बांग्लादेश: तारिक़ रहमान ने भारत के पहले मलेशिया और चीन को क्यों चुना?

    • Author, रजनीश कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान ने अपने पहले विदेशी दौरे के लिए मलेशिया और चीन को चुना.

तारिक़ रहमान 21-22 जून को मलेशिया के दौरे पर थे और 23 जून से चीन के तीन दिवसीय दौरे पर हैं.

तारिक़ रहमान को फ़रवरी महीने में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली आने के लिए न्योता भेजा था. हालाँकि रहमान ने इसके बावजूद मलेशिया और चीन को प्राथमिकता दी.

तारिक़ रहमान की पार्टी सत्ता में आने से पहले ही कह रही थी कि उसकी सरकार स्वतंत्र विदेश नीति पर चलेगी.

भारत को फ़िलहाल यात्रा कार्यक्रम में शामिल न करना सीधे तौर पर किसी संदेश के रूप में देखना भले जल्दबाज़ी होगी, लेकिन इसे कूटनीतिक संतुलन साधने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है.

अहम समझौते

मलेशिया में लगभग आठ लाख बांग्लादेशी कामगार काम करते हैं. यह संख्या वहाँ के विदेशी वर्क फ़ोर्स का क़रीब 37 फ़ीसदी है.

बांग्लादेशी कामगार मुख्य रूप से मैन्युफ़ैक्चरिंग, कंस्ट्रक्शन, प्लांटेशन और एग्रीकल्चर सेक्टर में काम करते हैं.

बांग्लादेश चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव में शामिल है.

बांग्लादेश चाहता है कि चीन इन्फ़्रास्ट्रक्चर में निवेश और बढ़ाए. चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव पर भारत की आपत्ति रही है क्योंकि यह परियोजना पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर से होकर गुज़रती है.

बांग्लादेश और चीन ने गुरुवार को 13 समझौते पर हस्ताक्षर किए.

ये समझौते व्यापार, निवेश, इन्फ़्रास्ट्रक्चर, तकनीक और अन्य रणनीतिक क्षेत्रों में द्विपक्षीय सहयोग को और मज़बूत करने की दिशा में अहम क़दम माने जा रहे हैं.

बांग्लादेश ने एक चीनी सरकारी कंपनी के साथ मोंगला में एक इकनॉमिक ज़ोन विकसित करने के लिए समझौता किया है.

यह वही भूमि है जिसे पहले एक भारतीय इकनॉमिक ज़ोन के लिए निर्धारित किया गया था.

इस क़दम को बांग्लादेश की निवेश रणनीति में एक अहम बदलाव के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि ढाका अब अधिक चीनी निवेश आकर्षित करने की दिशा में स्पष्ट रूप से आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है.

चीन और बांग्लादेश ने चार अक्तूबर 1975 को आधिकारिक तौर पर राजनयिक संबंध स्थापित किए थे.

जनवरी 1977 में ज़िया-उर रहमान यानी तारिक़ रहमान के पिता ने बांग्लादेश के चीफ़ मार्शल लॉ एडमिनिस्ट्रेटर और चीफ़ आर्मी ऑफ़ स्टाफ़ के रूप में चीन की अपनी पहली यात्रा की थी.

तारिक़ रहमान की माँ और बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री ख़ालिदा ज़िया ने चीन की कुल नौ बार यात्रा की थी, जिनमें पाँच यात्राएँ प्रधानमंत्री के रूप में थीं.

यानी तारिक़ रहमान के परिवार का चीन से शुरू से ही अच्छा संबंध रहा है. दूसरी तरफ़ भारत के साथ इस परिवार का अतीत बहुत अच्छा नहीं रहा है.

डिप्लोमैसी और घरेलू राजनीति की मजबूरियाँ

किसी भी देश के प्रधानमंत्री का पहला विदेश दौरा शायद ही कभी संयोगवश होता होगा.

दक्षिण एशिया की जियोपॉलिटिक्स पर गहरी नज़र रखने वालीं निरूपमा सुब्रमण्यम मानती हैं कि चीन के लिए यह अब बहुत मायने नहीं रखता है कि कौन नेता पहले कहाँ जा रहा है.

निरूपमा सुब्रमण्यम ने बीबीसी हिन्दी से कहा, "30 मई को म्यांमार के राष्ट्रपति मिन अंग भारत आए थे. राष्ट्रपति बनने के बाद यह उनका पहला विदेशी दौरा था. ऐसे क्या हमें ये मायने निकाल लेना चाहिए कि राष्ट्रपति मिन भारत को लेकर ज़्यादा प्रतिबद्ध हैं?"

"ऐसा मान लेना बिल्कुल ग़लत होगा क्योंकि राष्ट्रपति मिन या म्यांमार चीन पर जिस हद तक निर्भर हैं, उस स्थिति में कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि वह पहले कहाँ जाते हैं. मेरी समझ है कि चीन का कोई दबाव नहीं होता है कि पहले कहाँ जाना है क्योंकि उसे पता है कि आख़िरकार गेंद उसी के पाले में आएगी."

हालाँकि शेख़ हसीना चुनाव जीतने के बाद हमेशा पहला विदेशी दौरा भारत का करती थीं.

हसीना अगस्त 2024 में सत्ता से बेदखल होने के बाद से भारत में ही रह रही हैं. बांग्लादेश उनके प्रत्यर्पण की मांग कर रहा है.

तारिक़ रहमान को बांग्लादेश में जो जनादेश मिला है, वो शेख़ हसीना के ख़िलाफ़ है.

ऐसे में तारिक़ रहमान भी शेख़ हसीना की तरह पहला विदेशी दौरा भारत का करते तो बांग्लादेश की विपक्षी पार्टियाँ उन्हें घेरने का मौक़ा नहीं छोड़तीं.

निरूपमा सुब्रमण्यम कहती हैं, "बांग्लादेश का विपक्ष जमात-ए-इस्लामी है. जमात-ए-इस्लामी को कहीं भी मौक़ा मिलेगा, तो तारिक़ रहमान को भारत परस्त बताने में चूक नहीं करेगी. ऐसे में तारिक़ रहमान भी भारत के मामले में बहुत उत्साह दिखाने से परहेज़ करते हैं. मुझे नहीं लगता है कि चीन और भारत को लेकर बांग्लादेश के सामने कोई दुविधा की स्थिति रहती है. शेख़ हसीना के दौर में भी बांग्लादेश के चीन से बहुत गहरे संबंध थे."

संतुलन की चुनौती

बांग्लादेश के लिए भारत अहम देश है. बांग्लादेश को 'इंडिया लॉक्ड' मुल्क कहा जाता है.

दरसअल, बांग्लादेश की 94 प्रतिशत सीमा भारत से लगती है.

भारत और बांग्लादेश के बीच 4,367 किलोमीटर लंबी सीमा लगती है और यह उसकी अंतरराष्ट्रीय सीमा का 94 फ़ीसदी है.

ऐसे में तारिक़ रहमान पहला विदेशी दौरा भारत का भी करते तो गहरी सुरक्षा निर्भरता की वास्तविकताओं को स्वीकार करने के रूप में देखा जाता.

लेकिन कई बार डिप्लोमैसी में घरेलू राजनीति मजबूरियाँ भी आड़े आती हैं.

बांग्लादेश की स्वतंत्रता के तीन साल बाद शेख़ मुजीब-उर रहमान ने कहा था कि उनके देश की विदेश नीति का सिद्धांत है, "सबके साथ दोस्ती, किसी के प्रति दुर्भावना नहीं."

लेकिन बांग्लादेश की घरेलू राजनीति में शेख़ मुजीब और उनकी बेटी शेख़ हसीना पर भारत के प्रति ज़्यादा झुकाव रखने का आरोप लगता रहा है.

इसके बावजूद बांग्लादेश ने विकसित देशों और ग्लोबल साउथ दोनों के साथ महत्वपूर्ण संबंध बनाए और प्रतिद्वंद्वी शक्तियों जैसे अमेरिका और रूस के साथ भी संतुलित संबंध बनाए रखने की कोशिश की है.

लेकिन भारत और पाकिस्तान के मामले में बांग्लादेश की यह नीति ज़्यादा चुनौतीपूर्ण हो जाती है.

शेख़ हसीना के दौर में बांग्लादेश भारत के क़रीब दिखता है जबकि ज़िया-उर रहमान और ख़ालिदा ज़िया के शासन में बांग्लादेश की सहानुभूति पाकिस्तान के साथ भी रही है.

भारतीय मीडिया पर निशाना

चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी का मुखपत्र माने जाने वाले अंग्रेज़ी दैनिक ग्लोबल टाइम्स ने तारिक़ रहमान के दौरे पर संपादकीय लिखा है.

ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है, "चीन 16 वर्षों से लगातार बांग्लादेश का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बना हुआ है. बांग्लादेश में लगभग 1,000 चीनी कंपनियाँ काम कर रही हैं, जिन्होंने कुल मिलाकर कई लाख रोज़गार पैदा किए हैं."

"भारतीय मीडिया के कुछ वर्ग इस बात से असहज दिख रहे हैं कि बांग्लादेशी नेता की पहली विदेश यात्रा में भारत शामिल नहीं है. कुछ भारतीय टिप्पणीकारों ने कहा कि तारिक़ रहमान पद संभालने के बाद अपनी पहली विदेश यात्रा में भारत को नज़रअंदाज करते हुए चीन जा रहे हैं और इस बात पर निराशा जताई कि बांग्लादेश ने भारत के साथ संबंधों को प्राथमिकता नहीं दी."

ग्लोबल टाइम्स ने आगे लिखा है, "इन आलोचनात्मक टिप्पणियों के पीछे कुछ लोगों की 'बिग ब्रदर मानसिकता' भी देखी जा सकती है. इस सोच के तहत पड़ोसी देशों के नेता की पहली विदेश यात्रा को क्षेत्रीय शक्ति के प्रति सम्मान या प्राथमिकता के संकेत के रूप में देखा जाता है. जब कोई देश स्वतंत्र कूटनीतिक निर्णय लेता है, तो उसे कुछ लोग अपने प्रति असम्मान या चुनौती के रूप में लेते हैं."

अमेरिका में बांग्लादेश के राजदूत रहे हुमायूँ कबीर ने ढाका से प्रकाशित होने वाले अंग्रेज़ी दैनिक डेली स्टार में एक आर्टिकल लिखा है, जिसका शीर्षक है- तारिक़ रहमान के चीन दौरे के पीछे के वास्तविक सवाल.

चीन का दौरा क्यों?

हुमायूं कबीर ने लिखा है, "प्रधानमंत्री की बीजिंग यात्रा ने कई रणनीतिक अटकलों को जन्म दिया है. लेकिन मेरी समझ में इस यात्रा के पीछे कोई बड़ा भू-राजनीतिक नाटकीय कारण नहीं, बल्कि उससे कहीं अधिक व्यावहारिक और तात्कालिक वजह है. हमारी घरेलू मजबूरियाँ. असल में किसी भी देश की विदेश नीति को सबसे ज़्यादा उसकी आंतरिक ज़रूरतें आकार देती हैं और हमारे मामले में ये ज़रूरतें रणनीतिक से पहले आर्थिक हैं."

हुमायूं कबीर ने लिखा है, "ढाका की प्राथमिकताएँ तीन प्रमुख ज़रूरतों से तय हो रही हैं. पहली ज़रूरत है वित्तीय सहायता. अर्थव्यवस्था कमज़ोर स्थिति में है और ऐसी परिस्थिति में कोई भी सरकार अपने क़रीबी साझेदारों की ओर देखती है. इस संदर्भ में हालिया इतिहास काफ़ी महत्वपूर्ण है."

"2024 में तत्कालीन प्रधानमंत्री चीन गई थीं और वहाँ लगभग पाँच अरब डॉलर की मदद मांगी थी. लेकिन चीन ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया. उसके अनुसार, उस समय की आर्थिक परिस्थितियाँ इस तरह की सहायता को उचित नहीं ठहराती थीं. नतीजतन वह यात्रा अपेक्षाकृत निराशाजनक रही थी."

हुमायूं कबीर ने लिखा है, "निष्कर्ष यह नहीं है कि बांग्लादेश चीन की ओर झुक रहा है या उससे दूर जा रहा है. असल ज़रूरत यह है कि हमें विदेशी मदद हासिल करने और उसका प्रभावी उपयोग करने की अपनी क्षमता को तेज़ी से मज़बूत करना होगा. इसके लिए सार्थक सुधारों और मज़बूत संस्थाओं की ज़रूरत है. जब तक घरेलू स्तर पर यह तैयारी नहीं होगी, तब तक कोई भी समझौता चाहे वह चीन, भारत या अमेरिका के साथ हो, अपनी पूरी क्षमता के हिसाब से नतीजा नहीं दे पाएगा."

तारिक़ रहमान के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत से संबंधों में क्या भरोसा लौट पाया है?

इस सवाल के जवाब में निरूपमा सुब्रमण्यम कहती हैं, "मोहम्मद यूनुस के वक़्त में जो रेटोरिक था, वह अब नहीं है लेकिन संबंधों में अब भी कई ऐसे मसले हैं, जिन्हें सुलझाना बाक़ी है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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