भारत में बढ़ रहे हैं चमचमाते अस्पताल, पर बेहतर इलाज अब भी करोड़ों लोगों की पहुँच से दूर

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- Author, निखिल इनामदार
- पदनाम, मुंबई
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
हाल ही में मैं पश्चिमी भारत के छोटे से शहर मिरज गया था, जहां मैं पला-बढ़ा हूं. वहां पांच किलोमीटर लंबी सड़क पर मुझे 50 से ज़्यादा मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल, जांच केंद्र और हेल्थ क्लिनिक दिखाई दिए.
इनमें से कई अस्पताल और जांच केंद्र पिछले पांच साल में ही खुले हैं. हालांकि, महाराष्ट्र का यह शहर लंबे समय से आसपास के इलाक़ों के लिए इलाज का बड़ा केंद्र रहा है.
इतनी बड़ी संख्या में खुल रहे ये नए अस्पताल और जांच केंद्र बताते हैं कि हाल के वर्षों में भारत का निजी स्वास्थ्य क्षेत्र कितनी तेज़ी से बढ़ा है.
अस्पताल हर तीन महीने में हज़ारों नए बेड जोड़कर तेज़ी से अपना विस्तार कर रहे हैं. जांच केंद्र चलाने वाली कंपनियां छोटे शहरों तक पहुंच रही हैं. मेडिकल संस्थान देश भर में अपना विस्तार करने के लिए शेयर बाज़ार से करोड़ों रुपये जुटा रहे हैं.
अगस्त की शुरुआत में भारत की सबसे बड़ी मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल कंपनी मणिपाल हेल्थ ने अपने आईपीओ से क़रीब 9600 करोड़ रुपये जुटाए.
यह इस साल भारत का दूसरा सबसे बड़ा आईपीओ बन गया.
निवेश की कमी नहीं

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यह क्षेत्र दुनिया भर की प्राइवेट इक्विटी यानी निजी निवेश करने वाली बड़ी कंपनियों की पसंद भी बना हुआ है.
साल 2022 से 2024 के बीच भारत की स्वास्थ्य और दवा कंपनियों में क़रीब 600 विलय, अधिग्रहण और प्राइवेट इक्विटी सौदे हुए. इनकी कुल क़ीमत 2.88 लाख करोड़ रुपये थी.
ग्रांट थॉर्नटन के आंकड़ों के मुताबिक़, इस रकम का 40 प्रतिशत हिस्सा अस्पतालों में गया.
कंसल्टेंसी कंपनी से बीबीसी को मिले हाल के आंकड़े बताते हैं कि पिछले दो साल में इस क्षेत्र ने 1.92 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त रकम भी जुटाई है.
निवेश की इस लहर से देश में स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ी हैं और लोगों के लिए इलाज तक पहुंच आसान हुई है.
लेकिन इसी तेज़ विस्तार के कारण इलाज इतना महंगा भी हुआ है कि करोड़ों भारतीय इसे नहीं करा सकते.
महंगा इलाज

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सरकार की एक समिति ने हाल ही में जारी अपनी नई रिपोर्ट में कहा है कि भारत में तेज़ी से बढ़ रहे स्वास्थ्य क्षेत्र का फ़ायदा सभी लोगों तक बराबर नहीं पहुंच रहा.
रिपोर्ट ने निजी अस्पतालों में इलाज का ख़र्च उठाने को लेकर गहराते संकट पर गंभीर चिंता जताई. रिपोर्ट में पाया गया कि सरकारी अस्पतालों के मुक़ाबले निजी अस्पतालों में इलाज अक्सर पांच से 10 गुना महंगा होता है.
कैंसर, दिल की बीमारी और किडनी ख़राब होने जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में यह अंतर और भी बढ़ जाता है.
रिपोर्ट में कहा गया कि क्लिनिक, नर्सिंग होम और जांच केंद्र बिना किसी रोक-टोक के बढ़ रहे हैं. साथ ही, इलाज से जुड़े नियम और मानक हर जगह एक जैसे लागू नहीं किए जा रहे.
इस वजह से निजी स्वास्थ्य क्षेत्र में इलाज की गुणवत्ता और क़ीमत में बड़ा अंतर दिखाई देता है.
मरीज़ों से मनमाने पैसे लिए जा सकते हैं और उन्हें तय मानकों से कम स्तर का इलाज मिलने का ख़तरा भी रहता है. रिपोर्ट ने निजी स्वास्थ्य सेवाओं के तेज़ी से हो रहे बाज़ारीकरण को भी मरीज़ों की बढ़ती शिकायतों के लिए ज़िम्मेदार बताया है.
इनमें ज़रूरत से ज़्यादा बिल बनाना, ग़ैर-ज़रूरी जांच करवाना और बच्चे के जन्म जैसी सामान्य प्रक्रिया पर तेज़ी से बढ़ता ख़र्च शामिल है.
रिपोर्ट के मुताबिक़, इसका सीधा असर कमज़ोर परिवारों पर पड़ रहा है. वे भारी क़र्ज़ और परेशानी में फंस रहे हैं. कई परिवारों को इलाज के लिए अपनी संपत्ति तक बेचनी पड़ रही है.
सरकारी समिति ने दिए सुझाव

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इस हफ़्ते की शुरुआत में महाराष्ट्र के खाद्य और औषधि नियामक ने भी पाया कि अस्पतालों में आईवी यानी नस के ज़रिए दवा या तरल देने वाले सेट 2,800 प्रतिशत तक के हैरान करने वाले मुनाफ़े पर बेचे जा रहे थे.
इससे मेडिकल उपकरणों की क़ीमतों पर सवाल उठे हैं. नियामक के मुताबिक़, इनकी क़ीमतों पर लगभग कोई निगरानी नहीं है.
इन समस्याओं से निपटने के लिए सरकारी समिति ने कई सुझाव दिए हैं. इनमें से कुछ पर विवाद भी हो सकता है.
समिति ने सुझाव दिया है कि अस्पताल के कमरे का किराया उसके सबसे नज़दीकी तीन सितारा होटल के कमरे के किराये से ज़्यादा नहीं होना चाहिए.
सभी निजी अस्पतालों में ज़रूरी इलाज, जांच और आम मेडिकल प्रक्रियाओं की क़ीमत तय होनी चाहिए. ज़रूरत से ज़्यादा इलाज रोकने के लिए इलाज के तय नियम भी बनाए जाने चाहिए.
समिति ने अस्पतालों की चेन में 51 प्रतिशत से ज़्यादा विदेशी हिस्सेदारी पर भी चिंता जताई है. भारत के निजी अस्पतालों ने इनमें से कुछ सुझावों का विरोध किया है.

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भारत के निजी स्वास्थ्य क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था नेटहेल्थ के महासचिव सिद्धार्थ भट्टाचार्य ने बीबीसी को दिए बयान में कहा कि सरकार को इलाज की दरें तय करने के बजाय स्वास्थ्य सेवाएं देने की बुनियादी लागत कम करने पर ध्यान देना चाहिए.
इस लागत में टैक्स, ज़मीन, पूंजी, कर्मचारी और सरकारी नियमों का पालन करने पर होने वाला ख़र्च शामिल है.
उनके मुताबिक़, स्वास्थ्य सेवाओं के लिए बहुत अधिक पूंजी और निवेश की ज़रूरत होती है. इस क्षेत्र में लगाई गई पूंजी पर मिलने वाला रिटर्न क़रीब 10 प्रतिशत रहता है.
यह अर्थव्यवस्था के कई दूसरे क्षेत्रों से काफ़ी कम है, जहां पूंजी पर मिलने वाला रिटर्न इससे डेढ़ से ढाई गुना अधिक होता है.
उन्होंने अस्पताल के कमरे के किराये की तुलना होटल के कमरे के किराये से करने को लेकर भी चेतावनी दी.
उन्होंने कहा कि ऐसी तुलना करते समय उन ज़रूरी नियमों को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है, जिनका अस्पतालों को पालन करना पड़ता है.
इनमें संक्रमण रोकने के मानक और मरीज़ों की सुरक्षा से जुड़े नियम शामिल हैं. इन सब पर ख़र्च होता है.
मैक्स हेल्थकेयर से लेकर फ़ोर्टिस तक, देश की सबसे बड़ी अस्पताल कंपनियों ने चेतावनी दी है कि मनमाने ढंग से लगाई गई ऐसी सीमा स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश को "रोक देगी".
अगर विदेशी निवेशकों को अपने पैसे पर बिना जोखिम वाला रिटर्न नहीं मिला, तो वे भी निवेश करने से पीछे हट सकते हैं.
लेकिन जन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के निजी स्वास्थ्य क्षेत्र में क़ीमतें तय करने के नियमों पर बहस ज़रूर होनी चाहिए.
इसकी वजह यह है कि इस समय भारत में निजी स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह बेचने वालों के हिसाब से चल रही हैं. यानी क़ीमत तय करने में अस्पतालों और इलाज देने वाली कंपनियों की भूमिका सबसे ज़्यादा है.
पब्लिक हेल्थ फ़ाउंडेशन ऑफ़ इंडिया के डॉक्टर श्रीनाथ रेड्डी ने बीबीसी से कहा, "बड़ी विदेशी प्राइवेट इक्विटी कंपनियों का पैसा ख़ासकर गंभीर और विशेष इलाज वाले अस्पतालों में आ रहा है. ऐसे में इलाज की क़ीमत से जुड़े फ़ैसले मूल रूप से देश के बाहर बैठे लोग कर रहे हैं. ऐसा नहीं होना चाहिए."
स्वास्थ्य नीति के एक अन्य विशेषज्ञ विवेक एनडी ने कहा कि सरकार का दख़ल इसलिए भी ज़रूरी है, क्योंकि इनमें से कई अस्पताल बहुत ज़्यादा मुनाफ़ा कमा रहे हैं.
उन्होंने कहा, "इन अस्पतालों में तरह-तरह के टेस्ट कराने पर बढ़ता ज़ोर और ऐसी जांच कराने के लिए दबाव डालना, जिनकी शायद ज़रूरत भी न हो, इसकी भी जांच होनी चाहिए."
विवेक के मुताबिक़, समिति के कुछ सुझाव निजी इलाज का ख़र्च कम करने में मदद कर सकते हैं. इनमें वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी की अधिक न्यायसंगत व्यवस्था का सुझाव शामिल है.
हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि किसी सुझाव को अनिवार्य बनाने से पहले स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े लोगों के साथ बड़े स्तर पर बातचीत होनी चाहिए.
डॉक्टर रेड्डी भी इससे सहमत हैं. उन्होंने कहा कि सरकार मनमाने ढंग से इलाज की क़ीमत तय करे, उससे पहले यह पता लगाने की ज़रूरत है कि देश भर में निजी इलाज पर वास्तव में कितना ख़र्च आता है.
उन्होंने कहा, "इलाज का ख़र्च हर राज्य और हर शहर में अलग होगा. इसलिए पूरे देश में एक जैसी सीमा लागू नहीं की जा सकती."
भारत को 300 अरब डॉलर के अतिरिक्त निवेश की ज़रूरत

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विशेषज्ञों का कहना है कि मरीज़ों का ख़र्च कम करने के लिए सबसे ज़्यादा ज़ोर सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को मज़बूत करने पर होना चाहिए. सरकारी समिति ने भी यही सुझाव दिया है.
भारत सरकार इस समय स्वास्थ्य सेवाओं पर देश के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का 1.4 प्रतिशत ख़र्च करती है.
यह क़रीब एक दशक पहले राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में तय किए गए 2.5 प्रतिशत के लक्ष्य से कम है. डब्ल्यूएचओ ने इसके लिए पांच प्रतिशत की सलाह दी है और भारत का ख़र्च उससे भी काफ़ी पीछे है.
सरकारी समिति की रिपोर्ट में भी कहा गया है कि सामान्य और गंभीर बीमारियों के इलाज पर सरकार का ख़र्च ज़रूरत के मुक़ाबले बहुत कम है.
इसी वजह से लोगों को महंगे निजी अस्पतालों में जाना पड़ता है और इलाज के लिए अपनी जेब से इतना ख़र्च करना पड़ता है कि वे गंभीर आर्थिक संकट में फंस जाते हैं.
विवेक ने कहा कि आम लोगों की निजी अस्पतालों पर निर्भरता कम करने के लिए सरकार को अपनी कोशिशें बढ़ानी होंगी और सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में अधिक निवेश करना होगा.
लेकिन सच्चाई यह भी है कि भारत को इलाज की क्षमता बढ़ाने के लिए क़रीब 300 अरब डॉलर के अतिरिक्त निवेश की ज़रूरत है.
इस रकम का बड़ा हिस्सा घरेलू और विदेशी निजी निवेशकों से ही आने की संभावना है.
ऐसे में नीति बनाने वालों के सामने दोहरी चुनौती है. उन्हें यह भी देखना है कि निवेशक इस क्षेत्र को छोड़कर न जाएं और यह भी सुनिश्चित करना है कि ज़रूरी स्वास्थ्य सेवाएं आम लोगों की पहुंच से बाहर न हो जाएं.
हमने इस लेख का अनुवाद करने में एआई की मदद ली है, जिसे मूल रूप से अंग्रेज़ी में लिखा गया था. बीबीसी के एक पत्रकार ने प्रकाशन से पहले इस अनुवाद की जांच की. हम एआई का उपयोग कैसे कर रहे हैं, इसके बारे में और जानें.
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