भारतीय नाविकों की मौत के मामले में रुबियो का बयान क्या भारत के लिए 'चेतावनी' है?

इमेज स्रोत, Getty Images
ओमान की खाड़ी में तीन भारतीय नाविकों की मौत को लेकर अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के ताज़ा बयान ने भारत में आक्रोश को बढ़ा दिया है.
भारत की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस और कूटनीतिक मामलों के जानकारों ने इसे भारत के लिए चेतावनी करार दिया है.
बीते नौ जून को अमेरिकी नेवी के हमले की पुष्टि खुद अमेरिकी सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) ने की थी, जिसके बाद भारत ने अमेरिका से विरोध दर्ज कराया और भारतीय विदेश मंत्री ने, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से इस पर बात की थी.
जयशंकर ने कहा कि इस बातचीत में उन्होंने अमेरिकी विदेश मंत्री से 'कड़ा विरोध' दर्ज कराया और कहा कि इस तरह का 'घातक हमला उचित नहीं' है.
इसके बाद शनिवार को अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने एस जयशंकर और रुबियो के बीच बातचीत का ब्योरा जारी किया. बयान के अनुसार, रुबियो ने कहा है कि खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी नाकेबंदी का उल्लंघन और ईरानी तेल की अवैध ढुलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी.
अमेरिका के विदेश मंत्रालय ने शनिवार को बयान जारी कर बताया, "विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कल भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर से बात की. दोनों नेताओं ने होर्मुज़ स्ट्रेट में हाल की घटनाओं पर चर्चा की."
मार्को रुबियो की इस टिप्पणी पर भारत में कड़े सवाल पूछे जा रहे हैं और विपक्षी दलों और पूर्व राजनयिकों ने कहा कि अमेरिकी विदेश मंत्री ने खेद जताने की बजाय कड़ी भाषा का इस्तेमाल किया.
दरअसल, अमेरिकी सेना ने ओमान के तट पर कमर्शियल जहाज़ 'सेटेबेलो' पर 9 जून को हमला किया था. इस जहाज़ पर 24 भारतीय क्रू मेंबर सवार थे, जिनमें से 21 को बचा लिया गया था, जबकि तीन नाविकों की मौत हो गई थी.
यह पहली घटना नहीं थी, इसके पहले 8 जून और 11 जून को भी खाड़ी क्षेत्र में भारतीय क्रू मेंबर्स वाले दो अन्य जहाज़ों पर हमला किया गया था, हालांकि उनमें किसी की मौत नहीं हुई और सभी नाविकों को बचा लिया गया.
रुबियो ने क्या कहा?

इमेज स्रोत, Getty Images
वो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख़बरें जो दिनभर सुर्खियां बनीं.
एपिसोड
समाप्त
अमेरिकी विदेश मंत्रालय के बयान के मुताबिक, "अमेरिका के विदेश मंत्री ने (एस जयशंकर से बातचीत में) ज़ोर दिया कि सभी कमर्शियल जहाज़ों को अमेरिकी सेना के आदेशों का तुरंत पालन करना चाहिए, क्योंकि वो इस स्ट्रेट में शांति और सुरक्षा बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं."
"अमेरिका के विदेश मंत्री ने इस बात पर ज़ोर देकर कहा कि अमेरिकी नाकेबंदी का उल्लंघन और ईरानी तेल की अवैध ढुलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी."
इससे पहले भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी इस बातचीत के बारे में एक्स पर जानकारी दी थी.
फ़ोन पर हुई इस बातचीत के बारे में भारतीय विदेश मंत्री ने एक्स पर लिखा, "आज (शुक्रवार) शाम अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से बात हुई. मैंने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी नौसेना के हमलों के ख़िलाफ़ भारत का कड़ा विरोध दोहराया, जिनमें तीन भारतीय नाविकों की मौत हो गई."
"कमर्शियल शिपिंग को निशाना बनाने वाली ऐसी घातक कार्रवाई किसी भी तरह से उचित नहीं है."
ग़ौरतलब है कि इस घटना को अमेरिकी अभियान का पहला ऐसा मामला माना जा रहा है, जिसमें उसके किसी हमले में मौतों की पुष्टि हुई है.
इस घटना ने वॉशिंगटन और नई दिल्ली के बीच कूटनीतिक तनाव को बढ़ाया है.
शशि थरूर- 'दोस्त इतना असंवेदनशील कैसे हो सकता है'

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने अमेरिकी विदेश मंत्री के बयान को असंवेदनशील बताया है और भारत-अमेरिका दोस्ती पर सवाल खड़े किए हैं.
शशि थरूर ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा, "अमेरिका का यह आधिकारिक बयान पढ़कर गहरा सदमा लगा है. इसमें बेगुनाह भारतीयों के मारे जाने पर अफ़सोस या संवेदना का ज़रा भी ज़िक्र नहीं है. कोई 'दोस्त' और रणनीतिक साझेदार इतना असंवेदनशील कैसे हो सकता है?"
उन्होंने सवाल किया, "क्या नियमों का पालन न करने वाले कमर्शियल जहाज़ को किसी दूसरे तरीके से नहीं रोका जा सकता था, जिसमें किसी की जान न जाए. क्या मिसाइल हमला कर आम क्रू सदस्यों को मारने की जगह जहाज़ के प्रोपल्शन या स्टीयरिंग को बेकार नहीं किया जा सकता?"
उन्होंने आगे लिखा, "इन अहम समुद्री रास्तों से गुज़रने वाले लगभग हर व्यापारिक जहाज़ पर भारतीय क्रू सदस्य होते हैं. क्या अब अमेरिकी मिसाइलों के लिए वे सब भी आसान शिकार माने जाएंगे?"
शशि थरूर का कहना है, "यह रवैया मंज़ूर करने लायक नहीं है और मुझे उम्मीद है कि एस जयशंकर ने मार्को रुबियो से यह बात कही होगी."

भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर और अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के बीच बातचीत का ब्यौरा सामने आने के बाद कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने इसे भारत के लिए 'शर्मनाक' बताया है.
पवन खेड़ा ने कहा, "भारत को मांग करनी चाहिए थी कि अमेरिका अपने हमले में तीन युवा भारतीय नाविकों की हत्या के लिए बिना शर्त माफ़ी मांगे. इसके बजाय, विदेश मंत्री रुबियो ने कथित तौर पर चेतावनी जारी की. इसमें कहा गया कि अमेरिकी मिलिट्री के आदेशों का पालन न करना 'बर्दाश्त नहीं' किया जाएगा. यह आदेश की भाषा है, पछतावे की नहीं."
उन्होंने कहा कि अमेरिका ने न तो लोगों की मौत को स्वीकार किया, न ही ज़िम्मेदारी ली और न कोई पछतावा ज़ाहिर किया.
पवन खेड़ा ने लिखा, "भारत के जवाब ने इस मामले को और भी शर्मनाक बना दिया. इसे हमला कहने के बजाय विदेश मंत्री ने सिर्फ़ यह कहा कि कमर्शियल शिपिंग के ख़िलाफ़ जानलेवा कार्रवाई 'सही नहीं' है,"
"सही नहीं? यह वह शब्द है जिसका इस्तेमाल आप एयरपोर्ट पर महंगा सैंडविच ख़रीदने के बाद करते हैं, न कि उस सैन्य हमले के लिए जिसमें आम लोग मारे जाते हैं."
पनव खेड़ा ने कहा, "अमेरिका की कार्रवाइयों के लिए सही शब्द हैं- गैरकानूनी, लापरवाह, और नामंज़ूर. इसके बजाय ऐसे शब्दों को इस्तेमाल किया गया जो मारे गए लोगों के परिवारों को छोड़कर किसी को बुरा नहीं लगा."
अमेरिकी विदेश विभाग का बयान सामने आने के बाद कई लोगों ने इस पर प्रतिक्रिया दी है.
उद्योगपति सबीर भाटिया ने लिखा, "इससे पता चलता है कि अमेरिका भारत को दोस्त नहीं मानता, भले ही हमारे महान विदेश मंत्री हमें कुछ भी बता रहे हों."
झारखंड मुक्ति मोर्चा ने अपने एक्स हैंडल पर लिखा, "यह शर्मनाक है. सचमुच शर्मनाक. अमेरिका के विदेश मंत्री ने 3 नाविकों की हत्या पर अफ़सोस तक नहीं जताया और उससे शर्मनाक हमारे लाल आँख दिखाने वाले विदेश मंत्री ने भारतीयों की हत्या का ज़िक्र भी नहीं किया सिर्फ़ जी सर - जो हुक्म सर- जो आज्ञा सर कहा."
'यह कैसा दोस्त?'

इमेज स्रोत, @CENTCOM
वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने एक्स पर लिखा, "कोई सहानुभूति नहीं. कोई खेद नहीं. निर्दोष भारतीय नाविकों की मौत का कारण बने हमलों पर अमेरिकी विदेश मंत्री की प्रतिक्रिया सिर्फ़ इन हमलों को अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी के उल्लंघन का नतीजा बताकर सही ठहराने की कोशिश करती है."
"कमर्शियल जहाज़ों को निशाना बनाना अंतरराष्ट्रीय क़ानून का खुला उल्लंघन है. अमेरिकी राजनयिकों को तलब करना निश्चित रूप से पर्याप्त नहीं है. क्या अब भारत सरकार के लिए सिर्फ़ 'लाल आंख' दिखाने से आगे बढ़कर कुछ करने का समय नहीं आ गया है?"
इंडो पेसिफ़िक मामलों के एक्सपर्ट प्रोफ़ेसर डेरेक जे ग्रॉसमैन ने एक्स पर लिखा, "रुबियो की बातें असंवेदनशील थीं और इनसे अमेरिका-विरोधी भावनाएं और भड़केंगी. उन्होंने भारत को हुई जान-माल की हानि पर संवेदना तक नहीं जताई. ट्रंप का अमेरिका भारत का कैसा 'दोस्त' है."
प्रोफ़ेसर डेरेक जे ग्रॉसमैन ने एक अन्य पोस्ट में लिखा, "भारत सही तौर पर अमेरिका के सामने 'क़ानून के शासन' की बात उठा रहा है, लेकिन समस्या यह है कि ट्रंप का अमेरिका अब असल में इसमें यकीन नहीं रखता."
उनका कहना है, "इसके बजाय, ट्रंप प्रशासन अपने दूसरे कार्यकाल में 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' वाली सोच में यकीन रखता है. असल में यह एक साम्राज्यवादी विदेश नीति है."
भारत की पूर्व विदेश सचिव और विदेश मामलों की जानकार निरूपमा राव ने प्रोफ़ेसर डेरेक जे ग्रॉसमैन के एक्स पोस्ट को शेयर करते हुए कहा कि रुबियो-जयशंकर की बातचीत अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एक बड़े ट्रेंड की याद दिलाती है.
उन्होंने एक्स पर लिखा, "ताक़त पूरे ज़ोर से पाबंदी, ब्लॉकेड, टैरिफ़ और ज़बरदस्ती की भाषा बोल रही है. इसके नतीजों को समझाने के लिए कूटनीति का इस्तेमाल नहीं किया गया. तीन भारतीय नाविक मारे गए हैं. (अमेरिका का) आधिकारिक जवाब क़ानून लागू करने पर फ़ोकस को लेकर है."
निरूपमा राव के मुताबिक़, "अमेरिका बहुत ज़्यादा सख्ती दिखा रहा है और वह नरमी से बात भी नहीं कर रहा है."
भारत के रुख़ पर सामरिक मामलों के जाने माने विश्लेषक ब्रह्मा चेलानी ने कहा, "ओमान के पास भारतीय क्रू वाले तीन कमर्शियल टैंकरों पर अमेरिकी नौसेना के लगातार हमलों में तीन मर्चेंट नाविकों की मौत हुई. मोदी सरकार की इस पर कमज़ोर प्रतिक्रिया के ख़िलाफ़ जनता की नाराज़गी ने ही शायद इस मांग और औपचारिक विरोध को जन्म दिया है."
उन्होंने आगे लिखा, "फिर भी प्रतिक्रिया (भारत की) कमज़ोर ही है. इसे 'उचित नहीं' बताया गया है, मानो निहत्थे नाविकों की हत्या कोई ऐसी बात हो जिस पर बस बहस की जा सकती है, न कि कोई ऐसी घटना जिसके लिए ज़िम्मेदारी तय की जानी चाहिए. अभी भी अमेरिका से माफ़ी मांगने या पीड़ितों के परिवारों को मुआवज़ा देने की कोई मांग नहीं की गई है, और न ही ऐसा कोई संकेत है कि नई दिल्ली इस मामले को सामान्य डिप्लोमैटिक औपचारिकताओं से आगे ले जाने का इरादा रखती है."
भारत को चेतावनी?

इमेज स्रोत, @FSUIINDIA
अमेरिकी अख़बार न्यूयॉर्क टाइम्स के कूटनीतिक संवाददाता एडवर्ड वॉन्ग ने मार्को रुबियो के रुख़ पर सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में इसे 'भारत को चेतावनी' कहा है
उन्होंने लिखा, "ट्रंप प्रशासन की ऐसी कार्रवाइयां जारी हैं जिससे भारत नाराज़ हो. ख़ास तौर पर हाल ही में ओमान के पास एक कमर्शियल जहाज़ पर सैन्य हमला, जिसमें तीन भारतीय नाविक मारे गए. अब रुबियो ने भारत को चेतावनी है."
अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू की कूटनीतिक संपादक सुहासिनी हैदर के मुताबिक़, जयशंकर और रुबियो के बीच हुई बातचीत के बारे में अमेरिकी विदेश विभाग के बयान से दोनों के बीच गहरे मतभेदों का पता चलता है.
उन्होंने एक्स पर लिखा, "सेक्रेटरी रुबियो ने ज़ोर देकर कहा कि सभी कमर्शियल जहाज़ों को अमेरिकी सेना के आदेशों का तुरंत पालन करना चाहिए, क्योंकि वे स्ट्रेट (समुद्री रास्ते) में शांति और सुरक्षा बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि अमेरिकी नाकेबंदी का उल्लंघन और ईरानी तेल की अवैध ढुलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी."
रक्षा विशेषज्ञ मेजर जनरल जीडी बक्शी ने भारतीय नाविकों की मौत और भारत-अमेरिका दोस्ती को लेकर सवाल खड़े किए हैं.
उन्होंने इस मामले पर सोशल मीडिया एक्स पर एक लंबी पोस्ट में कहा, "ईरान का 90% तेल चीन जाता है. ख़बरों के मुताबिक़, एक सौ से ज़्यादा चीनी जहाज़ों ने इस नाकेबंदी को तोड़ा है. किसी भी चीनी या रूसी जहाज़ पर हमला नहीं हुआ."
उन्होंने लिखा, "भारत ने अमेरिका से दोस्ती के लिए सबकुछ करने की कोशिश की लेकिन अमेरिका ने भारतीय नाविकों की हत्या कर इसका जवाब दिया."
उन्होंने लिखा, "किसिंजर ने सही कहा था कि अमेरिका का दुश्मन होना ख़तरनाक है, लेकिन दोस्त होना जानलेवा है. एक सोच ऐसी भी है जिसे ग़रीब भारतीयों की मौत से कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता. उन्हें लगता है कि उनकी मौत से यूरोप (जी-7) में मजे में खलल नहीं पड़ना चाहिए."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.





















