'हम कॉकरोच हैं, ऐसे पीछे हटने वाले नहीं': जय भीम के नारे, आज़ादी-आज़ादी के गाने, जेन-ज़ी धरना स्थल पर क्या कर रहा है?

दिल्ली में प्रदर्शन करते विद्यार्थी (फ़ाइल फोटो)

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इमेज कैप्शन, दिल्ली में प्रदर्शन करते विद्यार्थी (फ़ाइल फोटो)
    • Author, प्रवीण
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 12 मिनट

कॉकरोच की तीन ख़ूबियाँ, जिनके बारे में सबसे ज़्यादा बात होती है: मुश्किल से मुश्किल हालातों में सर्वाइव करना, जहाँ जगह मिले, वहीं जम जाना और वहाँ तेज़ी से फैल जाना.

क़रीब दो महीने पहले जस्टिस सूर्यकांत के एक बयान ने भारत की जेन ज़ी को 'कॉकरोच' शब्द के साथ जोड़ दिया.

यह बयान आने के क़रीब हफ़्ते भर के भीतर ही 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) नाम के इंस्टाग्राम हैंडल से दो करोड़ से ज़्यादा लोग जुड़ गए.

नीट का पेपर लीक होने के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग को लेकर आंदोलन कर रही कॉकरोच जनता पार्टी ने 20 जुलाई को 'चलो संसद' मार्च का आह्वान किया.

उसके बाद से सेंट्रल दिल्ली में जो कुछ देखने को मिल रहा है, उसकी कल्पना शायद ही किसी ने की थी.

जंतर-मंतर पर पैर रखने की जगह भी नहीं थी

पोस्टर लिए खड़ा युवा (फ़ाइल फोटो)

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इमेज कैप्शन, स्टूडेंट्स का आना लगातार जारी था, किसी को यह मालूम नहीं चल रहा था कि उन्हें आगे क्या करना है और कहां जाना है (फ़ाइल फोटो)

सोमवार को सुबह क़रीब 9 बजे मेरी बात हमारे साथी और बीबीसी के रिपोर्टर दिलनवाज़ पाशा से हुई. वह इस मार्च को कवर करने के लिए सुबह ही जंतर-मंतर पहुँच गए थे. उन्होंने बताया, "इतने स्टूडेंट्स को एक साथ दिल्ली की सड़कों पर पहले कभी नहीं देखा था."

कुछ देर बाद मैंने मयूर विहार फ़ेज़ 1 से ऑटो लेकर वहाँ जाने का फ़ैसला किया. इस मार्च की वजह से आईटीओ से पहले एक रेड लाइट पर पुलिस ने सड़क को बंद कर दिया था. वहाँ से छोटे-छोटे स्टूडेंट्स के ग्रुप पैदल ही जंतर-मंतर की तरफ़ जा रहे थे.

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वीडियो कैप्शन, वांगचुक का अनशन खत्म, जंतर मंतर पर ऐसा है माहौल

11 बजे के क़रीब जब मैं जनपथ के नंबर दो मेट्रो गेट पर पहुँचा, तो वहाँ से कनॉट प्लेस के आउटर सर्कल तक सिर्फ़ स्टूडेंट्स की भीड़ नज़र आ रही थी, जो किसी तरह जंतर-मंतर पहुँचने की कोशिश कर रही थी.

कुछ देर बाद जब मैं जंतर-मंतर पर मंच के क़रीब पहुँचा, तो वहाँ पैर रखने की जगह भी मुश्किल से मिल रही थी. आंदोलन की अगुवाई करने वाले सीजेपी के प्रमुख चेहरों में से अभिजीत दीपके या उनके साथियों में से कोई भी वहाँ नज़र नहीं आ रहे थे.

मंच से बार-बार एक अपील सुनाई दे रही थी, "सौरव दास और आशुतोष रांका केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा से मिलने गए हुए हैं. आप लोग यहाँ शांति बनाए रखें."

वहाँ मौजूद हज़ारों छात्रों की भीड़ एक ही सवाल पूछ रही थी: हमें क्या करना है, कहाँ जाना है? कई स्टूडेंट्स मंच की ओर आगे बढ़ने की कोशिश भी कर रहे थे, लेकिन वहाँ भारी संख्या में मौजूद सुरक्षा बल की वजह से वे वहीं रुक गए थे.

स्टूडेंट्स लगातार आ रहे थे. किसी को यह पता नहीं चल रहा था कि उन्हें आगे क्या करना है और कहाँ जाना है.

बारिश में भी डटे रहे प्रदर्शनकारी छात्र

प्रदर्शनकारी छात्र (फ़ाइल फोटो)

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इमेज कैप्शन, दोपहर 2 बजे के बाद जंतर-मंतर, सीपी और जनपथ पर स्टूडेंट्स और पुलिस के बीच झड़प देखने को मिलने लगी (फ़ाइल फोटो)
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कुछ देर बाद जब मैं वहाँ से दोबारा जनपथ की ओर गया, तो बारिश शुरू हो चुकी थी. लेकिन बारिश के बीच भी हर तरफ़ स्टूडेंट्स ही नज़र आ रहे थे.

उन स्टूडेंट्स के बीच जो आवाज़ सबसे ज़्यादा सुनाई दे रही थी, वह 'जय भीम' के नारों की थी.

मैंने कई स्टूडेंट्स से जानने की कोशिश की कि वे कहाँ से आए हैं. उनमें से अधिकतर दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बिहार और हरियाणा से आए थे. लड़कों की जितनी बड़ी तादाद थी, उतनी ही बड़ी तादाद में लड़कियाँ भी नज़र आ रही थीं.

सीपी के आसपास कई मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए गए थे और कई जगहों पर इंटरनेट सेवा भी बंद थी. आंदोलन में पहुँचे अधिकतर स्टूडेंट्स तक इस बारे में जानकारी नहीं पहुँच पा रही थी कि आगे क्या होना है.

दोपहर 2 बजे के बाद जंतर-मंतर, सीपी और जनपथ पर स्टूडेंट्स और पुलिस के बीच झड़पें देखने को मिलने लगीं. दिल्ली पुलिस इन तीनों जगहों से स्टूडेंट्स को वापस भेजने की कोशिश करने लगी. इसके लिए पुलिस ने एक ओर लाठियों का इस्तेमाल शुरू किया, तो दूसरी ओर रैपिड एक्शन फ़ोर्स की गाड़ियों से आँसू गैस के गोले छोड़े जाने लगे.

लेकिन आँसू गैस के गोलों और लाठियों के बावजूद स्टूडेंट्स शाम 7 बजे तक वहाँ जमे हुए थे. उनका कहना था कि वे अपनी मांगें मनवाए बिना वापस नहीं जाएंगे.

कई लड़कियों ने पुलिस के सामने जाकर कहा, "हम क्या ग़लत कर रहे हैं कि आप हमें इस तरह मार रहे हैं? हम कॉकरोच हैं, कॉकरोच. हम ऐसे पीछे नहीं हटने वाले हैं."

लाठियों से बचने की कोशिश में कई स्टूडेंट्स की चप्पलें और जूते टूट गए. लेकिन अगर कुछ नहीं टूटा था, तो वह था उनका हौसला.

जब आंसू गैस के गोलों की बारिश हुई

पुलिस (फ़ाइल फोटो)

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इमेज कैप्शन, पुलिस ने बच्चों को हटाने के लिए आंसू गैस के गोलों की बारिश की (फ़ाइल फोटो)

कनॉट प्लेस (सीपी) के आउटर सर्कल पर रीगल सिनेमा के पास दोपहर 3 से 5 बजे तक पुलिस और स्टूडेंट्स का आमना-सामना देखने को मिला. वहाँ लगातार 'जय भीम' की आवाज़ें गूँज रही थीं और स्टूडेंट्स ने सेंट्रल पार्क के पास बनी मेक इन इंडिया के शेर की प्रतिमा पर क़ब्ज़ा जमा लिया था.

पुलिस ने वहाँ से स्टूडेंट्स को हटाने के लिए आँसू गैस के गोलों की बारिश कर दी. उस वक़्त वहाँ साँस लेना तक मुश्किल हो रहा था, लेकिन स्टूडेंट्स क़रीब 5 बजे तक वहीं जमे हुए थे.

इसी बीच, पास ही मौजूद बैंक ऑफ़ बड़ौदा की बिल्डिंग के सामने उन स्टूडेंट्स को सीपी से बाहर धकेलने के लिए लाठियाँ चलानी शुरू कर दी गईं, जिन्हें पुलिस जंतर-मंतर से खदेड़कर लाई थी. वहाँ कई लोग ऐसे थे, जो पुलिस की वर्दी में नहीं थे, लेकिन बच्चों पर लाठियाँ चला रहे थे.

स्टूडेंट्स ने रीगल सिनेमा के पास आउटर सर्कल पर बसों और वहाँ से गुज़र रही पुलिस की गाड़ियों के सामने भी बैठना शुरू कर दिया. उनका कहना था, "आप हमें क्यों भगा रहे हैं? हमारी बात तो सुनिए. हम क्या कहना चाहते हैं, यह तो सुनिए."

हालाँकि, शाम 7 बजते-बजते वहाँ से ज़्यादातर स्टूडेंट्स वापस लौट गए. शाम 7.30 बजे जब मैं दोबारा जंतर-मंतर पहुँचा, तो वहाँ कुछ ही स्टूडेंट्स बचे थे. पुलिस ने जंतर-मंतर को लगभग ख़ाली करा दिया था.

देर रात जंतर-मंतर पर फिर जुटने लगे स्टूडेंट्स

जंतर-मंतर (फ़ाइल फोटो)

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इमेज कैप्शन, मंगलवार सुबह 9 बजे जंतर-मंतर पर पांच सौ के आस-पास स्टूडेंट्स ही नजर आ रहे थे (फ़ाइल फोटो)

मैं भी यह मानकर घर लौट गया कि यह आंदोलन अब ख़त्म हो गया है.

लेकिन देर रात वहाँ स्टूडेंट्स दोबारा जमा होने लगे. सीजेपी के नेता अभिजीत दीपके केरल हाउस के पास आए और स्टूडेंट्स वहाँ वापस जमा होने लगे.

अगले दिन मंगलवार सुबह 9 बजे जब मैं वहाँ पहुँचा, तो जंतर-मंतर पर पाँच सौ के आसपास स्टूडेंट्स ही नज़र आ रहे थे. दीपके के पास, मंच के नीचे क़रीब 20 लड़के-लड़कियाँ बैठे थे. उन पर पुलिस की लाठियाँ चली थीं और उनमें से ज़्यादातर आरएमएल अस्पताल से डिस्चार्ज होकर आए थे.

किसी के पैरों पर चोट लगी थी, तो किसी के हाथ पर और किसी की कमर पर लाठियों के निशान थे. वे सभी एक ही सवाल कर रहे थे, "हमारी क्या ग़लती थी? हमें क्यों मारा गया?"

बीच-बीच में हो रही हल्की बारिश के बीच दोपहर बाद जंतर-मंतर पर अचानक बड़ी तादाद में स्टूडेंट्स जमा होने लगे. कई लड़कियों के साथ उनके भाई और माता-पिता भी आने लगे.

ग़ाज़ियाबाद की एक लड़की, जो बीटेक फ़ाइनल ईयर की स्टूडेंट थी, अपने पापा को लेकर जंतर-मंतर पहुँची. इस लड़की ने बताया कि कल वह पूरे परिवार के साथ आई थी.

नाम न बताने की शर्त पर लड़की ने कहा, "मैं पूरे परिवार के साथ आई थी. हमें मारा गया. हम आतंकवादी हैं क्या?"

यह कहते हुए लड़की की आँखों में आँसू आ गए. मैंने उनसे पूछा, "क्या आप बात करने में सहज हैं?" कुछ देर बाद लड़की ने कहा, "आप बताइए, हमें क्यों मारा गया? हमारी क्या ग़लती थी? हम अपना हक़ ही तो माँग रहे थे. लेकिन मैं जब तक मुमकिन होगा, हर दिन इस आंदोलन में आने की कोशिश करूँगी."

कुछ देर बाद जंतर-मंतर में एंट्री करने के लिए जनपथ की ओर से स्टूडेंट्स की लंबी-लंबी लाइनें लग गईं. दिल्ली यूनिवर्सिटी में एमए सेकंड ईयर की एक छात्रा से मैंने पूछा कि आप यहाँ किसलिए आई हैं. उन्होंने बताया, "मुझे बहुत तकलीफ़ हुई जब कल पुलिस ने छोटे-छोटे बच्चों पर लाठियाँ चलाईं. मुझे गिल्ट महसूस हो रहा था कि मैं वहाँ क्यों नहीं थी. मैं इसलिए ही आज यहाँ आई हूँ. पुलिस ने बहुत ग़लत किया है. बच्चों के साथ ऐसा नहीं होना चाहिए था."

वहीं, अयोध्या से आए एक शख़्स ने कहा, "कल तो मैं पहुँच नहीं पाया था, लेकिन आज आया हूँ. अब हमारी माँग सिर्फ़ धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े तक सीमित नहीं रही है. हमें अब पीएम नरेंद्र मोदी का इस्तीफ़ा चाहिए."

जंतर-मंतर (फ़ाइल फोटो)

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इमेज कैप्शन, जंतर-मंतर पर देर रात लोग फिर से इकट्ठा होने लगे थे (फ़ाइल फोटो)

रात थी, लेकिन संसद मार्ग छात्रों से भरा था

लाइन में कुछ ऐसे स्टूडेंट्स भी लगे हुए थे, जो सोमवार को हुए मार्च का हिस्सा थे. उनमें से कुछ ने रात बंगला साहिब गुरुद्वारे में गुज़ारी थी. उनका कहना था कि वे शिक्षा में सुधार की अपनी माँगें पूरी हुए बिना यहाँ से वापस नहीं जाएँगे.

इस बीच, जंतर-मंतर की तरफ़ आगे बढ़ने के लिए कोई जगह नहीं बची थी. जंतर-मंतर स्टूडेंट्स की भीड़ से पूरी तरह भर गया था. इसके बाद जनपथ मेट्रो के नंबर दो गेट से संसद मार्ग की तरफ़ स्टूडेंट्स का आना लगातार जारी रहा.

'जय भीम' के साथ अब वहाँ 'आज़ादी-आज़ादी' के गाने भी चलने लगे थे. स्टूडेंट्स ब्लूटूथ स्पीकर पर ये गाने चलाते हुए आ रहे थे. रात होते-होते पूरा संसद मार्ग भरा हुआ नज़र आने लगा.

एक शख़्स अपनी पत्नी और दो साल के बेटे को लेकर संसद मार्ग पर खड़ा था. मैंने उनसे पूछा, "आप इस प्रोटेस्ट में क्यों आए हैं?"

उन्होंने जवाब दिया, "यह बच्चों की लड़ाई है. कल को हमारे बच्चे बड़े होंगे. हम उन्हें बता पाएँगे कि जब बच्चे अपने हक़ के लिए सड़क पर उतरे, तो वे अकेले नहीं थे. हम उनके साथ वहाँ मौजूद थे. हम ख़ुद को इस लड़ाई से दूर नहीं रख सकते. इस लड़ाई में बच्चों की जीत होगी, तभी हमारे बच्चों का भविष्य बेहतर होगा."

फूड डिलीवरी पार्टनर्स (फ़ाइल फोटो)

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इमेज कैप्शन, मंगलवार देर रात फूड डिलीवरी पार्टनर्स नजर आने लगे, वो अपने हाथों में खाने के बड़े बड़े पैकेट लिए थे (फ़ाइल फोटो)

मंगलवार देर रात तक जंतर-मंतर पर एक और अलग नज़ारा देखने को मिल रहा था. वहाँ बहुत सारे फ़ूड डिलीवरी पार्टनर्स नज़र आने लगे थे. वे अपने हाथों में खाने के बड़े-बड़े पैकेट लिए थे और लोगों से पूछ रहे थे, "आप भूखे हैं? आपको खाना चाहिए? तो यह पैकेट रख लीजिए."

एक डिलीवरी पार्टनर से मैंने बात की. उन्होंने बताया, "मेरे पास बिरयानी के 10 पैकेट हैं. किसी ने मुंबई से ये ऑर्डर किए हैं और कहा है कि आप जाकर जंतर-मंतर पर बच्चों को दे आइए. मैं बस वही देने आया हूँ."

जंतर-मंतर के मंच पर क्या हो रहा था, यह संसद मार्ग पर रहते हुए पता नहीं चल रहा था. वहाँ मौजूद लड़के और लड़कियाँ 'आज़ादी-आज़ादी' के गाने गा रहे थे और 'जय भीम' के नारे लगा रहे थे.

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े के साथ अब वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इस्तीफ़ा भी माँगने लगे थे. उनके मन में दिल्ली पुलिस की कार्रवाई को लेकर ग़ुस्सा साफ़ नज़र आ रहा था.

हालांकि दिल्ली पुलिस ने गुरुवार को एक्स पर एक पोस्ट में लिखा, "वर्दी पहन लेने से किसी इंसान का दर्द कम नहीं हो जाता. हर बैज के पीछे धड़कता हुआ एक दिल, एक परिवार और सेवा का एक वादा होता है."

इस पोस्ट में दिल्ली पुलिस ने बताया, "ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों के साथ मारपीट की घटनाएं बेहद परेशान करने वाली हैं. असहमति जताने का अधिकार सभी को है. लेकिन हिंसा की कोई जगह नहीं होनी चाहिए."

दिल्ली पुलिस ने अपने इस पोस्ट के साथ एक वीडियो भी शेयर किया है. इसमें दिख रहा है कि भीड़ एक पुलिस वाले की पिटाई कर रही है.

इससे पहले सोमवार को प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए सुरक्षाकर्मियों ने ना सिर्फ़ आंसू गैस के गोले छोड़े, बल्कि वे उन पर लाठियां भांजते भी दिखे थे. कई वीडियो में पुलिसकर्मी और रैपिड एक्शन फ़ोर्स को लाठियों से मारकर भगाते हुए दिख रहे हैं.

'शिक्षा में सुधार हुए बिना हम कहीं नहीं जाने वाले'

स्टूडेंट (फ़ाइल फोटो)

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इमेज कैप्शन, कई स्टूडेंट्स के हाथों में ये पोस्टर नजर आ रहे थे कि सरकार को अब जवाबदेह होना ही पड़ेगा (फ़ाइल फोटो)

क़रीब 2 बजे जब मैं वहाँ से निकला, तब भी स्टूडेंट्स के जोश में किसी तरह की कोई कमी नज़र नहीं आ रही थी. जिस भी स्टूडेंट से बात की, वह यही कह रहा था कि अब हम यहाँ आ गए हैं, तो शिक्षा व्यवस्था में सुधार हुए बिना हम कहीं नहीं जाएँगे.

रात 2 बजे तक मैं वहाँ रहा और फिर घर लौट गया. बुधवार को सुबह ही जनपथ समेत 16 मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए गए थे, इसलिए मैं ऑटो से ही दोपहर 12 बजे दोबारा जंतर-मंतर पहुँचा.

केरल हाउस के पास से जब मैं मंच के पीछे पहुँचा, तो वहाँ मंच के सामने पहुँचने का कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा था. तभी मेरी मुलाक़ात वहाँ मौजूद दिल्ली यूनिवर्सिटी के दो दृष्टिबाधित छात्रों से हुई.

उन्होंने बताया, "पूरी शिक्षा व्यवस्था ही ख़राब हो गई है. हमारे साथ बहुत बुरा हो रहा है. हमें अपनी परीक्षाओं में लगातार समस्याओं का सामना करना पड़ता है. हम यहाँ अपनी आवाज़ उठाने आए हैं. हमारी बात इस व्यवस्था में कहीं नहीं सुनी जा रही है."

दोनों दृष्टिबाधित छात्र एक-दूसरे का हाथ थामे हुए मंच के पीछे काफ़ी देर तक मौजूद रहे और अलग-अलग लोगों से बातचीत करते रहे.

बुधवार दोपहर 3 बजे के क़रीब मैं फिर संसद मार्ग चला गया. वहाँ यह पता नहीं चल रहा था कि जंतर-मंतर के मंच पर क्या चल रहा है. एक भी मिनट ऐसा नहीं गुजर रहा था जब बच्चे जनपथ मेट्रो स्टेशन के पास मौजूद रास्ते से वहाँ आते हुए न दिख रहे हों.

उनके हाथों में अलग-अलग तरह के पोस्टर नज़र आ रहे थे. कोई संविधान की तस्वीर लिए हुए था, तो कोई भगत सिंह की तस्वीर. कई स्टूडेंट्स के हाथों में ऐसे पोस्टर भी नज़र आ रहे थे, जिन पर लिखा था कि सरकार को अब जवाबदेह होना ही पड़ेगा.

तभी मेरी नज़र 8 बच्चों के एक ग्रुप पर गई. मैंने उनसे बात करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने कहा, "हम स्कूल नहीं गए, यहीं आ गए थे, तो ज़्यादा बात नहीं कर सकते."

लड़की बोली- घर जितना सेफ़ फ़ील हो रहा है

पोस्टर लिए खड़ी छात्रा (फ़ाइल फोटो)

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इमेज कैप्शन, प्रोटेस्ट में जितनी तादाद में लड़के थे, क़रीब क़रीब उतनी ही तादाद में लड़कियां भी थीं (फ़ाइल फोटो)

उसी दौरान तीन स्टूडेंट्स, जो नीट और जेईई की तैयारी कर रहे थे, अपने कोचिंग सेंटर की टी-शर्ट पहने वहाँ आए थे.

उनमें से एक स्टूडेंट ने मुझे बताया, "हम यहाँ इसलिए आए हैं, ताकि इस सिस्टम में सुधार हो. जब हम अगले साल अपनी परीक्षाएँ देने जाएँ, तो वे लीक न हों. हम बस इसलिए इन बच्चों का साथ देने आए हैं."

वहीं पास में एक लड़की खड़ी थी, जिसके हाथ में एक पोस्टर था. उस पर लिखा था, "शिक्षा चाहिए, डर नहीं."

वह लड़की अलवर से आई थी. उसका भाई भी साथ था. लड़की के भाई ने बताया, "यह अकेली आ रही थी, लेकिन हम इसे अकेले नहीं आने देना चाहते थे. हमें इसका साथ देना था. मैं अपनी नौकरी से छुट्टी लेकर आया हूँ. जब तक छुट्टी मिलती रहेगी, हम दोनों भाई-बहन यहीं रहने वाले हैं."

लड़की ने बताया, "यह हमारी लड़ाई है. हमें लड़नी है. मैं दूर बैठकर यह नहीं देख सकती कि कुछ भी नहीं बदल रहा है. हम इस बदलाव का हिस्सा हैं."

इस बीच लगातार वहाँ खाने के ढेर लगते जा रहे थे. जगह-जगह खाना नज़र आ रहा था. लोग कह रहे थे, "जिसे खाना है, प्लीज़ ले जाइए. खाना बहुत ज़्यादा हो गया है."

संसद मार्ग पर ही एक लड़की खाना खा रही थी. मैंने उनसे पूछा कि वह कहाँ से आई हैं, तो उन्होंने बताया कि वह उत्तर प्रदेश से आई हैं.

उन्होंने कहा, "मैं यहाँ चार लड़कों के साथ बैठी हूँ. मैं इन्हें यहाँ आने से पहले नहीं जानती थी, लेकिन इनसे मिलकर लग ही नहीं रहा कि हम पहली बार मिले हैं. मुझे इनके साथ इतना सुरक्षित महसूस हो रहा है, जैसे मैं अपने घर में हूँ. परसों जब हम जनपथ पर थे, तो पुलिस मुझे डंडा मारने आई. इन दो लड़कों ने मुझे बचाया. ख़ुद डंडे खा लिए, लेकिन मुझे नहीं लगने दिए."

"तब से हमारी दोस्ती हो गई. हम लोग परसों से साथ ही हैं और यहीं रह रहे हैं. हम जहाँ भी जा रहे हैं, साथ जा रहे हैं. जब तक मुमकिन होगा, हम यहाँ रहने की कोशिश करेंगे."

स्टूडेंट्स के बीच ये बात कॉमन थी

छात्र (फ़ाइल फोटो)

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इमेज कैप्शन, बुधवार शाम में कुछ ऐसे बच्चे भी मिले जो मेट्रो स्टेशन बंद होने की वजह से कई किलोमीटर पैदल चलते हुए वहां पहुंचे (फ़ाइल फोटो)

बुधवार को स्टूडेंट्स अलग-अलग तरह के पोस्टर लेकर जंतर-मंतर पर नज़र आ रहे थे.

एक स्टूडेंट के हाथ में पोस्टर था, "मिस्टर प्राइम मिनिस्टर, यू आस्क फ़ॉर वोट्स. कैन वी आस्क फ़ॉर योर अकाउंटेबिलिटी?"

शाम को कुछ ऐसे स्टूडेंट्स भी मिले, जो मेट्रो स्टेशन बंद होने की वजह से कई किलोमीटर पैदल चलकर वहाँ पहुँचे थे. कोई चंडीगढ़ से दिल्ली आया था, तो कोई केरल से और कोई गुजरात से.

बुधवार रात 9 बजे तक मैं वहाँ रहा और मैंने देखा कि जंतर-मंतर के अलावा संसद मार्ग पर भी अब पैर रखने की जगह नहीं बची थी. सुबह से लेकर शाम तक की तेज़ उमस के बीच स्टूडेंट्स हाथ वाले पंखों से एक-दूसरे का साथ देना बंद नहीं कर रहे थे.

इन तीन दिनों में एक बात जो उन सभी स्टूडेंट्स के बीच साझा थी, वह थी शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी ख़ामियाँ. और अब यही बात वहाँ मौजूद हज़ारों छात्रों के बीच पहचान का एक ज़रिया बन गई है. वे यहाँ अकेले ज़रूर आए थे, लेकिन जब जाएँगे, तो बदलाव की इबारत लिखने वाली कई कहानियाँ और इस दौरान बनी दोस्तियाँ साथ लेकर जाएँगे.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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