भारतीय शेयर बाज़ार से विदेशी निवेशक क्यों भाग रहे हैं, जानिए क्यों बढ़ा है अविश्वास

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- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
अमेरिका और इसराइल ने फ़रवरी के अंत में जब ईरान पर हमला किया तो इसका सीधा असर भारत पर पड़ा. विदेशी निवेशकों ने रिकॉर्ड गति से भारतीय शेयर बाज़ार से पैसा निकालना शुरू कर दिया.
दूसरी तरफ़ तेल की क़ीमतों में तेज़ उछाल के कारण भारतीय मुद्रा रुपए में ऐतिहासिक गिरावट आई.
28 फ़रवरी को ईरान पर हमले के बाद से विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाज़ार से लगभग 21 अरब डॉलर निकाल लिए हैं. इनमें केवल मार्च महीने में ही लगभग 13 अरब डॉलर की निकासी हुई.
एनएसडीएल के आँकड़ों के अनुसार, मार्च में जितना एफ़आईआई भारतीय शेयर बाज़ार से बाहर गया, उतना एक महीने में कभी नहीं गया था.
1993 में भारतीय बाज़ार को विदेशी निवेश के लिए खोले जाने के बाद यह विदेशी निवेश निकासी के लिहाज से अब तक का सबसे ख़राब साल माना जा रहा है.
फ़ॉरेन इंस्टिट्यूशनल इन्वेस्टर (एफ़आईआई) यानी ऐसे निवेशक या निवेश फंड जो दूसरे देशों में भी रजिस्टर्ड होते हैं. भारत के मामले में एफ़आईआई ऐसी विदेशी संस्थाएं हैं, जो म्यूचुअल फंड, पेंशन फंड, इंश्योरेंस कंपनियाँ, हेज फंड और सॉवरेन वेल्थ फंड की तरह हैं.
भारत में एफ़आईआई को सेबी के पास रजिस्ट्रेशन कराना ज़रूरी है. 2014 में सेबी ने एफ़आईआई सब-अकाउंट और क्वॉलिफाइड फॉरन इन्वेस्टर को मिलाकर एक नई कैटिगरी बना दी थी, फॉरन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर यानी एफ़पीआई. हालाँकि बाज़ार की भाषा और मीडिया में आज भी एफ़आईआई ही इस्तेमाल होता है.
ये शेयर और बॉन्ड में भारी ख़रीद-बिक्री करते हैं. इनके रोज़ाना के ख़रीद-बिक्री का शेयर मार्केट पर गहरा असर होता है. अगर एफ़आईआई शेयर बेचता है तो मार्केट में गिरावट आती हैं और शेयर ख़रीदता है तो एक संदेश जाता है कि मार्केट में निवेश फ़ायदे का सौदा है.
एफ़आईआई और एफ़डीआई में क्या फ़र्क़ है? एफ़आईआई पोर्टफोलियो निवेश है, जिसे आसानी से निकाला जा सकता है. इसलिए इसे 'हॉट मनी' भी कहते हैं. वहीं फॉरन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (एफ़डीआई) किसी कारोबार या फिजिकल एसेट में लंबी अवधि का निवेश होता है.
विदेशी निवेशक क्यों भाग रहे हैं?

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अमेरिकी मुद्रा डॉलर के मुक़ाबले भारत का रुपया गिरकर 97 के क़रीब पहुँच गया है. युद्ध शुरू होने के समय यह लगभग 91 के आसपास था.
कोटक इंस्टिट्यूशनल इक्विटिज के मुख्य अर्थशास्त्री सुवोदीप रक्षित ने ब्रिटिश अख़बार फ़ाइनैंशियल टाइम्स से कहा, "जैसे ही जंग शुरू हुई, पहली प्रतिक्रिया यही थी कि भारत दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा आयातकों में से एक है. ऐसी स्थिति में निवेशकों के लिए यह स्वाभाविक सोच बन जाती है कि यह वह देश नहीं है, जहाँ वे निवेश बनाए रखना चाहेंगे."
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा आयातक है. भारत अपनी तेल और गैस ज़रूरतों का लगभग 90 प्रतिशत दूसरे देशों से ख़रीदता है.
31 मार्च को ख़त्म हुए वित्त वर्ष में भारत ने ऊर्जा आयात पर 174 अरब डॉलर खर्च किए थे. आयातित कच्चे तेल का लगभग आधा और प्राकृतिक गैस का दो-तिहाई हिस्सा खाड़ी के देशों से आता है, जिनकी ऊर्जा आपूर्ति युद्ध के कारण लगभग ठप हो गई है.

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तेल महंगा होने से भारत का रुपया भारी दबाव में है. कमज़ोर होते रुपए के कारण भी एफ़आईआई भारतीय शेयर बाज़ार से दूसरे देशों में जा रहा है.
भारत की आर्थिक गतिविधियों पर गहरी नज़र रखने वाले और आर्थिक विश्लेषक विवेक कौल कहते हैं, ''एफ़आईआई पर ईरान युद्ध का असर पड़ा है लेकिन ईरान में युद्ध शुरू होने से पहले भी भारत के शेयर बाज़ार से विदेशी निवेशक पैसा निकाल रहे थे. 2025 में भी क़रीब 19 अरब डॉलर भारत के शेयर बाज़ार से एफ़आईआई बाहर गया था. यानी युद्ध से पहले भी निकाल रहे थे लेकिन अब कुछ ज़्यादा ही निकाल रहे हैं.''
विवेक कौल कहते हैं, ''कोई भी शेयर मार्केट से पैसा तभी निकालता है, जब लगता है कि आगे का समय ख़राब हो सकता है. पैसे निकालने की दूसरी वजह ये होती है कि अब मार्केट इससे आगे नहीं जाएगा. विदेशी निवेशकों को लग रहा है कि ये बाज़ार जितना दे सकता था, उतना दे दिया.''
''2020 मार्च से लेकर सितंबर 2024 तक भारतीय शेयर बाज़ार काफ़ी तेज़ भागा. तब भारत दुनिया की सबसे अच्छे शेयर बाज़ारों में से एक था. इस दौरान विदेशी निवेशकों ने ख़ूब पैसा बनाया. अब उन्हें लग रहा है कि इस मार्केट में बहुत कमाई नहीं है. इसलिए इन्होंने पिछले साल से ही अपना निवेश निकालना शुरू कर दिया था.
बढ़ता अविश्वास

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जाने-माने अर्थशास्त्री और मनमोहन सिंह की सरकार में मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे कौशिक बासु को लगता है कि भारत सरकार की ग़लत नीतियों के कारण अर्थव्यवस्था की ऐसी हालत हो रही है.
बासु ने लिखा एक्स पर लिखा है, ''अब राजनीति से आगे बढ़कर वास्तविक नीतियों पर ध्यान देने का समय है. पिछले एक साल में भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 11.2% कमज़ोर हुआ है. यह केवल जंग की वजह से नहीं हुआ है. पिछले 22 महीनों में भारत में नेट एफ़डीआई लगभग ज़ीरो के आसपास रहा है.''
''अगर इसे अनियंत्रित छोड़ा गया, तो इससे महंगाई बढ़ेगी. भारत की अर्थव्यवस्था और उसकी वैश्विक साख को सबसे ज़्यादा नुक़सान सरकार की आलोचना स्वीकार न कर पाने की प्रवृत्ति से हो रहा है. अगर किसी में आलोचना सुनने का आत्मविश्वास नहीं हो और कमज़ोरियो को नारों से ढकने की कोशिश की जाए, तो ठोस क़दम नहीं उठाए जाते. इसका अर्थव्यवस्था पर गहरा नकारात्मक असर पड़ता है.''
ब्रोकरेज फर्म जेएम फ़ाइनैंशियर की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय शेयरों में विदेशी निवेशकों की कुल हिस्सेदारी अब घटकर 14 वर्षों के निचले स्तर 14.7 प्रतिशत पर पहुंच गई है.
नौ मई को प्रकाशित को प्रकाशित गोल्डैमन सैक्स की रिपोर्ट 'आउटफ्लो फेड, बट री-एंट्री वेट्स' के अनुसार, विदेशी निवेशकों के बाहर निकलने का सबसे ख़राब दौर शायद गुज़र चुका है. आगे एफ़आईआई की बची बिकवाली से होने वाला संभावित नुक़सान लगभग चार से पाँच अरब डॉलर तक ही सीमित रह सकता है.''
हालांकि रिपोर्ट यह भी चेतावनी देती है कि इसका मतलब यह नहीं है कि विदेशी निवेशक जल्द ही तेजी से भारतीय बाज़ार में वापस लौट आएंगे.
अप्रैल की शुरुआत में जब अमेरिका-ईरान युद्धविराम समझौते के बाद तेल क़ीमतों में गिरावट आई, तब भी विदेशी निवेशकों ने भारत में दोबारा निवेश नहीं किया. इसलिए यह उम्मीद करना शायद ग़लत होगा कि पश्चिम एशिया में तनाव कम होने से विदेशी निवेश फिर से लौट आएगा.
विवेक कॉल कहते हैं, ''कोई स्टॉक ऊपर कब जाता है? जब निवेशकों को लगता है कि किसी ख़ास स्टॉक की कंपनी भविष्य में ज़्यादा पैसे कमाएगी. कोई भी निवेशक किसी कंपनी की भविष्य की कमाई की उम्मीद पर पैसा लगाता है. जब निवेशकों को लगता है कि आगे कमाई नहीं बढ़ेगी तो वे शेयर बेचना शुरू कर देती हैं. हर दौर में शेयर मार्केट की अलग कहानी होती है.''
'एआई में पिछड़ा भारत'

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विवेक कॉल आगे कहते हैं, ''अभी एआई की कहानी चल रही है. निवेशक अब वहाँ पैसे लगा रहे हैं, जो कंपनियां एआई में बढ़िया कर रही हैं या एआई की बढ़त से जिन कंपनियों को फ़ायदा होगा या हो रहा है. लेकिन भारत में इस किस्म के स्टॉक हैं नहीं. जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान और चीन में इस तरह के स्टॉक हैं, इसलिए निवेशक यहाँ पैसे लगा रहे हैं.''
लेकिन बात केवल एफ़आईआई का ही बाहर जाना नहीं है. जेनएयू में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर रहे अरुण कुमार कहते हैं, ''शेयर बाज़ार में बिकवाली केवल विदेशी निवेशकों तक सीमित नहीं है. मार्च 2025 से भारतीय शेयरों में खुदरा निवेशकों की हिस्सेदारी भी 9.2 प्रतिशत घट चुकी है.''
प्रोफ़ेसर अरुण कुमार कहते हैं, ''कमज़ोर होते रुपए के कारण भी भारतीय शेयर बाज़ार से एफ़आईआई बाहर जा रहा है. ट्रंप ने भारत पर जब टैरिफ़ लगाया तो कई स्तरों पर भारतीय अर्थव्यवस्था की कमज़ोरी खुलकर सामने आई. जब आपका निर्यात से ज़्यादा आयात होता है तो भुगतान संतुलन बिगड़ता है. ऐसे में डॉलर की कमी होगी और रुपया कमज़ोर होगा.''

प्रोफ़ेसर अरुण कुमार बताते हैं, ''रुपया कमज़ोर होगा तो निवेशकों को डॉलर के टर्म में रिटर्न कम मिलेगा. अगर कोई निवेशक यह सोचकर निवेश कर रहा है कि उसे भारतीय शेयर बाज़ार से 10 प्रतिशत का रिटर्न मिलेगा और लेकिन एक सेंस ये बन गया है कि रुपया हर साल पाँच प्रतिशत गिरेगा तो रिटर्न सिर्फ़ पाँच प्रतिशत रह गया. ऐसे में भारतीय शेयर बाज़ार से एफ़आईआई का बाहर निकलना चौंकाता नहीं है.''
इसी महीने ग्लोबल इन्वेस्टर और आर्थिक मामलों के एक्सपर्ट रुचिर शर्मा भारत के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस से कहा था, ''अब भारत से पूंजी इसलिए निकल रही है क्योंकि आज दुनिया का लगभग पूरा ध्यान एआई पर है. निवेशक एआई की वैश्विक दौड़ को लेकर दीवाने हो चुके हैं और इस दौड़ में भारत को एक कमज़ोर खिलाड़ी के रूप में देखा जा रहा है. अभी दुनिया एआई के "पिक्स एंड शॉवेल्स" चरण में है. यानी सेमीकंडक्टर, मेमरी और कंप्यूटिंग क्षमता पर फोकस है. इन क्षेत्रों में भारत संरचनात्मक रूप से कमज़ोर है.''
ताइवान बना आकर्षक

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रूचिर शर्मा ने कहा था, ''पिछले कुछ वर्षों में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाज़ार से 50 अरब डॉलर निकाल लिए हैं. नेट एफ़डीआई भी लगभग शून्य है. निवेश के अपने 30 वर्षों के अनुभव में मैंने भारत के प्रति इतनी उदासीनता कभी नहीं देखी. 2013 के "फ्रैजाइल फाइव" दौर में भारत को लेकर नकारात्मकता थी लेकिन आज स्थिति उससे भी ख़राब है. निवेशकों का पूरा ध्यान एआई पर है और भारत की कमज़ोरियां अब साफ़ दिखाई दे रही हैं.''
''भारत रिसर्च पर जीडीपी का केवल 0.6 प्रतिशत खर्च करता है जबकि दक्षिण कोरिया और ताइवान चार से पाँच प्रतिशत तक ख़र्च करते हैं. इस मामले में इसराइल दुनिया में सबसे आगे है. हमारा आईटी सेक्टर लंबे समय तक सस्ते श्रम और आउटसोर्सिंग आधारित मॉडल पर निर्भर रहा, इनोवेशन और नई तकनीक विकसित करने पर नहीं. अब यही कमज़ोरी हमारे सामने बड़ी चुनौती बनकर लौट रही है.''
गोल्डमैन सैक्स ग्रुप के आकलन के अनुसार, जैसे-जैसे फंड मैनेजरों ने भारतीय बाज़ार में अपनी हिस्सेदारी घटाई, विदेशी निवेशकों ने भी तेज़ी से भारत से दूरी बनानी शुरू कर दी. इसके परिणामस्वरूप भारतीय बाज़ार में उनकी हिस्सेदारी घटकर 14 वर्षों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है. दो दशकों से अधिक समय में पहली बार विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी घरेलू संस्थागत निवेशकों से भी कम हो गई है.
ब्लूमबर्ग ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है, ''भारतीय शेयर बाज़ार में आया यह बदलाव नाटकीय रहा है. कोविड महामारी के निचले स्तरों से उभरते हुए सितंबर 2024 में भारतीय शेयर बाज़ार का कुल मूल्य रिकॉर्ड 5.73 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया था. उस समय एनएसई निफ्टी 50 इंडेक्स दुनिया का श्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाला प्रमुख मार्केट माना जा रहा था. लेकिन ऊंचे वैल्यूएशन को लेकर बढ़ती चिंताओं के कारण विदेशी निवेश अस्थिर होने लगे और यह कहानी धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ने लगी.''
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