आंदोलन ने जो सबक दिया, उससे शायद न सत्ता सीखेगी और न विपक्ष: प्रोफ़ेसर सुहास पलशिकर

शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े की मांग को लेकर हुए हालिया छात्र आंदोलन को प्रोफ़ेसर सुहास पलशिकर हाल के वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक घटनाओं में से एक मानते हैं.
उनका मानना है कि इस आंदोलन में सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए एक सीख है मगर दोनों से ही उन्हें उम्मीद नहीं है कि वे अपने रुख़ में कोई बदलाव ला सकेंगे.
बीबीसी मराठी की संवाददाता प्राची प्रतिभा शिरीष को दिए एक इंटरव्यू में राजनीतिक विश्लेषक प्रोफ़ेसर सुहास पलशिकर ने कहा है कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा केवल डैमेज कंट्रोल नहीं, बल्कि एक टर्निंग प्वाइंट है.
उनका मानना है कि नीट पेपर लीक के ख़िलाफ़ शुरू हुआ यह आंदोलन कई वर्षों बाद ऐसा ग़ैर-राजनीतिक जनआंदोलन बना, जिसने सरकार को प्रतिक्रिया देने और कदम उठाने के लिए मजबूर किया.
नीट पेपर लीक मामले में धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व में दिल्ली के जंतर-मंतर पर स्टूडेंट्स ने प्रदर्शन किया था. इसके बाद 25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान ने शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफ़ा दे दिया था.
पलशिकर का कहना है कि यह आंदोलन सिर्फ़ युवाओं की बड़ी भागीदारी के कारण महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इसलिए भी कि यह देश के कई शहरों और क्षेत्रों में फैला.
इससे यह संदेश गया कि नागरिक संगठित होकर अपनी आवाज़ उठा सकते हैं और सरकार को जवाबदेह बना सकते हैं.
पलशिकर कहते हैं, "दिल्ली में जो होता है वो सिर्फ़ दिल्ली के लिए सीमित न रहते हुए पूरे देश में गूंज उठता है. इसका नतीजा यह है कि सब जगह छाए हुए डर को कम करने में मदद हो गई कि हम नागरिक हैं, हमें डरने की जरूरत नहीं है. ये विचार मेरे समझ में बहुत आसानी से सब जगह अब फैलेगा इसलिए ये टर्निंग प्वाइंट है."
प्रोफ़ेसर सुहास पलशिकर का कहना है कि इस आंदोलन की याद और असर लोगों के मन में बने रहेंगे. यह उदाहरण के रूप में रहेगा कि नागरिक, ख़ासकर युवा, संगठित होकर अपनी बात प्रभावी ढंग से रख सकते हैं.
उनके अनुसार यह आंदोलन केवल नीट या पेपर लीक का परिणाम नहीं था. इसके पीछे युवाओं और आम लोगों के भीतर जमा व्यापक असंतोष और अनेक सामाजिक-आर्थिक कठिनाइयाँ भी थीं, जो इस मुद्दे के बहाने सामने आ गईं.

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वे इस आंदोलन को इसलिए महत्वपूर्ण मानते हैं क्योंकि यह किसी राजनीतिक दल से संचालित नहीं था. हजारों युवा स्वतः सड़कों पर उतरे, अपनी समस्याओं और भविष्य की चिंताओं को लेकर जुड़े.
वे कहते हैं कि डिजिटल मीडिया ने संदेश फैलाने में मदद की, लेकिन असली वजह युवाओं के भीतर पहले से मौजूद असंतोष और बदलाव की इच्छा थी.
वे बोले, "बात यह है कि इतने बच्चे रास्ते पर उतारने के लिए इसलिए तैयार हो गए क्योंकि वे किसी एक पार्टी के नहीं थे. वे सिर्फ़ अपना विचार, अपनी कठिनाइयां और शायद अपने घरवालों की भी कठिनाइयां देख के इसमें आ रहे थे."
प्रोफ़ेसर सुहास पलशिकर का मानना है कि यह आंदोलन सरकार और विपक्ष दोनों के लिए एक सबक है. मगर वे कहते हैं कि सरकार से इससे जुड़े सबक लेने की उम्मीद कम है.
पलशिकर कहते हैं, "यह ऐसी सरकार है कि जो पॉलिसी और रणनीति के बजाय टेक्टिक्स में ज्यादा दिलचस्पी रखती है. उनको लगता है कि इससे लोगों को गुमराह करने से या लोगों को दबाकर काम चल जाता है. तो वो शायद सबक नहीं सीखेगी."
वे यहां तक कहते हैं कि "सरकार शायद यह करना चाहेगी कि जिन्होंने ये सब किया उनको हम कैसे सबक सिखाएंगे."
विपक्षी दलों को लेकर वे कहते हैं कि उनकी दिलचस्पी आपस में लड़ने में रहती है. "उनको अभी तक यह समझ नहीं आ रहा है कि एक ऐसे क्षण में हम जी रहे हैं."
उनका कहना है कि विपक्ष को अपनी पार्टी की प्राथमिकता से ऊपर उठकर एक बड़ा गठबंधन बनाना चाहिए, वे कहते हैं, "मैं किसी राजनीतिक गठबंधन की बात नहीं कर रहा हूं, यह एक मेंटल कोलिजन होना चाहिए जैसा कि इन बच्चों ने बनाया."

वे कहते हैं, "आप देखिए ये बच्चे कौन थे, कौन से दल के थे, कौन से जाति या धर्म के थे, इसका कोई पता नहीं है. लेकिन उनकी एक बड़ा गठबंधन बन गया."
उन्होंने कहा कि यह नकारात्मक बात लग सकती है मगर हमारे विपक्षी दल एक ऐसे संकट से गुज़र रहे हैं जहां कुछ सीखने की उनकी क्षमता बहुत कम हो गई है. .
प्रोफ़ेसर सुहास पलशिकर ने क्षेत्रीय विपक्षी दलों के बीच टूट के संकट की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि जब दिल्ली में युवा आंदोलन कर रहे थे तो उसके बैकग्राउंड में राजनीतिक दलों का बड़ा हिस्सा सत्ता समीकरण साधने और दल-बदल की राजनीति में लगा था. वे कहते हैं कि पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि बेहद विडंबनापूर्ण और भावनात्मक है.
पलशिकर का कहना है, "जब बच्चे लाठियां खा रहे थे तो बंगाल की एक पार्टी के सांसद दूसरे पार्टी में जा रहे थे. इसी समय महाराष्ट्र की एक दल के लोग कह रहे थे कि शायद परिसीमन में हम सरकार से कुछ जोड़-गांठ कर लें. डीएमके कह रहा था कि हम शायद इश्यू बेस्ड सपोर्ट देने का सोचेंगे. अगर सब पार्टियां ऐसे लगी हुई हैं तो फिर उनसे क्या उम्मीद रखें."
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