सतलुज फ़िल्म विवाद ने ओटीटी पर 'अघोषित सेंसरशिप' समेत और कौन से सवाल खड़े किए हैं?

दिलजीत दोसांझ

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इमेज कैप्शन, दिलजीत दोसांझ अभिनीत 'सतलुज' फ़िल्म को रिलीज़ के 48 घंटे बाद ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म से हटा लिया गया था
    • Author, यासिर उस्मान
    • पदनाम, वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार, बीबीसी हिन्दी के लिए
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 10 मिनट

दिलजीत दोसांझ की फ़िल्म 'सतलुज' को लेकर चल रही बहस और राजनीतिक खींचतान रुकने का नाम नहीं ले रही है.

शोर-शराबे के बावजूद सबसे हैरान करने वाला तथ्य अब भी यही है कि 'सतलुज' को रिलीज़ के महज़ दो दिन बाद ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म से अचानक हटाने को लेकर आज तक भारत सरकार की तरफ़ से कोई स्पष्ट आधिकारिक आदेश या सार्वजनिक बयान सामने नहीं आया है.

लेकिन नौ जुलाई को फ़ोर्ब्स इंडिया को दिए इंटरव्यू में निर्देशक हनी त्रेहन ने पहली बार सार्वजनिक रूप से बताया था कि फ़िल्म हटाने की वजह के बारे में ज़ी5 ने उन्हें सीधे क्या जानकारी दी थी.

पांच जुलाई की रात क़रीब आठ बजे निर्देशक हनी त्रेहन को एक फ़ोन आया. उनका कहना था कि उन्हें तभी अंदाज़ा हो गया था कि कुछ गड़बड़ है. उनकी फ़िल्म 'सतलुज' को ज़ी5 पर रिलीज़ हुए अभी सिर्फ़ 48 घंटे से कुछ ज़्यादा ही हुए थे.

त्रेहन बताते हैं कि उन्हें कहा गया कि रात नौ बजे फ़िल्म को प्लेटफ़ॉर्म से हटा दिया जाएगा.

उनके मुताबिक़, "ज़ी5 ने मुझसे कहा कि सरकार के दबाव की वजह से उन्हें फ़िल्म हटानी पड़ रही है."

हालांकि, ज़ी5 ने अपने आधिकारिक बयान में सिर्फ़ इतना कहा था कि 'मौजूदा परिस्थितियों' के कारण फ़िल्म को हटाया जा रहा है.

अब तक सरकार की ओर से इस मामले में सिर्फ़ सूचना और प्रसारण मंत्रालय के एक अधिकारी का बयान सामने आया है जिन्होंने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा कि फ़िल्म की रिलीज़ सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 के प्रावधानों का उल्लंघन करती है.

हालांकि, मंत्रालय ने यह नहीं बताया कि इन नियमों के किस विशेष प्रावधान का उल्लंघन हुआ है.

'सतलुज' विवाद पर फ़िल्म इंडस्ट्री की बेचैनी

शुभ्रा गुप्ता का कोट
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बीबीसी से बातचीत में वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार और क्रिटिक शुभ्रा गुप्ता ने बताया, "जब फ़िल्म सेंसर बोर्ड में फंसी थी और 127 कट बताए गए थे, तब निर्माता हाईकोर्ट भी गए थे और उन्हें वहां से अपने पक्ष में फैसला मिलने की उम्मीद थी."

"लेकिन तब उनसे कहा गया कि वो अपील वापस ले लें. निर्माताओं ने ऐसा ही किया. त्रेहन चाहते थे कि सेंसर बोर्ड से बातचीत से मामला सुलझ जाए और फ़िल्म रिलीज़ हो जाए. लेकिन ऐसा नहीं हुआ."

"सेंसर बोर्ड को कई अजीब आपत्तियां थी जिनमें- भारतीय झंडे को नहीं दिखा सकते, 'पंजाब पुलिस' नहीं बोल सकते, गुरुबाणी की आवाज़ नहीं सुना सकते, पंजाब के ज़िलों के नाम नहीं दे सकते, पंजाब 95 की जगह किसी काल्पनिक राज्य के नाम का इस्तेमाल किया जाए."

"यहां तक कि जसवंत सिंह खालड़ा का नाम इस्तेमाल ना करने को भी कहा गया. ये सब ऐसी बातें थीं जिसे निर्माताओं ने मानने से इनकार कर दिया."

जिस तरह ये फ़िल्म पहले सेंसर बोर्ड में फंसी और फिर बिना कुछ कहे ओटीटी से हटाया गया उससे फ़िल्म इंडस्ट्री में भी शंका बढ़ी है.

हमने मुंबई में कई फ़िल्मकारों, फ़िल्म ट्रेड एक्सपर्ट्स और इंडस्ट्री से जुड़े लोगों से बात की.

कई लोगों ने विवाद में पड़ने के डर से इंटरव्यू से इनकार कर दिया. ज़्यादातर का मानना है कि यह मामला देश के हर उस फ़िल्म निर्माता और निर्देशक के लिए खुली चेतावनी है जो किसी भी ऐतिहासिक या राजनीतिक घटना पर कहानी कहना चाहता है.

नाम ना छापने की शर्त पर एक फ़िल्म निर्माता ने कहा, "ओटीटी पर स्पष्ट नियम तो हैं नहीं. सवाल ये है कि कैसे निर्धारित करें कि जो हम दिखाएंगे उस पर विवाद नहीं होगा? ये हम सब प्रोड्यूसर्स के लिए बेहद डरावना है."

उन्होंने कहा, "फ़िल्म मेकर्स को जो मैसेज भेजा जा रहा है वो लाउड एंड क्लियर है कि ऐसी कोई भी फ़िल्म ना बनाएं जिससे सरकार को कोई आपत्ति हो या जो उन्हें अच्छी ना लगे."

बिना किसी स्पष्ट क़ानूनी आदेश के फ़िल्म का इस तरह स्ट्रीमिंग से ग़ायब हो जाना क्या भारतीय सिनेमा में 'अघोषित सेंसरशिप' के नए दौर की तरफ़ इशारा नहीं करता?

शुभ्रा गुप्ता कहती हैं, "बिल्कुल. लेकिन यह सवाल अब कोई नया नहीं रहा. पिछले कई सालों में बहुत से फ़िल्मकारों ने मुझसे कहा है कि ऐसी फ़िल्में जो मौजूदा सरकार की सोच से मेल नहीं खातीं, उन्हें बनाने में कई साल से ज़्यादा रोक-टोक का सामना करना पड़ रहा है."

"बिना औपचारिक प्रतिबंध लगाए ही यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि सतलुज लोगों तक न पहुंचे. इससे बाक़ी फ़िल्मकारों को भी संदेश मिल जाता है कि जो फ़िल्में मौजूदा सत्ता के स्वीकार्य नैरेटिव से अलग होंगी, उनके लिए रिलीज़ का रास्ता लगभग बंद हो सकता है."

ओटीटी पर 'अघोषित सेंसरसिप' का इतिहास

अमेज़ॉन प्राइम वीडियो और ज़ी5

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इमेज कैप्शन, 2021 में अमेज़न प्राइम वीडियो की राजनीतिक ड्रामा सिरीज़ 'तांडव' पर हुआ विवाद शायद इस तरह की सेंसरशिप का पहला मामला था (सांकेतिक तस्वीर)

वैसे यह पहली बार नहीं है जब भारत में किसी बड़ी फ़िल्म या वेब सिरीज़ को विवादों का सामना करना पड़ा हो.

इससे पहले भी ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म क़ानूनी दबाव, राजनीतिक विरोध और भावनाएं आहत होने की शिकायतों के चलते कई बार कंटेंट हटाने या उसमें बदलाव करने का फ़ैसला ले चुके हैं.

2021 में अमेज़न प्राइम वीडियो की राजनीतिक ड्रामा सिरीज़ 'तांडव' (सैफ़ अली ख़ान और ज़ीशान अय्यूब अभिनीत) पर हुआ विवाद शायद इस तरह की सेंसरशिप का पहला मामला था.

'तांडव' के रिलीज़ होते ही देश के कई राज्यों में विरोध हुआ था.

ये विरोध एक सीन हिंदू देवी-देवताओं के कथित अपमान और जातिगत टिप्पणियों को लेकर था. विवाद इतना बढ़ा कि निर्माताओं के ख़िलाफ़ अलग अलग राज्यों में एफ़आईआर दर्ज की गईं.

प्राइम वीडियो इंडिया के शीर्ष अधिकारियों को पुलिस पूछताछ का सामना करना पड़ा और इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अग्रिम ज़मानत देने से भी इनकार कर दिया था.

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की आपत्ति के बाद, निर्देशक अली अब्बास ज़फ़र के साथ साथ पूरी टीम ने 'बिना शर्त माफ़ी' मांगी. भारत के ओटीटी इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था.

हालांकि सरकार ने तब भी सीधे तौर पर सिरीज़ को बैन नहीं किया था, लेकिन चौतरफ़ा दबाव के कारण प्राइम वीडियो को अपनी ही सिरीज़ से विवादित दृश्यों को काटना पड़ा था.

यह पहला बड़ा संकेत था कि ओटीटी पर बिना किसी औपचारिक सेंसर बोर्ड के भी 'अदृश्य कैंची' चल सकती है.

शुभ्रा गुप्ता कहती हैं, "सतलुज का मामला तो एक कदम आगे निकल गया है क्योंकि 'तांडव' की तरह इस बार फ़िल्म पर सीधे तौर पर, सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कहा गया, बल्कि बिना कोई वजह बताए हटा दिया गया."

दूसरा बड़ा मामला है तमिल फ़िल्म 'अन्नपूर्णी' का जो 'सतलुज' विवाद के काफ़ी करीब है.

अभिनेत्री नयनतारा की 'अन्नपूर्णी: द गॉडेस ऑफ़ फ़ूड' एक ऐसी लड़की की कहानी है जो रूढ़िवादी हिंदू ब्राह्मण परिवार से आती है और शेफ़ बनना चाहती है.

शुभ्रा गुप्ता का कोट कार्ड

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साल 2023 में फ़िल्म बिना किसी आपत्ति के सेंसर बोर्ड से पास होकर सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई... लेकिन जब 2024 में यह नेटफ़्लिक्स पर आई, तो दक्षिणपंथी संगठनों ने इसके कुछ दृश्यों पर 'धार्मिक भावनाएं आहत' करने और 'लव जिहाद' को बढ़ावा देने का आरोप लगाया.

एफ़आईआर दर्ज होने के तुरंत बाद, बिना किसी आधिकारिक सरकारी प्रतिबंध के, नेटफ़्लिक्स ने इस फ़िल्म को अपने प्लेटफ़ॉर्म से पूरी तरह हटा दिया था.

इसके साथ ही सह-निर्माता ज़ी स्टूडियोज़ ने लिखित माफ़ीनामा भी जारी किया.

नयनतारा ने भी माफ़ी मांगते हुए एक लंबा चौड़ा पोस्ट शेयर किया था जिसकी शुरुआत उन्होंने 'जय श्री राम' से की थी.

इसके अलावा भी कई सिरीज़ 'आईसी814: द कांधार हाईजैक', 'द सुटेबल बॉय', जैसी कई सिरीज़ और ओटीटी फ़िल्मों पर विवाद होते रहे हैं.

मनोज बाजपेयी की 'घूसखोर पंडित' पर भी हंगामा हुआ तो निर्माताओं ने माफ़ी मांगी और फ़िल्म का नाम बदला.

यहां तक कि ऑस्कर अवॉर्ड के लिए ब्रिटेन की आधिकारिक प्रविष्टि रही हिंदी फ़िल्म 'संतोष' (2024) की भारत में ओटीटी रिलीज़ रोक दी गई.

केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफ़सी) ने फ़िल्म में पुलिस की बर्बरता, जातिवाद और सांप्रदायिक तनावों के कथित चित्रण को लेकर आपत्ति जताई थी.

निर्देशिका संध्या सूरी ने कहा था कि सीबीएफ़सी के सुझाए गए कट फ़िल्म की मूल भावना के ख़िलाफ़ थे और उन्हें स्वीकार नहीं थे. इस वजह से फ़िल्म की भारतीय थियेटर रिलीज़ पहले ही रद्द हो चुकी थी.

अगर ये भी मान लिया जाए कि 'सतलुज' के केस में सेंसर बोर्ड की आपत्ति सिर्फ़ असली नामों और किरदारों से थी तो फिर 'तांडव', 'द सुटेबल बॉय' और 'संतोष' जैसी फ़िल्मों की कहानी और किरदार तो असली नहीं हैं, फिर भी फ़िक्शन होते हुए भी, उन्हें विवादों और 'अघोषित सेंसरशिप' का सामना क्यों करना पड़ा?

भारत में मुख्य रूप से सार्वजनिक सिनेमाघरों में दिखाई जाने वाली फ़िल्मों को 'सिनेमैटोग्राफ़ एक्ट' के तहत सेंसर बोर्ड ऑफ़ फ़िल्म सर्टिफ़िकेशन (सीबीएफ़सी) रिलीज़ करने का सर्टिफ़िकेट जारी करता है.

लेकिन ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म पर फ़िल्म रिलीज़ करने के लिए सेंसर बोर्ड के सर्टिफ़िकेट की ज़रूरत नहीं है.

ये 'इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (आईटी) रूल्स, 2021' के तहत आते हैं, जहां उम्र के आधार पर वर्गीकरण, सेल्फ़ रेगुलेशन और आचार संहिता जैसे नियम लागू होते हैं.

एक मशहूर ओटीटी क्राइम सिरीज़ के लेखक ने कहा, "इस लूपहोल के चलते निर्माताओं ने फ़ायदा भी तो ख़ूब उठाया है. सेंसर नहीं होता है तो जमकर गालियां और बोल्ड सीन भी खुलेआम चले. लेकिन नुकसान भी तो उठाना पड़ेगा."

ये नुकसान बहुत बड़े हैं. नाम न छापने की शर्त पर एक फ़िल्म निर्माता कहते हैं, "सिनेमा की सेंसरशिप एक तय प्रक्रिया है. उसके नियम हैं, अपील का रास्ता है और आख़िर में अदालत का विकल्प भी. लेकिन ओटीटी पर स्थिति अलग है."

"यहां 'सेल्फ रेगुलेशन' के नाम पर क्या हो रहा है, यह किसी को साफ़ नहीं पता. यह 'सेल्फ़ रेगुलेशन' बिलकुल अंधेरे में ऑपरेट करता है. किसी फ़िल्म का बिना साफ़ वजह बताए गला घोंटा जा सकता है. और यहां किसको चैलेंज करें कोर्ट में जाकर. कुछ साफ़ साफ़ वजह तो बताई नहीं है. यह कहीं ज़्यादा डराने वाली स्थिति है."

सिनेमा सिर्फ़ विचार नहीं, कारोबार भी है

बिकास रंजन मिश्रा

चर्चा इस बात की भी है कि सरकार के फ़िल्म हटाने के बावजूद अब ज़्यादा लोग पायरेटेड लिंक के ज़रिए इसे देख रहे हैं और डाउनलोड कर सतलुज पंजाब के कई गावों में बड़ी स्क्रीनों पर भी दिखाई जा रही है.

यह उसके विषय की ताक़त का संकेत है, लेकिन इंडस्ट्री से जुड़े लोगों का कहना है कि सिनेमा सिर्फ़ विचार नहीं, एक व्यवसाय भी है.

आर्थिक रूप से ये फ़िल्म घाटे का सौदा है और साथ ही यह संदेश भी है कि संवेदनशील विषयों पर जोखिम उठाने की क़ीमत बहुत बड़ी हो सकती है.

वैश्विक ओटीटी कंपनियों के लिए भी ऐसे विवाद सिर्फ़ अभिव्यक्ति की आज़ादी का सवाल नहीं, बल्कि कारोबार का भी मामला हैं.

भारत जैसे बड़े बाज़ार में क़ानूनी विवाद और सरकारी टकराव से बचने के लिए कंपनियां अक्सर जोखिम लेने के बजाय सुरक्षित रास्ता चुनती हैं.

अगर किसी फ़िल्म को लेकर विवाद की आशंका हो, तो उसे हटाना या रिलीज़ न करना उनके लिए ज़्यादा आसान विकल्प बन जाता है.

इसका सबसे बड़ा असर फ़िल्मकारों पर पड़ता है जो फ़िल्म बनाने का जोखिम भी उठाते हैं, साथ ही उसे दर्शकों तक पहुंचाने की लड़ाई भी उन्हें ही लड़नी पड़ती है.

फ़िल्म निर्देशक विकास रंजन मिश्रा की हुमा क़ुरैशी अभिनीत थ्रिलर फ़िल्म 'बयान' कई अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में सराहना बटोरने के बाद इस साल सिनेमाघरों में रिलीज़ होने वाली है.

बीबीसी से बातचीत में बिकास रंजन मिश्रा कहते हैं, "'सतलुज' के साथ जो कुछ हो रहा है, उसे हम सभी फ़िल्मकार बहुत ध्यान से देख रहे हैं. हम यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि फ़िल्ममेकिंग कम्यूनिटी और ख़ासतौर पर इंडिपेंडेंट फ़िल्में बनाने वाले, इस नए सिस्टम से कैसे डील कर सकते हैं."

"मुझे लगता है ये वो मौक़ा भी है जब निर्माता-निर्देशकों को साथ मिलकर कम से कम सरकार से बात करनी चाहिए और ये अपील करनी चाहिए कि कारण तो बताया जाए कि किस वजह से फ़िल्म को रोका गया."

"अगर हमारे चारों ओर ऐसा दायरा बनाया जा रहा है तो हमें पता तो चले कि दायरा क्या है जिसके अंदर रहकर हमें अपनी कहानियां कहनी हैं."

बॉलीवुड फ़िल्मों और टेलीविज़न से जुड़ी लगभग कई प्रतिष्ठित कंपनियों में आम राय है कि विवादित माने जाने वाले विषयों ख़ासतौर पर राजनीति और धर्म जैसे संवेदनशील विषयों को छुआ ही ना जाए.

एक पटकथा लेखक बताते हैं, "अब तो कहानी लिखने से पहले किरदारों के नाम, उनकी जाति और उनके पहनावे तक पर दस बार बैठकें होती हैं. हर पल सिर्फ़ यही डर हावी रहता है कि कहीं किसी की भावनाएं आहत न हो जाएं."

फ़िल्मकारों का कहना है कि लगातार उठते विवादों ने कहानी कहने की आज़ादी पर असर डाला है. इससे नई कहानियों, अलग-अलग नज़रियों और कठिन सवाल पूछने की गुंजाइश पर भी असर पड़ सकता है.

'सतलुज' विवाद ने एक बार फिर यही सवाल सामने रखा है कि क्या किसी कहानी को रोक देने से अतीत बदल जाता है, या सिर्फ़ उसे सुनाने का रास्ता बंद होता है? क्योंकि सिनेमा सिर्फ़ मनोरंजन नहीं, समाज की सामूहिक यादों का भी हिस्सा है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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