मध्य प्रदेश: कमलेश्वर डोडियार के वेटर से विधायक बनने तक का सफ़र

कमलेश्वर डोडियार
इमेज कैप्शन, मध्य प्रदेश के रतलाम जिले की सैलाना विधानसभा सीट से जीत कमलेश्वर डोडियार
    • Author, शुरैह नियाज़ी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिये
  • प्रकाशित

मज़दूर के तौर पर काम कर चुके 34 साल के कमलेश्वर डोडियार मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में विधायक चुने गए हैं.

वो रतलाम की सैलाना विधानसभा सीट से चुनाव जीत कर आए हैं.

चुनाव में मिली जीत के बाद जब कमलेश्वर को भोपाल आने के लिए कार नहीं मिली तो उन्होंने अपने बहनोई की बाइक से ही भोपाल पहुंचने का सोचा.

कमलेश्वर ने अपने गांव से भोपाल तक 330 किलोमीटर का सफर 9 घंटे में बाइक से पूरा किया.

भोपाल पहुंचने पर जब उनसे पूछा गया कि इतनी दूर बाइक से आने में उन्हें दिक़्क़त तो नहीं हुई? इस सवाल पर उन्होंने कहा कि इस तरह की यात्रा की उन्हें आदत है.

राजधानी भोपाल में अब वो लोगों से मिल रहे हैं. उन्होंने गुरुवार रात मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से मुलाक़ात की. वो शुक्रवार को भी कई अधिकारियों से मिले.

शिवराज सिंह चौहान ने कमलेश्वर को मिठाई खिलाकर बधाई दी. उन्होंने शिवराज सिंह चौहान से मंत्रिमंडल में शामिल होने की भी इच्छा जताई.

विधानसभा पहुंच कर वो सबसे पहले उसके गेट पर नतमस्तक हुए. इसके बाद उन्होंने विधानसभा में निर्वाचन से जुड़ी प्रकिया को पूरा किया.

संघर्षों से भरी ज़िंदग़ी

विधानसभा में नतमस्तक होते कमलेश्वर डोडियार
इमेज कैप्शन, विधानसभा में नतमस्तक होते कमलेश्वर डोडियार

कमलेश्वर ने भारतीय आदिवासी पार्टी के टिकट पर जीत दर्ज की है.

वह भाजपा और कांग्रेस के प्रत्याशियों के अलावा एक मात्र व्यक्ति है जिन्हें इस विधानसभा चुनाव में जीत मिली है.

वो रतलाम जिले में आदिवासियों के लिए आरक्षित सैलाना विधानसभा सीट से चुनाव जीते हैं.

उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार हर्षविजय गहलोत को 4,618 वोटों से हराया है.

कमलेश्वर की ज़िंदग़ी बहुत ही संघर्ष भरी रही है. उनके माता-पिता मज़द़ूरी करके अपना और अपने परिवार का जीवनयापन करते रहे हैं. कमलेश्वर ने भी मज़दूरी की है.

तीन दिसंबर को जब चुनाव परिणाम आ रहे थे, उस दिन भी कमलेश्वर की मां सीता बाई मज़दूरी करने गई थीं.

हाथ टूट जाने की वजह से उनके पिता ने इन दिनों मज़दूरी करना बंद कर दिया है.

लेकिन चुनाव जीतने के बाद कमलेश्वर ने अपनी मां की मज़दूरी बंद करा दी है.

उन्होंने बीबीसी से कहा, ''मैंने जिस दिन जीत हासिल की, उसी दिन मैंने फैसला कर लिया था कि मेरी मां अब मज़दूरी नहीं करेंगी. इसलिए अब उन्होंने यह काम छोड़ दिया है.''

वेटर का भी किया काम

भोपाल आने के लिए बाइक की सवारी करते कमलेश्वर डोडियार
इमेज कैप्शन, भोपाल आने के लिए बाइक की सवारी करते कमलेश्वर डोडियार

कमलेश्वर के परिवार में 6 भाई और 3 बहनें हैं. वो उनमें सबसे छोटे हैं. परिवार के सभी सदस्य मज़दूरी करते हैं. इनका परिवार मज़दूरी करने के लिए गुजरात और राजस्थान जैसे राज्यों में भी जाता है.

उन्होंने पांचवीं तक की पढ़ाई अपने गांव में ही की. 8वीं तक की पढ़ाई उन्होंने सैलाना में की. 12वीं की पढ़ाई उन्होंने रतलाम से की. वहीं से उन्होंने बीए अंग्रेज़ी में किया और फिर एलएलबी करने के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी का रुख किया.

उन्होंने बताया, ''पढ़ाई में जो भी रुकावट आई वो आर्थिक वजह से ही रही. परिवार के हर सदस्य के पास मात्र सवा बीघा ज़मीन है, जिससे कुछ नहीं हो सकता. इसलिए मज़दूरी करना मजबूरी है.''

कमलेश्वर का घर
SHURAIH NIAZI
पढ़ाई में जो भी रुकावट आई वो आर्थिक वजह से ही रही. परिवार के हर सदस्य के पास मात्र सवा बीघा ज़मीन है, जिससे कुछ नहीं हो सकता. इसलिए मज़दूरी करना मजबूरी है.
कमलेश्वर डोडियार
नव निर्वाचित विधायक, मध्य प्रदेश

कमलेश्वर की मां को रोज़ाना मज़दूरी करने के 200 रुपये ही मिलते थे लेकिन कई बार उन्हें 300 रुपए तक मिल जाते हैं.

कमलेश्वर ने 2006 में 11वीं की परीक्षा के बाद पहली बार मज़दूरी की थी. उस समय वो राजस्थान के कोटा अपनी मां के साथ मज़दूरी करने गए थे. उन्होंने उस समय करीब 3 महीने तक मज़दूरी की थी.

इसके बाद उन्होंने रतलाम के एक होटल में वेटर का भी काम किया. उन्होंने कई अन्य जगहों पर भी मज़दूरी की है.

कमलेश्वर अपने परिवार के साथ टीन की चादर वाले घर में रहते हैं. बारिश के समय पानी उनके घर में आ जाता है.

कमलेश्वर
इमेज कैप्शन, कमलेश्वर

बराक ओबामा से प्रभावित

कमलेश्वर पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से ख़ासे प्रभावित हैं.

कमलेश्वर बताते है, ''मुझे उनका संघर्ष काफ़ी हद तक अपनी तरह का लगता है. उनका परिवार भी कीनिया से आकर अमेरिका में बसा और तमाम क़िस्म के भेदभाव का सामना उन्होंने किया और उसके बाद वो उस मुक़ाम पर पहुंचे.''

जेल भी जा चुके हैं कमलेश्वर

विधानसभा चुनाव जीतने के बाद कमलेश्वर डोडियार
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विधानसभा तक का सफ़र तय करने से पहले कमलेश्वर 11 बार जेल जा चुके हैं. उन पर 16 मामले दर्ज हैं.

उनका दावा है कि राजनीतिक कारणों से उन पर ये मामले दर्ज कराए गए हैं.

कमलेश्वर ने 2018 का विधानसभा का चुनाव निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लड़ा था. उस चुनाव में उन्हें 18,800 मत मिले थे. इन्होंने 2019 में लोकसभा चुनाव भारतीय आदिवासी पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर लड़ा और 15,000 से ज्यादा वोट हासिल किए.

उसी समय कमलेश्वर ने फैसला कर लिया था कि वे न सिर्फ़ अगला विधानसभा चुनाव लड़ेंगे बल्कि जीतेंगे भी.

वो कहते हैं कि चुनाव लड़ने के लिए ज़रूरी पैसा उन्होंने चंदा करके जमा किया.

कमलेश्वर कहते हैं कि वो आगे भी आदिवासियों की लड़ाई लड़ते रहेंगे और उनके हित में काम करेंगे.

रतलाम के स्थानीय वरिष्ठ पत्रकार रीतेश मेहता कहते हैं, ''कमलेश्वर अपनी धुन के पक्के हैं और अपने समाज का दर्द महसूस करते हैं और उसमें बदलाव लाना चाहते है. इसके लिए वे लड़ाई-झगड़े से भी परहेज़ नहीं करते हैं. यही वजह है कि आदिवासी समुदाय के हक़ की ल़ड़ाई में उन पर कुछ अपराधिक मामलें भी दर्ज हुए.''

मेहता कहते हैं कि आने वाला वक़्त ही बताएगा कि कमलेश्वर विधायक के रूप में अपने समाज का कितना भला कर पाते हैं.

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