You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
ईरान और अमेरिका के बीच डील कराकर पाकिस्तान को क्या होगा फ़ायदा?
- Author, असद सोहैब
- पदनाम, बीबीसी उर्दू, इस्लामाबाद
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 10 मिनट
जहां एक ओर अमेरिका और ईरान के बीच समझौते की घोषणा का वैश्विक स्तर पर स्वागत किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर दोनों देशों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने के लिए पाकिस्तान की भी प्रशंसा की जा रही है.
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने कहा है कि पाकिस्तान 19 जून को स्विट्ज़रलैंड में शांति समझौते पर हस्ताक्षर समारोह की मेज़बानी भी करेगा.
शहबाज़ शरीफ़ के इस बयान के बाद कि एक शांति समझौता हो गया है, ब्रिटेन, चीन, ऑस्ट्रेलिया, तुर्की, क़तर, सऊदी अरब, कनाडा, इटली, नीदरलैंड्स, मलेशिया और कुवैत के प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों ने पाकिस्तान का नाम लेते हुए मध्यस्थता प्रयासों में शामिल अन्य देशों को भी धन्यवाद दिया.
संयुक्त राष्ट्र महासचिव द्वारा जारी बयान में पाकिस्तान की भूमिका की भी सराहना की गई.
गौरतलब है कि रविवार और सोमवार की रात के बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने अमेरिका और ईरान के बीच एक समझौते के निष्कर्ष की घोषणा की.
उन्होंने कहा कि लंबी बातचीत के बाद, अमेरिका और ईरान के बीच एक शांति समझौता हुआ और दोनों पक्षों ने लेबनान सहित सभी मोर्चों पर सैन्य अभियानों को तत्काल और स्थायी रूप से समाप्त करने की घोषणा की.
अमेरिकी राष्ट्रपति और विदेश मंत्री ईरान के साथ बातचीत में पाकिस्तान को केंद्रीय मध्यस्थ बताते रहे हैं और उन्होंने कई मौकों पर पाकिस्तानी नेताओं की प्रशंसा भी की है, जबकि ईरान ने भी अतीत में कई बार पाकिस्तान की भूमिका की सराहना की है.
मार्च में, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा था कि "पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ और फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर के साथ अपनी बातचीत के आधार पर, मैं दो सप्ताह के लिए ईरान पर बमबारी और हमले निलंबित कर रहा हूं."
इसके बाद पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने भी अमेरिकी राष्ट्रपति और ईरानी नेतृत्व को इस समझौते के लिए धन्यवाद दिया और उन्हें इस्लामाबाद में वार्ता के लिए आमंत्रित किया.
यह वह समय था जब पाकिस्तान कूटनीतिक स्तर पर एक महत्वपूर्ण देश के रूप में उभरा और फिर इस्लामाबाद वार्ता की मेज़बानी को पाकिस्तान के लिए एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि घोषित किया गया.
लेकिन इन सबके बीच ये सवाल भी उठ रहे हैं: क्या वैश्विक कूटनीतिक परिदृश्य पर उभरकर सामने आया पाकिस्तान इस शांति समझौते के बाद अपनी स्थिति बरक़रार रख पाएगा? क्या पाकिस्तान ने वैश्विक आर्थिक और कूटनीतिक निर्णय लेने में अपनी स्थिति मज़बूत की है, और क्या पाकिस्तान की हाल ही में सुधरती वैश्विक प्रतिष्ठा देश के लिए अल्पकालिक और दीर्घकालिक आर्थिक और कूटनीतिक लाभ भी लाएगी?
बीबीसी ने विशेषज्ञों से इन मुद्दों पर चर्चा करने के लिए बात की.
पाकिस्तान ने क्या अपनी राजनयिक स्थिति को स्वीकार किया?
सोमवार (15 जून) को नेशनल असेंबली में बोलते हुए प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने अमेरिका-ईरान समझौते के बारे में कहा, "आज का दिन न केवल पाकिस्तान में रहने वालों बल्कि दुनिया भर में रहने वाले पाकिस्तानियों के लिए भी गर्व का दिन है."
शहबाज़ शरीफ़ ने कहा कि पाकिस्तानी सरकार ईरान और अमेरिका के बीच हुए शांति समझौते के परिणामस्वरूप उत्पन्न वैश्विक आर्थिक स्थिरता के लाभ हर एक पाकिस्तानी नागरिक तक पहुंचाएगी.
शहबाज़ शरीफ़ ने कहा कि बातचीत के दौरान कई ऐसे मौके़ आए जब ऐसा लगा कि मामला ख़त्म हो जाएगा, "लेकिन फ़ील्ड मार्शल ने हिम्मत नहीं हारी, जिसके परिणामस्वरूप कल रात यह घोषणा की गई."
इस संदर्भ में, लेखक और विश्लेषक ज़ाहिद हुसैन कहते हैं कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि पाकिस्तान ने हाल के दिनों में राजनयिक पहुंच हासिल की है, लेकिन यह कहना संभव नहीं है कि उसे स्थायी 'शांतिदूत' का दर्जा प्राप्त होगा.
बीबीसी उर्दू से बात करते हुए उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की राजनयिक पहल का कारण ट्रंप प्रशासन और ईरान का भरोसा है. उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान को इस बात का भी लाभ मिला कि क्षेत्र के अन्य देशों के विपरीत, वह संघर्ष में भागीदार नहीं था, जबकि क्षेत्र के अन्य देश किसी न किसी रूप में संघर्ष में शामिल थे.
ज़ाहिद हुसैन कहते हैं, "एक तरह से हम कह सकते हैं कि क़तर को वैश्विक मंच पर एक स्थायी मध्यस्थ का दर्जा प्राप्त है और उसने अतीत में कई देशों के बीच समझौतों और युद्धविरामों में मध्यस्थता की है."
उन्होंने कहा कि "पाकिस्तान की स्थिति को देखते हुए, इस मामले में मध्यस्थ की भूमिका निभाना उसके लिए संभव हो सकता था."
उन्होंने आगे कहा कि "असली मुद्दा परमाणु वार्ता है और यह बहुत जटिल है, इसलिए यह मान लेना जल्दबाज़ी होगी कि यह मुद्दा स्थायी रूप से हल हो गया है. इसलिए, पाकिस्तान दोनों पक्षों को बातचीत के लिए मजबूर करने की स्थिति में नहीं है."
उन्होंने कहा, "आज की दुनिया में कोई भी देश स्थायी शांतिदूत नहीं बन सकता. हालांकि, कुछ परिस्थितियों में ऐसा ज़रूर होता है कि कोई देश महत्वपूर्ण हो जाता है, जैसा कि पाकिस्तान के मामले में है."
ज़ाहिद हुसैन ने यह भी कहा कि पाकिस्तान की मध्यस्थता के ज़रिए अमेरिका और ईरान जिस बात पर सहमत हुए हैं, वह एक ढांचा है जिस पर अगले 60 दिनों में और चर्चा की जाएगी, इसलिए इसे अभी पूर्ण शांति समझौता नहीं कहा जा सकता है.
पाकिस्तान को इससे क्या फ़ायदे हो सकते हैं?
पूर्व राजनयिक आक़िल नदीम भी ज़ाहिद हुसैन से सहमत हैं. वह कहते हैं कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि शांति समझौते के समारोह की मेज़बानी से पाकिस्तान की वैश्विक प्रतिष्ठा में और वृद्धि होगी, लेकिन इस पूरे मुद्दे को पाकिस्तान की समस्याओं का समाधान कहना भी उचित नहीं है.
बीबीसी उर्दू से बात करते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि ईरान पर लगे प्रतिबंध पूरी तरह से हटा दिए जाएंगे, "लेकिन अल्पावधि लाभ के रूप में, यह निश्चित रूप से संभव है कि ईरान पर लगे प्रतिबंधों में ढील के कारण पाकिस्तान और ईरान के बीच द्विपक्षीय व्यापार में वृद्धि होगी."
उनके अनुसार, "यह उम्मीद करना संभव नहीं है कि इस मध्यस्थता के चलते ईरान हमें मुफ्त में तेल देगा. हां, यह निश्चित रूप से संभव है कि वह पाकिस्तान को कम कीमतों पर तेल उपलब्ध करा सकता है, लेकिन यह भी तभी संभव होगा जब ईरान पर लगे प्रतिबंध पूरी तरह से हटा दिए जाएंगे."
ज़ाहिद हुसैन का कहना है कि इस युद्ध का प्रभाव पूरी दुनिया में महसूस किया गया और स्वाभाविक रूप से पाकिस्तान भी इससे प्रभावित हुआ. और अगर स्थायी शांति स्थापित होती है, तो इसका पाकिस्तान पर भी अल्पकालिक सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है.
उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की ईरान के साथ 900 किलोमीटर लंबी सीमा है और अगर ईरान पर लगे प्रतिबंध हटा दिए जाते हैं, तो इससे निश्चित रूप से पाकिस्तान को फ़ायदा होगा.
"पाकिस्तान ईरान के साथ कुछ व्यापार कर रहा था, लेकिन गैस पाइपलाइन सहित कुछ अन्य महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर काम अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण रुक गया था, इसलिए यह फिर से शुरू हो सकता है."
यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन एक पुरानी परियोजना है.
पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के शासनकाल के अंतिम दिनों में तत्कालीन राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी द्वारा 2013 में ईरान यात्रा के दौरान उद्घाटन किए जाने पर इसमें महत्वपूर्ण प्रगति हुई थी. हालांकि, उसके बाद इसमें कोई ख़ास प्रगति नहीं हुई.
अमेरिका ने ईरान पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का हवाला देते हुए इस परियोजना पर आपत्ति जताई.
ज़ाहिद हुसैन का कहना है कि अगर ईरान पर लगे प्रतिबंध हटा दिए जाते हैं, तो इससे पाकिस्तान को बहुत फ़ायदा होगा क्योंकि पाकिस्तान में गैस की कमी है और यह लगातार महंगी भी होती जा रही है.
ऑस्ट्रेलिया स्थित विदेश नीति विश्लेषक मुहम्मद फ़ैसल का कहना है कि पिछले एक साल में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की प्रतिष्ठा में काफ़ी सुधार हुआ है, और इसके तात्कालिक परिणाम काफ़ी हद तक राजनीतिक, राजनयिक, सुरक्षा और आर्थिक होंगे.
बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा कि इससे क्षेत्रीय शक्ति के रूप में पाकिस्तान की स्थिति मज़बूत होगी जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है, लेकिन इससे पाकिस्तान की मूलभूत आर्थिक समस्याओं का समाधान नहीं होगा.
इससे निश्चित रूप से अनुकूल परिस्थितियां बनेंगी ताकि सक्रिय भागीदारी के माध्यम से कुछ आर्थिक और ऊर्जा संबंधी चुनौतियों का समाधान किया जा सके.
उन्होंने कहा कि जीएसपी प्लस के विस्तार की संभावनाएं अब अधिक उज्ज्वल हैं. "अमेरिका के साथ व्यापार समझौता जारी रहेगा. आईएमएफ़ से संबंधित किसी भी मुद्दे को वॉशिंगटन के समर्थन से हल किया जा सकता है. पाकिस्तान पश्चिमी वित्तीय बाज़ारों तक पहुंच बना सकेगा. खाड़ी में सुरक्षा मुद्दों पर सऊदी अरब और तुर्की के साथ समन्वय में पाकिस्तान की भूमिका और भी महत्वपूर्ण होगी."
मुहम्मद फ़ैसल का कहना है कि उन्हें पाकिस्तान के मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व और अधिकारियों की इस अवसर को देश के लिए दीर्घकालिक लाभ में बदलने की क्षमता पर ज़्यादा भरोसा नहीं है.
उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की व्यवस्था अस्थायी तौर पर 'ख़ुशनुमा' माहौल बनाने में तो माहिर है, लेकिन उसे लंबे समय तक बनाए रखने में विफल रहती है.
मुहम्मद फ़ैसल का मानना है कि आंतरिक राजनीति को ठीक किए बिना, आर्थिक और प्रशासनिक सुधारों को लागू किए बिना, प्रांतों और संघ के बीच संबंधों को पुनर्परिभाषित किए बिना और स्थानीय सरकारों की स्थापना किए बिना दीर्घकालिक लाभ प्राप्त नहीं किए जा सकते हैं.
'अब्राहम समझौता पाकिस्तान की लक्ष्मण रेखा होगी'
आक़िल नदीम का कहना है कि शांति समझौते के बाद, अमेरिकी राष्ट्रपति एक बार फिर देशों से अब्राहम समझौते में शामिल होने के लिए कह सकते हैं, और यह पाकिस्तान के लिए एक तरह की 'रेड लाइन' है.
गौरतलब है कि पिछले महीने ईरान के मुद्दे पर खाड़ी देशों, तुर्की, मिस्र और पाकिस्तान के नेताओं के साथ टेलीफ़ोन पर हुई बातचीत के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा था कि इस "जटिल मुद्दे" को सुलझाने के बाद "सभी देशों को कम से कम संयुक्त रूप से अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर करने चाहिए."
लेकिन पाकिस्तान हमेशा से यह कहता रहा है कि "पाकिस्तान तब तक इसराइल को मान्यता नहीं देगा जब तक कि फ़लस्तीन मुद्दे का कोई न्यायसंगत समाधान नहीं मिल जाता और वह समाधान फ़लस्तीनी लोगों को स्वीकार्य नहीं होता."
सऊदी अरब और क़तर सहित कुछ अन्य मुस्लिम देशों का भी यही रुख़ है.
आक़िल नदीम का कहना है कि अब्राहम समझौते में शामिल होने के बदले पाकिस्तान को रियायतें दी जा सकती हैं, लेकिन भले ही यह युद्ध समाप्त हो जाए, पाकिस्तान की राजनयिक सफलता के अलावा, उसे बहुत अधिक आर्थिक लाभ नहीं मिल पाएंगे.
कूटनीतिक स्तर पर, पाकिस्तान हमेशा से चाहता रहा है कि अमेरिका और अन्य विश्व शक्तियां कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के रुख़ का समर्थन करें. तो क्या इस विवाद के बाद ये देश अब पाकिस्तान की ओर झुक सकते हैं?
आक़िल नदीम ने कहा कि अमेरिका और यूरोपीय देशों के भारत में आर्थिक हित हैं, और हालांकि अमेरिका और भारत के बीच संबंध वर्तमान में निम्न स्तर पर हैं, फिर भी वे कश्मीर विवाद पर अपने पुराने रुख़ को बनाए रखेंगे.
आक़िल नदीम का कहना है कि अगर रिपब्लिकन पार्टी मध्यावधि चुनाव हार जाती है, तो राष्ट्रपति ट्रंप कमज़ोर हो जाएंगे और उसके बाद पाकिस्तान और अमेरिका के बीच संबंधों का स्वरूप वैसा नहीं रहेगा जैसा कि फ़िलहाल है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.