जीडीपी ग्रोथ के आंकड़ों पर पूर्व वित्त सचिव सुभाष गर्ग का संदेह क्या वाक़ई तार्किक है?

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- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
मोदी सरकार में वित्त सचिव रहे सुभाष गर्ग कोई पहले अधिकारी नहीं हैं, जिन्होंने भारत की जीडीपी ग्रोथ के आँकड़ों पर संदेह जताया है.
अक्तूबर 2014 में जाने-माने अर्थशास्त्री अरविंद सुब्रमण्यम को भारत का मुख्य आर्थिक सलाहकार बनाया गया था. तब वित्त मंत्री अरुण जेटली थे. अरविंद सुब्रमण्यम ने जून 2018 में इस्तीफ़ा दे दिया था और अमेरिका शिफ़्ट हो गए थे.
जून 2019 में अरविंद सुब्रमण्यम ने एक रिसर्च पेपर जारी किया था. इसमें उन्होंने तर्क दिया था कि 2012 से 2017 के बीच भारत की जीडीपी ग्रोथ आधिकारिक आंकड़ों में दिखाई गई वृद्धि की तुलना में काफ़ी धीमी थी. तब भी सरकार ने इन निष्कर्षों को ख़ारिज कर दिया था.
सुब्रमण्यम ने अपने पेपर में कहा था, ''भारत ने 2011-12 के बाद की अवधि के लिए रियल जीडीपी का अनुमान लगाने के लिए अपने डेटा सोर्स और मेथड में बदलाव किया. इस बदलाव के कारण आर्थिक वृद्धि का आकलन काफ़ी ज़्यादा हुआ है.''
''आधिकारिक अनुमानों के मुताबिक 2011-12 से 2016-17 के बीच भारत की औसत वार्षिक जीडीपी ग्रोथ क़रीब सात प्रतिशत रही. मेरा अनुमान है कि वास्तविक वृद्धि क़रीब 4.5 प्रतिशत रही होगी. ग्रोथ के अधिक आकलन का एक हिस्सा मेथड में बदलाव से जुड़ा हो सकता है, जिसने फॉर्मल इन्फ़्रास्ट्रक्चर सेक्टर के आकलन को प्रभावित किया.''
सोमवार को इस वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) की जीडीपी ग्रोथ का डेटा जारी किया गया. वृद्धि दर 7.8% रही. यह पिछले साल की पहली तिमाही में दर्ज 6.9% से ज़्यादा है. इस डेटा पर संदेह न केवल विपक्ष जता रहा है बल्कि पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने भी जताया है. गर्ग मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में वित्त सचिव थे.
सुभाष चंद्र गर्ग की दलील है कि 7.8% रियल जीडीपी वृद्धि भ्रामक हो सकती है, क्योंकि संशोधित आँकड़ों ने पिछले वर्ष के जीडीपी और विभिन्न क्षेत्रों के आँकड़ों को काफ़ी कम कर दिया है, जिससे इस साल की वृद्धि के आकलन के लिए आधार छोटा हो गया है.

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सरकार का क्या कहना है?
वहीं सरकार ने 86.05 ट्रिलियन रुपए के अनुमान से तुलना को ग़लत बताया है और कहा है कि ये आँकड़े अलग-अलग जीडीपी सिरीज़ और आधार वर्ष में बदलाव के बाद की अलग-अलग मेथड से जुड़े हैं.
मिनिस्ट्री ऑफ स्टैटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इंप्लीमेंटेशन ने बताया कि अप्रैल-जून 2026 में रीयल जीडीपी में 7.8% की वृद्धि हुई, जबकि नॉमिनल जीडीपी 10.3% बढ़ी. वित्तीय वर्ष 2026–27 की पहली तिमाही के लिए मौजूदा क़ीमतों पर जीडीपी का अनुमान ₹88.27 लाख करोड़ लगाया गया है, जबकि संशोधित वित्तीय वर्ष 2025–26 की पहली तिमाही का आंकड़ा ₹80 लाख करोड़ है.
सुभाष गर्ग इस नतीजे पर सवाल उठाते हैं, क्योंकि जब वित्त वर्ष 2026–27 की पहली तिमाही के 88.27 ट्रिलियन रुपए की तुलना वित्त वर्ष 2025–26 की पहली तिमाही के पहले जारी किए गए 86.05 ट्रिलियन रुपए के नॉमिनल जीडीपी से की जाती है, तो वृद्धि केवल क़रीब 2.6% बैठती है, 10.3% नहीं. गर्ग का कहना है कि महंगाई को ध्यान में रखने के बाद इसका मतलब बहुत कम या कोई वास्तविक वृद्धि नहीं भी हो सकती है.
नॉमिनल जीडीपी यानी किसी देश में एक साल में बनी सभी वस्तुओं और दी गई सेवाओं की कुल क़ीमत, उस समय की मौजूदा कीमतों पर निकालना.
यानी इसमें महंगाई का असर भी शामिल होता है.

अगस्त 2025 में मिनिस्ट्री ऑफ स्टैटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इंप्लीमेंटेशन ने वित्त वर्ष 2025–26 की पहली तिमाही के नॉमिनल जीडीपी का अनुमान ₹86.05 लाख करोड़ लगाया था और वास्तविक वृद्धि 7.8% बताई थी. बाद में वित्त वर्ष 2025–26 की पहली तिमाही का नॉमिनल जीडीपी 80 ट्रिलियन रुपए और वास्तविक वृद्धि 6.9% बताई गई थी.
गर्ग का तर्क है कि पिछले साल के जीडीपी के आधार को कम करने से मौजूदा वर्ष की साल-दर-साल वृद्धि दर ज़्यादा दिखाई देती है.
सरकार का कहना है कि 86.05 ट्रिलियन रुपए का अनुमान पुराने आधार वर्ष 2011–12 वाली जीडीपी सिरीज़ का हिस्सा था, जबकि नया अनुमान संशोधित 2022–23 आधार वर्ष वाली सिरीज़, अपडेट किए गए सोर्स डेटा और संशोधित मेथड पर आधारित है. सरकार का कहना है कि पुरानी और नई सिरीज को समान आधार मानकर वृद्धि का आकलन नहीं करना चाहिए.

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सुभाष चंद्र गर्ग के तर्क को कैसे देखा जाना चाहिए?
नेशनल स्टैटिस्टिकल कमीशन यानी एनएससी से कार्यकारी अध्यक्ष रहे पीसी मोहनन भी सुभाष गर्ग के तर्कों से सहमत नहीं हैं.
मोहनन ने बीबीसी हिन्दी से कहा, ''जब हमारा जीडीपी रिवीजन हुआ था, तो नए संशोधित बेस ईयर में कुल जीडीपी लेवल थोड़ा नीचे हो गया था. 2022-23, 2023-24 और 2024-25 में नई बेस ईयर सिरीज़ में हमारी जीडीपी कुछ कम हुई है. इसी वजह से हमने कहा था कि भारत का तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनना, या चार ट्रिलियन और पाँच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनना, अभी संभव नहीं दिखता, क्योंकि पुराने बेस ईयर के मुक़ाबले हमारी जीडीपी अब कम है. इसलिए सुभाष गर्ग ने जो कहा है, उसमें जीडीपी के बेस ईयर में हुए बदलाव को ध्यान में नहीं रखा गया है.''
मोहनन कहते हैं, ''अगर वे जीडीपी बेस ईयर का ठीक से हिसाब करते, तो उन्हें 2.6 प्रतिशत नहीं, 7.8 प्रतिशत ही वृद्धि दर मिलती. उन्होंने पुराने बेस ईयर की पहली तिमाही का अनुमान लिया है, जबकि यह नहीं देखा कि पूरी प्रक्रिया संशोधित हो चुकी है. वे पुराने बेस ईयर के जीडीपी की पहली तिमाही को नए बेस ईयर की पहली तिमाही से तुलना कर रहे हैं. यह सही नहीं है."

पीसी मोहनन कहते हैं कि इस सरकार में पारदर्शिता की कमी ज़रूर रही है क्योंकि जब बेस ईयर संशोधित हुआ, तो उसकी पूरी जानकारी अब तक सार्वजनिक नहीं की गई.
लेकिन अरविंद सुब्रमण्यम ने भी जीडीपी डेटा पर संदेह किया था. इस पर पीसी मोहनन कहते हैं, ''दोनों के संदेह में थोड़ा अंतर है. सुभाष गर्ग ने जो उदाहरण दिया है कि ग्रोथ रेट 2.6 प्रतिशत है, वह मेथड के हिसाब से सही नहीं है. लेकिन अरविंद सुब्रमण्यम का तर्क अलग है. उनका तर्क मेथड और तकनीकी मुद्दों से जुड़ा था. उनका मुद्दा इन्फ़्रास्ट्रक्चर सेक्टर की जीडीपी के लिए अपनाई गई मेथड से जुड़ा था. यानी अलग-अलग स्रोतों के डेटा को कैसे मिलाया जा रहा है.''
इसी साल जून में अरविंद सुब्रमण्यन ने ब्रिटिश अख़बार फ़ाइनैंशियल टाइम्स से कहा था, "नई सिरीज़ निश्चित रूप से नए और ज़्यादा विश्वसनीय डेटा सोर्स के इस्तेमाल के लिहाज से एक सुधार है. लेकिन इसमें मैन्युफैक्चरिंग डिफ्लेटर, जो नकारात्मक था और इंपोर्ट डिफ्लेटर, जिसमें तीन वर्षों के दौरान काफ़ी उतार-चढ़ाव दिखा, के इस्तेमाल से उलझन बढ़ती है. इन दोनों डिफ्लेटरों में दिखने वाले कुछ हद तक अस्पष्ट उतार-चढ़ाव के कारण अंतिम निष्कर्ष निकालना मुश्किल है."
पहले एनुअल सर्वे ऑफ इंडस्ट्रीज के एक ही स्रोत से डेटा तैयार किया जाता था. अब कॉरपोरेट मंत्रालय के डेटा पर ज़्यादा निर्भरता है. इसके अलावा इनपुट और आउटपुट के लिए अलग-अलग डिफ्लेशन करने वाली डबल डिफ्लेशन मेथड भी अपनाई जा रही है.
ये सभी नई मेथड हैं और अरविंद सुब्रमण्यम ने इन मुद्दों पर सवाल उठाए थे. उन्होंने यह भी कहा था कि रीयल मेथड को लेकर पारदर्शिता की कमी है. मसलन, डिफ्लेटर तैयार करने के लिए कौन-सा डेटा इस्तेमाल किया जा रहा है. इसकी जानकारी अभी भी पब्लिक डोमेन में नहीं है. इसी वजह से अरविंद सुब्रमण्यम ने ये चिंताएँ उठाई थीं.
पीसी मोहनन मानते हैं कि मेथड के लेवल पर कोई मसला नहीं है क्योकि संयुक्त राष्ट्र की सिस्टम ऑफ नेशनल अकाउंट्स के हिसाब से ही भारत जीडीपी गणना कर रहा है. संयुक्त राष्ट्र का यही ढाँचा है और मेथड के स्तर पर वह सही है. लेकिन मुद्दा यह है कि आप उस मेथड में कौन-सा डेटा इस्तेमाल कर रहे हैं. सिद्धांत में कोई समस्या नहीं है.

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रियल और नॉमिनल जीडीपी क्या है?
नॉमिनल जीडीपी हर साल की मौजूदा क़ीमतों के आधार पर बनाई जाती है. लेकिन रियल जीडीपी में क़ीमतों में हुई बढ़ोतरी यानी महंगाई के असर को अलग करना होता है. तभी आपको वास्तविक वृद्धि का पता चलता है. अगर सभी चीज़ों की क़ीमतें बहुत बढ़ जाएँ, तो जीडीपी का आंकड़ा निश्चित रूप से बहुत बड़ा दिखेगा.
लेकिन उसकी तुलना करना मुश्किल होगा. इसलिए हम एक बेस इयर लेते हैं. अभी बेस ईयर 2022-23 है. 2022-23 की क़ीमतों को आधार मानकर हर साल की जीडीपी बनाई जाती है. उसे वास्तव में रियल जीडीपी कहते हैं. नॉमिनल जीडीपी हर चालू वर्ष की क़ीमतों के हिसाब से बनती है. इसलिए नॉमिनल और रियल जीडीपी में फ़र्क़ आता है. तुलना के मक़सद से हम रियल जीडीपी का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन वास्तविक प्रस्तुति में हर साल दोनों आँकड़े दिए जाते हैं. रियल और नॉमिनल, दोनों. दोनों में मुख्य अंतर क़ीमतों का होता है.

मान लीजिए कि 2022-23 में आपकी आय 100 रुपये थी और अब वह 150 रुपये हो गई. इसमें क़ीमतों में वृद्धि का प्रभाव भी शामिल होगा. इसलिए, महंगाई को निकालकर जो आंकड़ा बचता है, उसे रियल कहा जाता है. रियल टर्म्स में वह 150 नहीं होगा; शायद 120 या 130 होगा.
यही रियल और नॉमिनल में अंतर है. अगर वास्तविक तुलना करनी है तो आपको रियल जीडीपी की तुलना करनी पड़ेगी. दोनों में ग्रोथ रेट मिलेगा. लेकिन रियल जीडीपी में ग्रोथ रेट थोड़ा कम रहेगा, जबकि नॉमिनल जीडीपी में ज़्यादा रहेगा, क्योंकि नॉमिनल में महंगाई का प्रभाव भी शामिल होता है.
मान लीजिए नॉमिनल जीडीपी 10 प्रतिशत बढ़ गई, तो रियल जीडीपी में वृद्धि शायद 7.8 प्रतिशत आएगी. क्योंकि रियल में वास्तविक वृद्धि दिखाई देती है, इसलिए वह थोड़ी कम होती है. नॉमिनल में क़ीमतों में बढ़ोतरी का असर भी जुड़ता है, इसलिए उसका आंकड़ा अधिक होता है.
जीडीपी बढ़ने का यह मतलब नहीं है कि सभी की आय बढ़ गई. जीडीपी तब भी बढ़ सकती है, जब सिर्फ़ कुछ सेक्टरों या दो-तीन बड़े उद्योगों में बहुत अधिक वृद्धि हो जाए. तब जीडीपी तो बढ़ेगी, लेकिन उस आय का प्रभाव नीचे तक पहुँचता है या नहीं, यह एक बड़ा सवाल है.
ज़्यादातर मामलों में वह नीचे तक नहीं पहुँच रहा है, क्योंकि हमारी जीडीपी ग्रोथ रेट ज़मीन की वास्तविक स्थिति में दिखाई नहीं दे रही. ग़रीबी, बेरोज़गारी, बुनियादी ढाँचा, स्वास्थ्य और शिक्षा इन क्षेत्रों में उतना विकास नहीं हो रहा है, क्योंकि आय दूसरे सेक्टर में बढ़ रही है. मुख्य रूप से चुनिंदा फॉर्मल सेक्टर में.
कहा जाता है कि यही जीडीपी की अवधारणा की बुनियादी समस्या है. जीडीपी कुल इनपुट और आउटपुट के मूल्य को मापती है. यह नहीं बताती कि प्रोडक्शन कौन कर रहा है और उससे लाभ किसे मिल रहा है.
इसलिए जीडीपी लोगों के वेलफेयर का सही मापदंड नहीं है. यह लोगों के वास्तविक वेलफेयर को नहीं मापती. इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से तुलना के लिए होता है. बहुत से लोगों का मानना है कि जीडीपी ग्रोथ को ज़रूरत से ज़्यादा महत्व नहीं दिया जाना चाहिए.
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