद पुलिस कमिश्नर वीसी सज्जनार ने बताया कि 4 जून को पुलिस ने हैदराबाद शहर भर में विशेष छापेमारी की, जिसके दौरान फ़र्ज़ी नंबर प्लेट वाले 2,100 से अधिक वाहन ज़ब्त किए गए.
पुलिस ने मीडिया को बताया कि 'ऑपरेशन कवच' के नाम से रात 10 बजे से आधी रात तक पुलिस की छापेमारी के दौरान नंबर प्लेट क्लोनिंग, धोखाधड़ी, फ़र्ज़ी नंबर प्लेटों का इस्तेमाल और दो वाहनों के लिए एक ही नंबर का उपयोग करने के मामले पकड़े गए.
पुलिस कमिश्नर ने कहा कि गाड़ियों के रजिस्टर्ड नंबरों से छेड़छाड़ करना ट्रैफ़िक नियम का उल्लंघन माना जाएगा.
उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि नंबर प्लेटों से संबंधित क़ानून का उल्लंघन करने के किसी भी मामले पर आपराधिक मुक़दमा चलाया जाएगा.
ज़ाहिर है आज के दौर में गाड़ियों के नंबर प्लेट को बहुत महत्व दिया जाता है. हम आगे जानेंगे कि गाड़ियों के लिए नंबर प्लेट का कब और किस मक़सद से इस्तेमाल शुरू हुआ था?
गाड़ियों का रजिस्ट्रेशन नंबर क्या होता है?
मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 41(6) के अनुसार, ट्रांसपोर्ट विभाग की ओर से किसी वाहन को आवंटित संख्या को 'रजिस्ट्रेशन नंबर' कहा जाता है.
यह नंबर परिवहन विभाग (आरटीओ) की ओर से देश में चलने वाले किसी भी मोटर वाहन (मोटराइज़्ड व्हीकल) की आधिकारिक पहचान के लिए आवंटित किया जाता है.
मोटर वाहन अधिनियम में यह प्रावधान है कि यह संख्या वाहन के आगे और पीछे इस तरह से लगी हो कि वह साफ़ और स्पष्ट दिखाई दे.
इस अधिनियम की धारा 39 के अनुसार, परिवहन विभाग की ओर से जारी रजिस्ट्रेशन नंबर के बिना देश में किसी भी मोटर वाहन को चलाना एक आपराधिक मामला है.
नंबर प्लेट से क्या जानकारी मिलती है?
गाड़ियों की नंबर प्लेटें एक ख़ास क्रम में लगी होती हैं.
मसलन नंबर प्लेट टीएन 06 एबी 1234 (काल्पनिक नंबर) को लें तो, सेंट्रल मोटर व्हीकल एक्ट (1989) के नियम 50 के अनुसार इसके पहले दो अक्षर (टीएन) उस राज्य का कोड बताते हैं जहां वह संबंधित वाहन पंजीकृत है.
अगले दो अंक (06) राज्य के किसी ख़ास ज़िले या आरटीओ ऑफ़िस कोड को दर्शाते हैं जहां वाहन पंजीकृत है.
नंबर के बीच में मौजूद अंग्रेज़ी अक्षर (एबी) उस समय लागू पंजीकरण सिरीज़ के क्रम को दर्शाते हैं, जिस समय संबंधित वाहन का पंजीकरण किया जाता है.
इसके बाद अंतिम चार अंक (1234) उस वाहन को विशेष रूप से आवंटित की गई पहचान संख्या बताती है, जो संख्या किसी अन्य वाहन को नहीं दी जाती है. अब यह काम कम्प्यूटर की मदद से किया जाता है.
नंबर प्लेट का इतिहास
वाहनों के लिए नंबर प्लेट को क़ानूनी रूप से लागू करने वाला फ़्रांस दुनिया का पहला देश था.
14 अगस्त, 1893 को पेरिस पुलिस के एक अध्यादेश ने एक नया क़ानून लागू किया. यह अध्यादेश पेरिस की सड़कों पर हादसे के बाद भागने वाले गाड़ियों के मालिकों को पकड़ने के लिए नंबर प्लेट को ज़रूरी बनाने के मक़सद से लाया गया था.
इस आदेश में कहा गया, "पेरिस शहर में चलने वाले हर वाहन पर एक पहचान प्लेट होनी चाहिए. प्लेट पर वाहन संख्या के साथ-साथ मालिक का नाम और पता भी अंकित होना चाहिए."
जहां यह नियम पेरिस शहर की सीमा के भीतर लागू किया गया था, वहीं जर्मनी ने सन 1896 में पूरे देश में नंबर प्लेटों का इस्तेमाल शुरू किया.
इस दिशा में नीदरलैंड्स ने एक कदम आगे बढ़ाया. पूरे देश में एक समान नंबर प्लेट कानून लागू करने का श्रेय नीदरलैंड्स को जाता है.
डच सरकार ने सन 1898 में एक नेशनल ट्रैफ़िक क़ानून लागू किया. इसके तहत, 'ड्राइविंग लाइसेंस प्लेट' के नाम से नंबर प्लेट जारी की गईं.
नेशनल म्यूज़ियम ऑफ़ अमेरिकन हिस्ट्री की वेबसाइट के अनुसार, अमेरिका में सबसे पहले सन 1901 में न्यूयॉर्क में कारों के लिए लाइसेंस प्लेट अनिवार्य करने वाला क़ानून पारित किया गया था.
वेबसाइट के मुताबिक़, "हालांकि, उस समय सरकार लाइसेंस प्लेट जारी नहीं करती थी. कार मालिक चमड़े या लोहे के टुकड़ों पर अपने नाम के शुरुआती अक्षर पेंट करके उन्हें पीछे चिपका देते थे. बाद में, सन 1903 में, मैसाचुसेट्स की सरकार ने लाइसेंस प्लेट जारी करना शुरू किया."
भारत में नंबर प्लेट की शुरुआत कब हुई
भारत सरकार के आधिकारिक अभिलेखों के अनुसार, भारत में वाहनों के लिए नंबर प्लेट का नियम आधिकारिक तौर पर सन 1914 में ब्रिटिश सरकार के 'भारतीय मोटर वाहन अधिनियम 1914' के ज़रिए लागू किया गया था.
सन 1900 के आस-पास भारत के कई प्रांतों में गाड़ियों की पहचान संख्याओं के इस्तेमाल के प्रमाण मौजूद हैं.
'द लॉ ऑफ मोटर व्हीकल्स इन इंडिया' नामक पुस्तक के मुताबिक़, 1914 के राष्ट्रीय अधिनियम से पहले ही ब्रिटिश भारत में वाहनों के नियंत्रण और रजिस्ट्रेशन के लिए बॉम्बे (1901), बंगाल (1903), मद्रास (1907), पंजाब (1907) और बर्मा (1906) जैसे कई प्रांतों में अलग-अलग क्षेत्रीय क़ानून लागू थे.
वाहन चालकों की सुविधा के लिए इन सभी क़ानूनों को 1914 में एक ही राष्ट्रीय क़ानून के अधीन लाया गया.
सन 1914 का क़ानून बहुत सरल था और देश भर में वाहनों की संख्या में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई. इसलिए ब्रिटिश सरकार ने ट्रांसपोर्ट सिस्टम को पूरी तरह से रेग्युरलाइज़ करने के लिए मोटर वाहन अधिनियम 1939 लागू किया.
क़ानून क्या कहता है?
सन 1939 के मोटर वाहन अधिनियम ने पूरे देश में नंबर प्लेटों के डिज़ाइन को बदल दिया.
इसके मुताबिक़ दो अक्षरों वाले प्रांतीय/राज्य कोड की एक सिरीज़, उसके बाद अक्षरों की एक सिरीज़, फिर चार संख्याएँ (उदाहरण के लिए: बॉम्बे प्रांतीय नंबर प्लेट: BMY 1234) शुरू की गई.
उस समय यह नियम बनाया गया था कि निजी वाहनों की नंबर प्लेट पर सफ़ेद अक्षर होने चाहिए, और कमर्शियल वाहनों की नंबर प्लेट पर काले अक्षर होने चाहिए.
एमवी एक्ट 1988 में समय के मुताबिक़ बदलाव
आज हम जिस नंबर प्लेट प्रारूप को देखते हैं, वह मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 41 के तहत लागू हुआ. इसे भारत सरकार ने पुराने क़ानून को बदलने के लिए लागू किया था.
राज्य कोड: केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 के नियम 50 के अनुसार, हर राज्य को एक दो-अक्षर का ख़ास कोड आवंटित किया गया है ( मसलन तमिलनाडु के लिए टीएन, बिहार के लिए बीआर, उत्तर प्रदेश के लिए यूपी).
रंग का नियम: इस नियम के अनुसार निजी वाहनों की नंबर प्लेट सफेद होनी चाहिए, वाणिज्यिक वाहनों की नंबर प्लेट पीली होनी चाहिए और इलेक्ट्रिक वाहनों की नंबर प्लेट हरी होनी चाहिए. इन प्लेटों पर काले रंग से नंबर लिखे होने चाहिए, जो स्पष्ट दिखाई दे.
केंद्र सरकार ने फ़र्ज़ी नंबर प्लेट धोखाधड़ी और वाहन चोरी को रोकने के लिए एचआरएसपी (हाई सिक्योरिटी रजिस्ट्रेशन प्लेट) की शुरुआत की है.
इन एल्युमिनियम प्लेटों में क्रोमियम-आधारित होलोग्राम और लेज़र-एनकोडेड नंबर होते हैं, जिससे प्लेट को बदलना मुश्किल हो जाता है.
इसके अलावा, साल 2021 में केंद्र सरकार ने उन लोगों के लिए 'बीएच' (भारत सिरीज़) पंजीकरण संख्या शुरू की, जो काम के सिलसिले में अक्सर दूसरे राज्यों की यात्रा करते हैं.
यह नंबर प्लेट पूरे देश में मान्य है. इसका मतलब है कि अगर आप एक राज्य से दूसरे राज्य में जाते हैं, तो आपको अपने वाहन का दोबारा रजिस्ट्रेशन कराने की ज़रूरत नहीं है.
इतना ही नहीं, इसका एक और फ़ायदा भी है.
चूंकि बीएच सिरीज़ का रजिस्ट्रेशन पूरे देश में मान्य है, इसलिए इस वाहन को दूसरे राज्य के किसी व्यक्ति को भी आसानी से बेचा जा सकता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.