शेखर सुमन का डिजिटल स्क्रीन पर डेब्यू किस वजह से है चर्चा में

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"पिछले दिनों डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि उन्होंने आठ युद्ध रुकवाए हैं, लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि उन्होंने करवाए कितने हैं."
"यह कॉकरोच भी अजीब प्राणी है, कहीं भी पहुंच जाता है. अब देखिए, पिछले दिनों दिल्ली पहुंच गया... एक ख़बर यह भी है कि दोपहर 3 बजकर 3 मिनट पर कॉकरोच का मुखिया दिल्ली की तपती लू की वजह से औंधा हो गया. अब बताइए, अमेरिका से आए कॉकरोच दिल्ली की गर्मी नहीं झेल पा रहे हैं. हालांकि यह भी सच है कि दिल्ली भी इन दिनों अमेरिका की गर्मी झेल नहीं पा रही है."
ये पंक्तियां अभिनेता, निर्माता, निर्देशक और टीवी होस्ट शेखर सुमन के कार्यक्रम से हैं.
हाल के दिनों में वह अपने नए शो 'शेखर टुनाइट' को लेकर चर्चा में हैं. सोशल मीडिया पर इस शो के कई वीडियो वायरल हुए हैं.
इस शो का फ़ॉर्मैट लेट-नाइट टॉक शो की तर्ज़ पर तैयार किया गया है. शो में वह व्यंग्यात्मक मोनोलॉग के बाद मेहमानों से बातचीत करते हैं.
शुरुआती एपिसोड्स में उन्होंने केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, अभिनेता बॉबी देओल, अली फ़ज़ल और मनोज बाजपेयी के अलावा अमृता फडणवीस जैसे मेहमानों का इंटरव्यू किया है.
'शेखर टुनाइट' की चर्चा इसलिए भी हो रही है क्योंकि इसके ज़रिए शेखर सुमन ने कई वर्षों बाद एक प्रमुख होस्ट और व्यंग्यकार के रूप में स्क्रीन पर वापसी की है.
एक समय टेलीविज़न पर अपने व्यंग्यात्मक कार्यक्रमों और होस्ट के लिए पहचाने जाने वाले शेखर सुमन अब डिजिटल माध्यम से नए दर्शकों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं.
छोटे पर्दे से पहचान बनाने का सफ़र

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पटना में जन्मे शेखर सुमन ने अपने करियर की शुरुआत 1985 में फ़िल्म 'उत्सव' से की थी.
फ़िल्म में वह अभिनेत्री रेखा के साथ दिखे थे लेकिन जल्द ही उन्होंने बड़े पर्दे की जगह छोटे पर्दे को अपना कार्य क्षेत्र चुन लिया.
वह दूरदर्शन के कई शो का चेहरा बन गए. 'देख भाई देख', 'रिपोर्टर', 'वाह जनाब', 'छोटे बाबू', 'अमर प्रेम' आदि शो में उन्होंने अपने अभिनय का लोहा मनवाया.
साथ ही वह 'ग्रेट इंडियन कॉमेडी शो', 'डायल वन और जीतो', 'कॉमेडी सर्कस' जैसे कई शो का भी हिस्सा रहे.
1990 और 2000 के दशक में शेखर सुमन उन चुनिंदा टीवी चेहरों में शामिल थे जिन्होंने राजनीतिक व्यंग्य, सेलिब्रिटी इंटरव्यू और मनोरंजन को एक साथ पेश किया.
उनका शो 'मूवर्स एंड शेकर्स' उस दौर के सबसे चर्चित टॉक शोज़ में गिना जाता है.
'मेरी नक़ल करते हैं तो सबसे ज़्यादा मैं हँसता हूँ'

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बीबीसी के 'एक मुलाक़ात' कार्यक्रम में शेखर सुमन ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से जुड़ा एक क़िस्सा भी साझा किया था.
उन्होंने बताया कि एक बार वह एक उद्योगपति के बेटे की शादी में शामिल हुए थे, जहां वाजपेयी भी मौजूद थे.
शेखर सुमन के मुताबिक, उन्हें पता था कि वाजपेयी उनका कार्यक्रम देखते हैं और पसंद भी करते हैं. वह उनसे मिलना चाहते थे, लेकिन जब तक वह वहां पहुंचे, वाजपेयी अपनी गाड़ी में बैठ चुके थे.
उन्होंने बताया, "उस समय महाराष्ट्र के तत्कालीन उपमुख्यमंत्री छगन भुजबल उन्हें विदा करने के लिए खड़े थे. मुझे लगा कि जब उनका क़ाफ़िला वहां से गुज़रेगा तो वह भुजबल जी की ओर ज़रूर देखेंगे और मैं उन्हें नमस्कार कर लूंगा."
शेखर सुमन ने कहा कि जैसे ही वाजपेयी की नज़र उन पर पड़ी, उन्होंने गाड़ी रुकवा दी और उनके पास आ गए.
शेखर सुमन के अनुसार, वाजपेयी ने उनसे कहा, "हमें आप पर गर्व है. आप देश के बेहतरीन अभिनेताओं में से एक हैं. क्या अब भी मेरी नक़ल कर रहे हैं? यकीन मानिए, जब आप मेरी नक़ल करते हैं तो सबसे ज़्यादा मैं ही हंसता हूं."
राजनीतिक सफ़र

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शेखर सुमन ने राजनीति में भी अपनी किस्मत आज़माई, हालांकि उनका राजनीतिक सफ़र लंबा नहीं रहा.
साल 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर बिहार की पटना साहिब सीट से चुनाव लड़ा था.
इस चुनाव में उनका मुक़ाबला बीजेपी के उम्मीदवार और अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा से था. शेखर सुमन चुनाव जीतने में सफल नहीं रहे.
क़रीब 15 साल बाद, मई 2024 में शेखर सुमन ने बीजेपी की सदस्यता ली.
पार्टी में शामिल होने के दौरान उन्होंने कहा था, "ज़िंदगी में बहुत-सी चीज़ें अनजाने में होती हैं और कई बार आपको नहीं पता होता कि आपका भविष्य क्या है. ऊपर से एक संदेश आता है और फिर आप उसका पालन करते हैं. मैं ईश्वर का शुक्रिया अदा करूंगा कि उन्होंने मुझे यहां आने का संदेश दिया."
उन्होंने यह भी कहा था कि वह ऐसे समय में बीजेपी में शामिल हुए हैं जब उनके पास पेशेवर रूप से करने के लिए बहुत कुछ है.
उन्होंने कहा, "मैं 'हीरामंडी' के सफल होने का इंतज़ार कर रहा था. मैं नहीं चाहता था कि लोग यह कहें कि मेरे पास करने के लिए कुछ नहीं था, इसलिए मैं राजनीति में आया हूं."
हालांकि बीजेपी में शामिल होने के 24 घंटे के भीतर ही उन्होंने ख़ुद को उससे अलग कर लिया.
बाद में इस फै़सले पर सफ़ाई देते हुए शेखर सुमन ने कहा था कि उन्हें अपनी ग़लती का एहसास हो गया था.
सुमन कहते हैं, "मुझे लगा कि मैं किसी भी राजनीतिक दल से जुड़कर अपना काम नहीं कर सकता. इसलिए मैंने उसी समय पार्टी छोड़ दी. कभी-कभी ऐसा दबाव होता है, कुछ ऐसी बातें होती हैं जिसके तहत आदमी कुछ कर जाता है."
बेटे आयुष की बीमारी और दर्दभरा संघर्ष

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शेखर सुमन के परिवार में उनकी पत्नी अलका और बेटे अध्ययन हैं.
शेखर सुमन के सोशल मीडिया वीडियो की शुरुआत में 'टू माय लविंग सन आयुष' लिखा दिखाई देता है. आयुष उनके बड़े बेटे थे, जिनका कम उम्र में निधन हो गया था.
एबीपी न्यूज़ को दिए एक इंटरव्यू में शेखर सुमन ने अपने बेटे की बीमारी और निधन को याद करते हुए कहा था, "जब हमें आयुष की बीमारी के बारे में पता चला तो वह हमारे लिए बेहद बड़ा सदमा था. मेरे पिता खुद एक वरिष्ठ डॉक्टर थे, लेकिन वह अपने ही पोते को नहीं बचा सके. आयुष को ईएमएफ़ नाम की दुर्लभ हृदय संबंधी बीमारी थी."
सुमन कहते हैं, "कार्डियोलॉजिस्ट ने मुझसे कहा, 'वी आर रियली सॉरी, शेखर'."
"यह सुनते ही मेरी आंखों के सामने अंधेरा छा गया. मैंने रोते हुए डॉक्टर से पूछा कि उसके पास कितना समय है? डॉक्टर ने कहा कि अधिकतम आठ महीने. यह सुनकर मुझे लगा कि मुझे ही हार्ट अटैक आ जाएगा. जब मैं कमरे से बाहर निकला तो मेरे चेहरे को देखकर ही अलका रोने लगीं."
सुमन ने बताया कि बेटे को बचाने की उम्मीद में उन्होंने हर संभव प्रयास किया.
उनके शब्दों में, "ऐसा कोई मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा या संत नहीं था, जहां मैं न गया हूं. मैं अपने बेटे को इलाज के लिए अमेरिका और लंदन भी लेकर गया."
उन्होंने कहा कि ईएमएफ़ एक बेहद दुर्लभ बीमारी है, जो करोड़ों-अरबों लोगों में किसी एक को होती है. इस बीमारी में हृदय की लचक धीरे-धीरे ख़त्म होने लगती है.
सुमन बताते हैं, "डॉक्टरों ने कहा था कि आयुष अधिकतम आठ महीने तक ज़िंदा रह पाएगा, लेकिन ईश्वर की कृपा से वह चार साल तक हमारे साथ रहा. हालांकि बाद के दिनों में बीमारी के लक्षण लगातार बढ़ते गए. मेरी पत्नी अलका शायद उन माँओं में से एक थीं जिन्होंने ईश्वर से कहा होगा कि अब मेरे बच्चे को अपने पास बुला लो, क्योंकि उसका दर्द देखा नहीं जाता था."
उन्होंने आगे कहा, "आज भी वह दृश्य मेरी आंखों के सामने से नहीं जाता, जब मेरा बेटा बर्फ़ की सिल्लियों पर लेटा हुआ था. किसी भी माता-पिता के लिए इससे बड़ा दुख क्या हो सकता है कि उन्हें अपने ही बच्चे को कंधा देना पड़े. मुझे लगता था कि समय के साथ यह दर्द कम हो जाएगा, लेकिन यह और गहरा होता गया."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
























