'मैं वापस आऊंगा' के पीछे की कहानी, लेखिका की असल ज़िंदगी से कितनी मेल खाती है

बीबीसी उर्दू की संवाददाता शुमाइला ज़ाफ़री के साथ वीडियो कॉल पर फ़िल्म मैं वापस आऊंगा की लेखिका नयनिका मेहतानी ने बात करके अपनी स्मृतियां साझा कीं
इमेज कैप्शन, बीबीसी उर्दू की संवाददाता शुमाइला ख़ान के साथ वीडियो कॉल पर फ़िल्म मैं वापस आऊंगा की लेखिका नयनिका मेहतानी ने अपनी स्मृतियां साझा कीं
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1947 के बंटवारे ने जिस तरह लाखों परिवारों को दो मुल्कों में बांट दिया था, उसी त्रासदी का असर फ़िल्म लेखिका नयनिका मेहतानी के परिवार पर भी पड़ा.

अपने बिखरे हुए परिवार और बंटवारे से जुड़ी अनगिनत कहानियों से प्रेरित होकर उन्होंने निर्देशक इम्तियाज़ अली के साथ फ़िल्म 'मैं वापस आऊंगा' लिखी है.

बंटवारे से पहले नयनिका का परिवार पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के सरगोधा जिले के भेरा इलाके में रहता था. आज भी उनके कुछ रिश्तेदार सरगोधा के गांव सालम में बसे हुए हैं.

बीबीसी उर्दू की संवाददाता शुमाइला ख़ान ने इस फ़िल्म की लेखिका नयनिका मेहतानी से बात की, जिन्होंने अपने नाना-नानी, दादा-दादी के जीवन और बंटवारे के बाद उनकी स्मृतियों से प्रेरणा लेकर यह फ़िल्म लिखी.

नयनिका का कहना है कि भेरा में "सान्या दी हवेली" उनके परिवार की पहचान थी, इस इलाके का बीबीसी ने दौरा किया
इमेज कैप्शन, नयनिका का कहना है कि भेरा में 'सान्या दी हवेली' उनके परिवार की पहचान थी, इस इलाके का बीबीसी ने दौरा किया

नयनिका बताती हैं कि भेरा में 'सानियों का मोहल्ला' और वहां स्थित 'सान्या दी हवेली" उनके परिवार की पहचान थी. उसी हवेली में उनके पूर्वजों की कई पीढ़ियां रहीं और वहीं उनका बचपन बीता.

नयनिका कहती हैं कि उन्होंने अपने दादा-दादी और नानी-नाना से उस हवेली और वहां के जीवन के बारे में बहुत-सी कहानियां सुनी थीं.

हालांकि उनके दादा-दादी भारत आ गए थे, लेकिन उनकी नानी का परिवार सरगोधा में ही रह गया.

सालम में रहने वाले नयनिका के मामा बांका साहनी बताते हैं कि बंटवारे के समय स्थानीय मुस्लिम पड़ोसियों ने उनके परिवार को सुरक्षा दी.

उनके अनुसार, "मेरे दादाजी मोहनलाल साहनी को लोगों ने जाने नहीं दिया. दोस्तों और पड़ोसियों ने सहारा दिया, इसलिए वे यहीं रुक गए."

वीडियो कैप्शन, 'मैं वापस आऊंगा' फ़िल्म सिर्फ़ फ़िल्मी कहानी नहीं बल्कि असल कहानी है

जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, बांका साहनी का परिवार आज भी सालम का एकमात्र हिंदू परिवार है. इसके बावजूद उनका अपनी पुश्तैनी ज़मीन से गहरा जुड़ाव बना हुआ है.

गांव में एक समाधि स्थल भी है, जहां उनके पूर्वजों की अस्थियां दफ़न हैं.

बांका साहनी कहते हैं, "मुझे यहां रहकर कभी यह महसूस नहीं होता कि मैं हिंदू हूं. मेरे सारे दोस्त और सहपाठी मुसलमान हैं. हम साथ खाते-पीते हैं. कभी किसी ने कोई ऐतराज़ नहीं किया."

'वे बंटवारे के दर्द के बजाय बचपन पर बात करते थे'

नयनिका के बुजुर्गों की तस्वीर

इमेज स्रोत, Instagram/nayanikawrites

इमेज कैप्शन, नयनिका के बुजुर्गों की तस्वीर

नयनिका मेहतानी बताती हैं कि उनके दादा-दादी ने कभी बंटवारे के दर्द या उस दौर की त्रासदी के बारे में खुलकर बात नहीं की.

इसके बजाय वे अपने बचपन और युवावस्था की यादें सुनाया करते थे, जिनसे नयनिका बेहद प्रभावित होती थीं.

वह कहती हैं, "वे सरगोधा के विशाल कीनू के बागों का ज़िक्र करते थे. मेरी नानी अपने घर के आसपास के माहौल, परिवार के साथ बिताए पलों और भाई-बहनों के साथ तांगे में बैठकर स्कूल जाने की बातें सुनाती थीं."

नयनिका के मुताबिक़, उनके दादाजी भी अपने स्कूल के दिनों के कई दिलचस्प क़िस्से साझा करते थे. उनमें से एक कहानी अपने सबसे क़रीबी दोस्त के साथ उर्दू में एक-दूसरे का नाम टैटू करवाने की थी.

यह प्रसंग उनके मन में इतना गहरा बैठ गया कि उसकी झलक फ़िल्म में भी दिखाई देती है.

फ़िल्म में नसीरुद्दीन शाह के क़िरदार के हाथ पर उर्दू में एक नाम का टैटू दिखाया गया है. जिसको देखकर मुख्य क़िरदार के पोते का क़िरदार निभाने वाले दिलजीत दोसांझ सरगोधा जाते हैं.

वीज़ा नहीं मिला तो असिस्टेंट की नज़र से देखा पुश्तैनी इलाक़ा

सरगोधा
इमेज कैप्शन, कहानी लिखने वालीं नयनिका खुद सरगोधा नहीं जा सकीं

फ़िल्म की रिसर्च के दौरान वीज़ा में देरी होने के कारण नयनिका खुद सरगोधा नहीं जा सकीं.

ऐसे में उन्होंने अपनी सहायक जस्सी और लाहौर की एक टीम को अपने पुश्तैनी इलाक़े में भेजा.

नयनिका कहती हैं, "मैं जस्सी की आंखों से पहली बार उन जगहों को देख रही थी. जब हमने पटियाला में सरगोधा का सेट बनाया था, तब मुझे पता था कि वह वास्तविक नहीं है. लेकिन जब मैंने असली जगहों की तस्वीरें और वीडियो देखे, तो ऐसा लगा जैसे मैं अपनी नानी के बचपन के और क़रीब पहुंच गई हूं. वह पल मेरे लिए बेहद भावुक था."

सरगोधा से इस भावनात्मक जुड़ाव की झलक फ़िल्म के क्लाइमैक्स में भी दिखती है.

अंत में मुख्य क़िरदार का पोता, जिसकी भूमिका दिलजीत दोसांझ ने निभाई है, पाकिस्तान के सरगोधा पहुंचकर अपने पुरखों के घर की तलाश में गलियों से गुज़रता है.

दूसरी ओर, बिस्तर पर पड़े मरणासन्न मुख्य क़िरदार, जिसे नसीरुद्दीन शाह ने निभाया है, वीडियो कॉल के जरिए उन परिचित रास्तों और घर को देखता है, जहां वह कभी रहा करता था.

'उन्होंने कड़वाहट नहीं पनपने दी'

 नयनिका ने कहा कि इस तरह की फ़िल्में दोनों मुल्क़ों को क़रीब ला सकती हैं
इमेज कैप्शन, नयनिका ने कहा कि इस तरह की फ़िल्में दोनों मुल्क़ों को क़रीब ला सकती हैं
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भारत और पाकिस्तान के बीच जारी तनाव के दौर में जब नयनिका मेहतानी से पूछा गया कि क्या 'मैं वापस आऊंगा' जैसी फ़िल्में दोनों देशों के लोगों को क़रीब ला सकती हैं? तो उन्होंने कहा कि यही उनकी उम्मीद है.

नयनिका कहती हैं, "हमने यह फ़िल्म किसी राजनीतिक संदेश के लिए नहीं बनाई. बंटवारा इस कहानी की पृष्ठभूमि भर है. मेरी कोशिश अपने दादा-दादी और नाना-नानी के अनुभवों और उनकी स्मृतियों को सम्मान देने की थी."

उनके मुताबिक, स्वतंत्रता और बंटवारा उनकी पीढ़ी के लिए एक साथ आए थे, लेकिन आज़ादी का उत्सव इतना बड़ा था कि शायद उन्हें अपने बिछड़ने, अपने लोगों को खोने और उस दर्द का शोक मनाने का अवसर ही नहीं मिला.

वह कहती हैं, "मुझे उस पीढ़ी की एक बात हमेशा बहुत प्रभावित करती है. उनके पास कड़वाहट रखने की हर वजह थी. उन्होंने अपने प्रियजनों को खोया, अपने घर-बार छोड़े, लेकिन फिर भी उन्होंने अपने भीतर कटुता नहीं पनपने दी. अगर वे कड़वाहट के साथ नहीं जीए, तो फिर हम आज उसे क्यों ढो रहे हैं?"

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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