सिंहस्थ के लिए उज्जैन की जिस मस्जिद का हिस्सा गिराने को लेकर हुआ बवाल उसका क्या है इतिहास?

शाही मस्जिद
इमेज कैप्शन, शाही मस्जिद के एक हिस्से को हटाने की कार्रवाई को लेकर हुई झड़प के बाद बैरिकेड्स लगा दिए गए और सुरक्षा मजबूत कर दी गई थी
    • Author, विष्णुकांत तिवारी और समीर ख़ान
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

मध्य प्रदेश के उज्जैन में सिंहस्थ कुंभ 2028 की तैयारियों के लिए सड़क चौड़ीकरण की कार्रवाई चल रही थी. इसी दौरान शाही मस्जिद के एक हिस्से को हटाने की मुहिम 28 सितंबर को तनाव और हिंसक झड़प में तब्दील हो गई.

छतरी चौक स्थित मस्जिद के आसपास बड़ी संख्या में लोग जमा हुए. पुलिस के साथ भीड़ की झड़प हुई और स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े. इसके बाद इलाके में बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया.

हालांकि, विवाद पूरी मस्जिद को हटाने का नहीं था. सड़क चौड़ीकरण के प्रस्तावित 15 मीटर के अलाइनमेंट में आने वाले उसके एक हिस्से को हटाया जाना था.

रविवार देर रात प्रशासन और मस्जिद कमेटी के बीच बातचीत के बाद प्रभावित हिस्सा खुद हटाने पर सहमति बनी थी. हालांकि सोमवार सुबह बड़ी संख्या में लोग मस्जिद के आसपास जमा हो गए और पुलिस के साथ उनकी झड़प हुई.

जिस शाही मस्जिद का एक हिस्सा सड़क चौड़ीकरण की जद में आया और जिसे लेकर अब तक उज्जैन में भारी पुलिस बल तैनात किया गया है, उसका इतिहास क्या है?

यह मस्जिद कब बनी, इसे किसने बनवाया और इसके बारे में पुराने दस्तावेज़ क्या बताते हैं?

क्या शाही मस्जिद 1390 में बनी थी?

ज़फ़र अंसारी
इमेज कैप्शन, इंदौर के इतिहासकार और संरक्षण विशेषज्ञ ज़फ़र अंसारी शाही मस्जिद को मुग़ल काल से पहले का बताते हैं

मस्जिद के इतिहास से जुड़े वक्फ़ बोर्ड के एक दस्तावेज़ में इसके निर्माण का साल 1390 दर्ज है. बीबीसी ने ये दस्तावेज़ देखा है.

इस दस्तावेज़ में मस्जिद को शाही मस्जिद के नाम से दर्ज किया गया है और कहा गया है कि इसका निर्माण "मुस्लिम समुदाय के लोगों के सहयोग और चंदे" से हुआ था.

इस रिकॉर्ड में दर्ज साल के हिसाब से मस्जिद का इतिहास क़रीब 636 साल पुराना है.

मस्जिद कमेटी की ओर से कोर्ट में कार्रवाई पर रोक लगाने के लिए दायर याचिका में 1925 का एक दस्तावेज़ इतिहास के रिकॉर्ड के रूप में जमा किया गया था जिसमें तत्कालीन समय में भी मस्जिद की मौजूदगी दर्ज है.

इंदौर के इतिहासकार और संरक्षण विशेषज्ञ ज़फ़र अंसारी शाही मस्जिद को मुग़ल काल से पहले के मालवा इलाके के सल्तनत काल से जोड़ते हैं.

उनके मुताबिक़, "उज्जैन और मध्य भारत के पुराने ऐतिहासिक रिकॉर्ड और यहां बनी अन्य इमारतों की बनावट शैली को देखें और फिर मस्जिद की बनावट को देखें तो यह साफ है कि यह मुग़ल काल से पहले के दौर की संरचना है. अलग-अलग जगहों और दस्तावेजों में इसका ज़िक्र भी है.''

अंसारी के मुताबिक़, मस्जिद की वास्तुकला, उसकी मीनारें और निर्माण शैली उस समय के मालवा क्षेत्र में मौजूद सल्तनतकालीन इमारतों से मिलती हैं.

उनका कहना है कि ऐसी बनावट मध्य प्रदेश के मांडू और चंदेरी इलाकों में भी मौजूद है.

1925 में भी सड़क के लिए मस्जिद का एक हिस्सा देने की बात

इस पत्र में चौक और सड़क को ठीक करने के लिए मस्जिद से जुड़ी कुछ जमीन लिए जाने की बात भी कही गई है
इमेज कैप्शन, इस पत्र में चौक और सड़क को ठीक करने के लिए मस्जिद से जुड़ी कुछ जमीन लिए जाने की बात भी कही गई है

शाही मस्जिद से जुड़े 1925 के एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ के मुताबिक़ तत्कालीन ग्वालियर स्टेट के टाउन इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट के चेयरमैन की ओर से जारी पत्र में मस्जिद को "मोचियान की मस्जिद" कहा गया है.

इसी पत्र में चौक और सड़क को ठीक करने के लिए मस्जिद से जुड़ी कुछ जमीन लिए जाने की बात भी कही गई है.

इसमें लिखा है कि "ख़ास मस्जिद को छोड़कर" उससे संबंधित कुछ आराजी ली जाएगी.

आराजी का मतलब ज़मीन, भूमि का टुकड़ा, खेत या भूखंड होता है.

इस पत्र में मस्जिद की उस समय की स्थिति का भी उल्लेख है. इसमें कहा गया है कि मस्जिद में मीनारें नहीं थीं.

साथ ही दरवाजे और अहाते की दीवार को बेहतर बनाने और मीनारें तैयार करने की बात कही गई है.

1946 के नक़्शे में भी मौजूद थी मस्जिद

मस्जिद प्रबंधन की ओर से अदालत में दिए गए दस्तावेज़ों में 4 मई 1946 का एक नक़्शा भी शामिल है.

इस नक़्शे पर डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज, उज्जैन, ग्वालियर स्टेट की मुहर और हस्ताक्षर बताए गए हैं.

मस्जिद पक्ष के मुताबिक़, इस नक़्शे में शाही मस्जिद की स्थिति दिखाई गई है.

मस्जिद से जुड़े दस्तावेज़ों में इसके दक्षिणी हिस्से में मौजूद दो मज़ारों, मुख्य नमाज़ की जगह और दूसरे हिस्सों का भी उल्लेख है.

वक्फ़ रिकॉर्ड में दर्ज है मस्जिद

मस्जिद का एक हिस्सा हटा दिया गया है
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शाही मस्जिद को "वक्फ़ मस्जिद पंच मोचियान (शाही मस्जिद)" के नाम से वक्फ़ रिकॉर्ड में दर्ज किया गया है.

मस्जिद से जुड़े दस्तावेज़ों के मुताबिक़, इसे वक्फ़ एक्ट 1954 के तहत दर्ज किया गया था और 13 सितंबर 1985 को मध्य प्रदेश गजट में इसे वक्फ़ संपत्ति के तौर पर घोषित किया गया.

इन रिकॉर्डों में तत्कालीन उज्जैन कलेक्टर की जांच और प्रमाणपत्र का भी हवाला दिया गया है.

बाद में इसे वक्फ़ एक्ट 1995 के तहत भी दर्ज किया गया.

वक्फ़ से जुड़े दस्तावेज़ों में मस्जिद की संपत्ति के प्रबंधन का अधिकार वक्फ़ बोर्ड और प्रबंधन कमेटी से जुड़ा बताया गया है.

दस्तावेज़ में कहा गया है कि वक्फ़ संपत्ति को ट्रांसफ़र करने का अधिकार प्रबंधक के पास नहीं है और ऐसी संपत्ति से जुड़ी कारवाई में वक्फ़ बोर्ड को शामिल या सूचित किया जाना चाहिए.

मस्जिद से जुड़े एक संपत्ति रिकॉर्ड में कुल क्षेत्रफल करीब 4,600 वर्ग फुट दर्ज है.

इसमें 19 दुकानों और दो मकानों का भी उल्लेख मिलता है.

मौजूदा सड़क के चौड़ीकरण में इसी परिसर का एक हिस्सा प्रस्तावित सड़क की जद में आ रहा है.

मस्जिद पक्ष ने प्रशासन को दिए अपने आपत्ति पत्र में वैकल्पिक रास्ते का सुझाव भी दिया था.

आपत्ति में कहा गया था कि मस्जिद के दक्षिण दिशा में मौजूद एक कमर्शियल बिल्डिंग की तरफ सड़क को बढ़ाया जा सकता है.

और पूरब के तरफ़ मौजूद फुटपाथ को सड़क में शामिल करने का भी सुझाव दिया गया था.

मस्जिद के एक हिस्से को हटाने की कार्रवाई 28 सितंबर को तनाव और हिंसक झड़प में तब्दील हो गई थी
इमेज कैप्शन, मस्जिद के एक हिस्से को हटाने की कार्रवाई 28 सितंबर को तनाव और हिंसक झड़प में तब्दील हो गई थी

मस्जिद पक्ष ने संविधान के अनुच्छेद 14, 25, 26 और 300ए का हवाला देते हुए कार्रवाई पर सवाल उठाया था.

हालांकि मस्जिद पक्ष की पहली याचिका को 9 सितंबर को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने ख़ारिज करते हुए कहा था मास्टर प्लान का पालन करना जरूरी है.

अदालत ने कहा कि प्रशासन ने तय प्रक्रिया का पालन किया और संबंधित पक्षों को आपत्ति दर्ज कराने का मौका दिया गया.

अदालत के रिकॉर्ड के मुताबिक, नगर निगम ने सड़क को 15 मीटर चौड़ा करने के लिए मस्जिद की संपत्ति के एक छोटे हिस्से को हटाना जरूरी बताया था.

प्रशासन ने सड़क के महत्व का हवाला देते हुए कहा था कि यह रास्ता गोपाल मंदिर से महाकाल मंदिर और आगे क्षिप्रा नदी (शिप्रा नदी) तक जाता है और शाही सवारी, पेशवाई और सिंहस्थ के दौरान यहां बड़ी संख्या में लोगों की आवाजाही होती है.

इसके बाद मस्जिद पक्ष ने हाईकोर्ट की दो जजों की बेंच में अपील की थी, लेकिन फ़ैसला आने के कुछ घंटों पहले ही मस्जिद पक्ष और प्रशासन के बीच 3 फीट तक का हिस्सा गिराने पर सहमति हो गई थी.

सिंहस्थ 2028 से क्या है संबंध?

मोहन यादव
इमेज कैप्शन, उज्जैन में सड़क चौड़ीकरण अभियान के तहत मुख्यमंत्री मोहन यादव का पैतृक मकान भी प्रभावित हुआ है

इस पूरे घटनाक्रम का सीधा संबंध है 2028 में होने वाले सिंहस्थ कुंभ मेले की तैयारियों से है.

उज्जैन में सिंहस्थ 2028 की तैयारियों के तहत कई इलाकों में सड़क चौड़ीकरण और दूसरे निर्माण कार्य चल रहे हैं.

इसी सड़क चौड़ीकरण अभियान के तहत मुख्यमंत्री मोहन यादव का पैतृक मकान भी प्रभावित हुआ है.

27 सितंबर को मुख्यमंत्री ने उज्जैन के अब्दालपुरा इलाके में अपने पैतृक मकान के उस हिस्से को खुद गेती चलाकर हटाने की शुरुआत की, जो प्रस्तावित सड़क की जद में आ रहा है.

मकान का करीब 2.90 मीटर हिस्सा सड़क चौड़ीकरण में हटाया जाना है. उनकी बहन कलावती यादव का मकान भी इस परियोजना से प्रभावित है.

शाही मस्जिद का मामला भी इसी व्यापक सड़क चौड़ीकरण अभियान का हिस्सा है.

उज्जैन के कलेक्टर रोशन सिंह ने कहा, "सिंहस्थ 2028 की तैयारियों के लिए मास्टर प्लान के मुताबिक़ सड़कों के चौड़ीकरण और दूसरे निर्माण कार्य चल रहे हैं. सभी धर्म और समुदाय के लोग अपनी इच्छा से इसमें सहयोग कर रहे हैं. कई लोग सड़क की जद में आ रहे अपने मकान या धार्मिक स्थल खुद हटा रहे हैं. छतरी चौक में सड़क की जद में आ रहा शाही मस्जिद का हिस्सा भी मुस्लिम समाज के लोग स्वयं हटा रहे हैं.''

उन्होंने कहा, ''मैं सभी से अपील करता हूं कि किसी भी अफवाह में न आएं और शांति व्यवस्था बनाए रखने में शासन का सहयोग करें."

प्रोफ़ेसर शंकरलाल वरे
इमेज कैप्शन, उज्जैन के इतिहास पर काम करने वाले प्रोफ़ेसर शंकरलाल वरे कहते हैं उज्जैन में अलग-अलग धर्मों और समुदायों के लोग एक-दूसरे के धार्मिक आयोजनों और परंपराओं में शामिल होते रहे हैं

शाही मस्जिद गोपाल मंदिर और महाकाल क्षेत्र के आसपास पुराने उज्जैन शहर के उस हिस्से में है जहां धार्मिक स्थल, बाजार और रिहायशी इलाका एक-दूसरे के बेहद क़रीब हैं.

उज्जैन के इतिहास पर काम करने वाले प्रोफ़ेसर शंकरलाल वरे कहते हैं कि शहर में अलग-अलग धर्मों और समुदायों के लोग लंबे समय से साथ रहते आए हैं.

उनके मुताबिक़ यहां एक-दूसरे के धार्मिक आयोजनों और परंपराओं में भागीदारी की मिसालें भी रही हैं.

इतिहासकार ज़फ़र अंसारी भी उज्जैन के इस साझा सामाजिक जीवन का उल्लेख करते हैं.

उनके मुताबिक़ महाकाल मंदिर और शाही मस्जिद के आसपास का इलाका शहर के लंबे समय से चले आ रहे सामाजिक और सांस्कृतिक मेलजोल का हिस्सा रहा है.

करीब 70 साल से शाही मस्जिद में नमाज़ पढ़ रहे इमरान का कहना है कि सड़क चौड़ी होना जरूरी है और अगर सड़क की जद में मस्जिद का कुछ हिस्सा आ रहा है तो इसे लेकर स्थानीय लोगों को आपत्ति नहीं होनी चाहिए.

उनके मुताबिक़, सड़क चौड़ीकरण की कारवाई सिर्फ मस्जिद तक सीमित नहीं है और दूसरी धार्मिक संरचनाओं के हिस्से भी हटाए जा रहे हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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