पीएम मोदी के प्रेस कॉन्फ़्रेंस न करने को लेकर अब न्यूज़ीलैंड में पूछा गया सवाल

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आधिकारिक न्यूज़ीलैंड यात्रा के दौरान भारतीय विदेश मंत्रालय के बयान को लेकर काफ़ी चर्चा है और सोशल मीडिया पर इस बयान को साझा किया जा रहा है.
दरअसल रविवार को विदेश मंत्रालय की एक प्रेस ब्रीफ़िंग में पूछा गया कि प्रधानमंत्री मोदी ने न्यूज़ीलैंड के पत्रकारों के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं की.
इस सवाल पर विदेश मंत्रालय के सचिव (पूर्व) रुद्रेंद्र टंडन की पहली प्रतिक्रिया थी- 'देजा वू' यानी ऐसा लगता है कि ये पहले भी हो चुका है. उन्होंने पीएम मोदी के बातचीत के तरीक़े के बारे में बताया और उन्हें जनता से जुड़ा नेता कहा.
दरअसल, न्यूज़ीलैंड यात्रा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तीन देशों की यात्रा का अंतिम पड़ाव था.
इस दौरे का मुख्य फ़ोकस भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच द्विपक्षीय संबंधों को मज़बूत करना और दोनों देशों के बीच सहयोग का विस्तार करना रहा.
बीते मई महीने में पीएम मोदी नॉर्वे की स्टेट विज़िट पर थे और एक प्रेस मीट के दौरान एक वाक़या हुआ जिसकी उस समय नॉर्वे से लेकर भारत तक में चर्चा हुई.
नॉर्वे के प्रधानमंत्री योनास गार स्टोरे से मीटिंग के बाद जब पीएम मोदी जा रहे थे तब नॉर्वे की पत्रकार हेला लेंग ने उनसे सवाल पूछना चाहा था लेकिन पीएम मोदी आगे बढ़ गए थे.
उसके बाद ओस्लो में भारतीय विदेश मंत्रालय की प्रेस कॉन्फ़्रेंस में भी उनकी और मंत्रालय के सचिव सीबी जॉर्ज और प्रवक्ता रणधीर जायसवाल की तीखी नोंकझोंक देखी गई.
विदेश मंत्रालय के सचिव रुद्रेंद टंडन के बयान को हेली लेंग ने अपने एक्स हैंडल पर शेयर किया है.
हेली लेंग ने लिखा, "यह दिलचस्प जवाब था. क्या इसका मतलब यह है कि प्रधानमंत्री आमतौर पर टाउन हॉल जैसे कार्यक्रमों में लोगों से मिलते हैं और उनकी रोज़मर्रा की समस्याओं से जुड़े सवालों के जवाब देते हैं?"
"मैंने उन्हें ज़मीनी स्तर के आंदोलन 'कॉकरोच जनता पार्टी' के साथ सीधे संवाद करते नहीं देखा है. अगर मैं ग़लत हूं, तो कृपया मुझे सुधारिए."
विदेश मंत्रालय की ब्रीफ़िंग में राजनयिक ने क्या कहा?

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की न्यूज़ीलैंड की आधिकारिक यात्रा पर विदेश मंत्रालय की विशेष ब्रीफ़िंग के दौरान एक महिला पत्रकार ने सवाल किया कि पीएम मोदी ने न्यूज़ीलैंड के पत्रकारों के साथ प्रेस कॉन्फ़्रेंस क्यों नहीं की.
इस सवाल पर भारतीय विदेश मंत्रालय के सचिव (पूर्व) रुद्रेंद्र टंडन ने प्रतिक्रिया दी. टंडन मुस्कुराए और कहा कि इस सवाल ने उन्हें एक तरह का 'डेजा वू' महसूस कराया.
फिर उन्होंने कहा, "एक सिविल सेवक के तौर पर प्रधानमंत्री मोदी की राजनीतिक कार्यशैली पर सवाल उठाना मेरे लिए उचित नहीं है. वह बेहद सफल राजनेता हैं. लेकिन मैं आपको इसका थोड़ा संदर्भ देना चाहता हूं."
"प्रधानमंत्री मोदी एक विशुद्ध भारतीय राजनेता हैं. आम तौर पर भारतीय राजनेता अपने मतदाताओं से सीधे संपर्क को प्राथमिकता देते हैं."
रुद्रेंद्र टंडन ने कहा, "आपको यह भी याद रखना चाहिए कि भारत का अधिकांश मतदाता वर्ग ग्रामीण क्षेत्रों में रहता है. वे सीधे संवाद पसंद करते हैं. उन्हें ऊपर से समझाया जाना पसंद नहीं है. उन्हें बिचौलियों के ज़रिए बात पहुंचाना भी पसंद नहीं है."
"प्रधानमंत्री मोदी ने अपने मतदाताओं से सीधे संवाद करने की कला में महारत हासिल की है और ऐसा लगता है कि यह तरीक़ा उनके लिए काफ़ी प्रभावी भी रहा है."
रुद्रेंद्र टंडन ने कहा, "अब वह लगातार तीसरी बार चुने गए हैं और हमारे देश के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले प्रधानमंत्रियों में से एक हैं."
उनका यह जवाब अब वायरल हो रहा है.
अंतरराष्ट्रीय मामलों पर नज़र रखने वाले पत्रकार शशांक मट्टू ने इस ब्रीफ़िंग का एक वीडियो क्लिप साझा करते हुए लिखा, "विदेश मंत्रालय के एक भारतीय राजनयिक ने विदेशी पत्रकारों के साथ प्रधानमंत्री मोदी की प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करने की वजह बताई."
विपक्ष ने क्या कहा और सोशल मीडिया पर क्या है चर्चा

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कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने एक्स पर इस वीडियो क्लिप को साझा करते हुए लिखा, "तर्क सबसे पहले कमरे से बाहर चला गया. उसके बाद जवाबदेही भी चली गई. फिर लोकतंत्र भी पीछे-पीछे निकल गया."
"प्रेस कॉन्फ्रेंस का मकसद सवाल पूछना, जवाब मांगना और सरकारों को जवाबदेह ठहराना होता है. एकतरफा संवाद कभी भी सार्वजनिक जवाबदेही का विकल्प नहीं हो सकता."
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पवन खेड़ा ने रुद्रेंद्र टंडन के बयान को साझा करते हुए लिखा, "टंडन जी की टिप्पणी मीडिया, जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, को सरकार की सुविधा का विषय बनाकर पेश करती है. जबकि हकीकत यह है कि जनता तक सीधे पहुंच बनाना, मीडिया की जवाबदेही तय करने वाली भूमिका का विकल्प नहीं हो सकता."
"यह तर्क कमज़ोर है और स्पष्ट रूप से लोकतांत्रिक मूल्यों के ख़िलाफ़ है."
प्रधानमंत्री की प्रेस कॉन्फ़्रेंस को लेकर विपक्ष सवाल उठाता रहा है और प्रेस फ़्रीडम इंडेक्स में भारत की लगातार गिरती स्थिति पर चिंता ज़ाहिर करता रहा है.
वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश कामत ने एक्स पर लिखा, "भारत में हमें प्रेस की स्वतंत्रता को मज़बूत करने की ज़रूरत है. इसके लिए भारत के अच्छे पत्रकारों की बड़ी भूमिका है. हमारे यहां लोगों में मीडिया साक्षरता का स्तर अभी भी कम है."
"इसे बढ़ाने और लोगों को जागरूक करने के लिए अच्छे पत्रकारों को आगे आना होगा. उन्हें यह भरोसा भी दिलाना होगा कि वे और निष्पक्ष खबरों व स्वतंत्र विचारों की उम्मीद रखने वाले लोग, दोनों एक ही उद्देश्य के लिए काम कर रहे हैं."
पूर्व सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने एक्स पर लिखा, "अब विदेशों के लगभग सभी पत्रकारों को यह समझ आ गया है कि भारत में सुर्खियां बटोरने का सबसे आसान तरीक़ा प्रधानमंत्री मोदी से यह सवाल पूछना है कि वह प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं करते. नॉर्वे की पत्रकार इस सवाल के बाद करीब एक लाख नए फ़ॉलोअर्स भी हासिल करने में सफल रहीं. सच्चाई यह है कि हम जवाबदेही वाली पत्रकारिता के नहीं, बल्कि कंटेंट आधारित पत्रकारिता के दौर में जी रहे हैं."
देब नाम के एक एक्स यूज़र ने लिखा, "हेली लेंग ने एक ऐसा सिलसिला शुरू किया, जिसे अब लगभग हर अंतरराष्ट्रीय पत्रकार अपना रहा है. ऑस्ट्रेलिया के बाद अब न्यूज़ीलैंड के एक पत्रकार ने भी पूछा, 'प्रधानमंत्री मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं करते?' इस पर विदेश मंत्रालय की ओर से जवाब दिया गया, 'क्योंकि भारत का अधिकांश मतदाता वर्ग ग्रामीण क्षेत्रों में रहता है'."
प्रेस फ़्रीडम इंडेक्स

नॉर्वे में शुरू हुआ विवाद दोनों देशों के बीच प्रेस स्वतंत्रता की रैंकिंग की तुलना तक पहुंच गया.
नॉर्वे में प्रधानमंत्री मोदी से सवाल पूछने का वीडियो साझा करते हुए हेली लेंग ने एक्स पर लिखा, "भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया. मुझे इसकी उम्मीद भी नहीं थी. वर्ल्ड प्रेस फ़्रीडम इंडेक्स में नॉर्वे पहले स्थान पर है और भारत 157वें स्थान पर है."
पेरिस स्थित रिपोर्टर्स सां फ़्रोंतिए (आरएसएफ़) एक नॉन-प्रॉफ़िट संगठन है जो दुनियाभर के पत्रकारों और पत्रकारिता पर होने वाले हमलों को डॉक्यूमेंट करने का काम करता है.
उसके अनुसार, नॉर्वे बीते दस सालों से प्रेस फ़्रीडम इंडेक्स में नंबर 1 है जबकि साल 2026 के इंडेक्स के हिसाब से न्यूज़ीलैंड 77.38 के स्कोर के साथ नंबर 22 पर है.
वहीं भारत 31.96 के स्कोर के साथ 180 देशों के प्रेस फ़्रीडम इंडेक्स में 157 नंबर पर आता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.




















