पटना हाई कोर्ट- सलवार उतारने का प्रयास रेप की कोशिश नहीं, टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट हुआ नाराज़

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- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
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सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाई कोर्ट के एक आदेश पर नाराज़गी जताते हुए यौन अपराधों के प्रति जजों को संवेदनशील बनाए जाने पर ज़ोर दिया है.
9 जुलाई को पटना हाई कोर्ट ने एक मामले में टिप्पणी की कि छाती दबाने और सलवार उतारने का प्रयास बलात्कार की कोशिश के दायरे में नहीं आते.
लाइव लॉ की वेबसाइट के मुताबिक़, सीनियर वकील शोभा गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट के सामने पटना हाई कोर्ट के आदेश का ज़िक्र किया.
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस वी मोहना और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच के सामने पटना हाई कोर्ट के फ़ैसले का ज़िक्र हुआ.
सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फ़ैसले का स्वत: संज्ञान लिया था.
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मार्च 2025 में अपने एक फ़ैसले में कहा था, "पीड़िता के स्तन को छूना और पायजामे की डोरी तोड़ने को बलात्कार या बलात्कार की कोशिश के मामले में नहीं गिना जा सकता है."
बाद में 26 मार्च 2025 को सुप्रीम कोर्ट में इस फ़ैसले पर रोक लगाई.
लाइव लॉ वेबसाइट के मुताबिक, सीजेआई सूर्यकांत ने फ़ैसला सुनाने से पहले पूरा रिसर्च नहीं करने पर अफ़सोस जताया और कहा कि बेंच पटना हाई कोर्ट के फ़ैसले पर एक विस्तृत आदेश पारित करेगी.
पटना हाई कोर्ट का आदेश किस मामले पर था

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यह मामला बिहार के बांका ज़िले का है. यहां अभियुक्त हिमांशु कुमार पाठक उर्फ़ मिथिया पाठक की फोटोग्राफ़ी की एक दुकान है.
19 जनवरी 2008 की शाम साढ़े चार बजे एक महिला अपने पिता के साथ स्टूडियो में फोटो खिंचाने आई थी.
हिमांशु कुमार पाठक पर आरोप है कि वो महिला को स्टूडियो के अंदर ले गया और तस्वीर खिंची लेकिन बाद में महिला के पिता से बाहर जाकर कंप्यूटर पर फ़ोटो देखने को कहा और स्टूडियो का दरवाज़ा बंद कर दिया.
हिमांशु पर आरोप है कि उसने महिला का शरीर छुआ और सलवार खोलने की कोशिश की.
इस बीच महिला ने शोर मचाया जिसके बाद महिला के पिता स्टूडियो के दरवाज़े के पास आए और दरवाज़ा खोलने की कोशिश की. लेकिन इसके बाद अभियुक्त दरवाज़ा खोलकर भाग गया. इस दौरान वहां और लोग भी जमा हो गए.
निचली अदालत का फ़ैसला

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इस मामले में नवंबर 2013 में निचली अदालत ने फ़ैसला सुनाया.
निचली अदालत ने हिमांशु को आईपीसी की धारा 376/511 और 342 के तहत दोषी करार दिया. धारा 376/511 रेप की कोशिश और धारा 342 बंधक बनाने से जुड़ी धाराएं हैं.
निचली अदालत ने अपने फ़ैसले में धारा 376/511 के तहत हिमांशु पाठक को तीन साल का कठोर कारावास और पांच हज़ार रुपये का जुर्माना लगाया था.
वहीं, धारा 342 के तहत दोषी पाए जाने पर निचली अदालत ने 6 माह की सजा सुनाई थी. ये दोनों ही सजाएं एक साथ चलनी थी.
निचली अदालत के इस फ़ैसले को हिमांशु पाठक ने पटना हाई कोर्ट में चुनौती दी थी.
हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान हिमांशु के वकीलों अजय मुखर्जी और गणेश शर्मा का तर्क था कि निचली अदालत का फ़ैसला ग़लत और अनुचित है.
साथ ही जब घटना 19 जनवरी को हुई तो एफ़आईआर 20 जनवरी को क्यों कराई गई ? वकीलों का कहना था कि एफ़आईआर में हुई देरी का ठोस कारण नहीं बताया गया.
वहीं, असिस्टेंट पब्लिक प्रॉसिक्यूटर अभय कुमार ने कहा कि अपराध के आरोप 'गंभीर प्रकृति' के हैं.
हाई कोर्ट ने क्या कहा
इस मामले में महिला, उनके माता-पिता, केस के जांच अधिकारी और एक चश्मदीद गवाह थे. हालांकि सुनवाई के दौरान चश्मदीद अपनी गवाही से पलट गया.
अपने 23 पन्ने के फ़ैसले में जस्टिस पूर्णेदु सिंह ने कहा है कि पेनिट्रेशन का सुबूत नहीं है. साथ ही ऐसा कोई स्पष्ट सुबूत नहीं है जिसे बिना किसी संदेह के बलात्कार की कोशिश माना जा सकता है. मेडिकल पुष्टि के अभाव में इस मामले में धारा 376/511 नहीं लगाई जा सकती.
हालांकि, कोर्ट ने माना कि अभियुक्त ने बल प्रयोग करके महिला को स्टूडियो में बंद किया. उसकी सलवार खोलने की कोशिश की और साथ ही उसकी छाती दबाई.
कोर्ट ने कहा, "अभियुक्त की ये हरकतें साबित करती हैं कि महिला पर आपराधिक बल का इस्तेमाल इस इरादे के साथ या कम से कम इस जानकारी के साथ किया गया था कि ऐसी हरकतों से उसकी मर्यादा को ठेस पहुंच सकती है. ऐसे में ये मामला आईपीसी की धारा 354 की ज़रूरी शर्तों को पूरा करता है."
धारा 354 महिला की लज्जा भंग करने के इरादे से उस पर हमला या आपराधिक बल प्रयोग से संबंधित है.
क्या अभियोजन पक्ष कमज़ोर रहा?

इस मामले में महिला की कोई मेडिकल जांच नहीं हुई.
कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आईपीसी की धारा 376/511 के तहत लगे आरोपों को सिद्ध करने में नाकाम साबित हुआ.
इस मामले के गवाह और इंवेस्टिगेशन ऑफ़िसर कैलाश प्रसाद ने इस केस का जिम्मा कुछ समय के लिए ही संभाला था. उन्होंने न तो गवाही रिकॉर्ड की थी और न ही फ़ाइनल चार्जशीट जमा की थी.
कोर्ट ने इस मामले में माता-पिता की गवाही को 'स्वतंत्र' नहीं माना.
वकील प्रतिमा कुमारी दलित महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा के मामलों पर काम करती हैं.
वह कहती हैं, "अभियोजन पक्ष ज़िम्मेदारी से काम नहीं करता है जिसका फ़ायदा अपराधी को होता है. अभियोजन पक्ष की ये लापरवाही दलित महिलाओं के मामले में और ज़्यादा हो जाती है. कई बार ऐसा होता है कि अपराधी बलात्कार के आरोप में दोषमुक्त हो जाता है और उसको सज़ा सिर्फ़ हत्या की ही मिलती है."
इस मामले में हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फ़ैसले को रद्द करते हुए अभियुक्त को सभी आरोपों से बरी कर दिया.
विवादित फ़ैसलों का मनोवैज्ञानिक असर

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बीते कई साल में ऐसे मामले सामने आए जब महिलाओं को लेकर दिए हाई कोर्ट के फ़ैसलों को विवादित माना गया.
साल 2021 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा था कपड़े के ऊपर से नाबालिग बच्ची के स्तन को छूना यौन उत्पीड़न नहीं है. कोर्ट का कहना था कि इसमें 'स्किन टू स्किन' कॉन्टैक्ट नहीं था.
अप्रैल 2025 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक अभियुक्त को ज़मानत देते हुए कहा था कि महिला ने ख़ुद ही मुसीबत को न्योता दिया था.
इससे पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ही अप्रैल 2025 में कहा था कि स्तन छूना और पायजामे की डोरी तोड़ना बलात्कार या बलात्कार की कोशिश के दायरे में नहीं आते.
फ़रवरी 2026 में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने कहा था कि बिना पेनिट्रेशन के इजैक्युलेशन बलात्कार नहीं है. इस फ़ैसले को लेकर भी कई लोगों में नाराज़गी थी.
इस तरह के फ़ैसलों से महिला और उसके परिवार पर क्या फर्क पड़ता है?
इस सवाल पर क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट निधि सिंह बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहती हैं, "पटना हाई कोर्ट का ये आदेश कानून व्यवस्था से जुड़े लोगों में संवेदनशीलता की कमी तो दिखाता ही है, लेकिन साथ ही ये भी दिखाता है कि महिलाओं का सम्मान, उनके अधिकार और सुरक्षा किस स्तर पर नेगोसिएबल बनती जा रही है."
"ऐसे फ़ैसलों से तो महिलाएं न्याय व्यवस्था पर अपना भरोसा खो देंगी. ये उनकी मानसिक सेहत के लिए ख़तरनाक है. किसी रेप विक्टिम के लिए काउंसलिंग का प्रावधान है, लेकिन अगर हमारी न्याय प्रणाली ही इस तरह के आदेश दे तो महिलाएं क्या करेंगी?"
'जब महिला जज ही नहीं बनेंगी तो ऐसे ही फ़ैसले आएंगे'

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पटना हाई कोर्ट की स्थापना 1916 में हुई थी.
यहां प्रैक्टिस कर रहीं एक महिला वकील नाम नहीं छापने की शर्त पर बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहती हैं, "आप हाई कोर्ट के 100 साल का इतिहास देख लीजिए. यहां बमुश्किल 10 महिला जज मिलेंगी. अब भी हाई कोर्ट में 44 जज हैं जिनमें से सिर्फ़ दो महिला जज हैं."
"इनमें से एक तेलंगाना की जबकि दूसरी स्थानीय हैं. जब आप महिलाओं को महत्वपूर्ण जगहों पर आने नहीं देंगे तो इसी तरह के असंवेदनशील आदेश आएंगे."
लोकसभा में केन्द्र सरकार की ओर से दिए गए एक जवाब के मुताबिक़, 17 मार्च 2026 तक देश भर के हाई कोर्ट में काम कर रहे कुल 803 जजों में से महज़ 113 महिलाएं हैं.
देश के दस राज्यों में सक्रिय ऑल इंडिया फे़डरेशन ऑफ वीमेन लॉयर्स की अध्यक्ष के शांता बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहती हैं, "कोर्ट के इस तरह के फ़ैसलों की दो वजहें हैं. पहला पितृसत्ता जिससे हमारे जज भी मुक्त नहीं हो पाए और दूसरा महिला जजों की संख्या."
"क्या कोई महिला जज ये कह सकती है कि सलवार उतारने का प्रयास रेप की कोशिश नहीं है? दिक़्क़त ये है कि काबिलियत होते हुए भी हमारा प्रतिनिधित्व ज्यूडिशरी में बहुत कम है. इस कम प्रतिनिधित्व के चलते ज्यूडिशरी का नुक़सान हो रहा है. क्योंकि इस तरह के फ़ैसले पूरे सिस्टम पर आम लोगों ख़ास तौर पर महिलाओं का भरोसा कम करते हैं."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.



























