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ईरान से अमेरिकी प्रतिबंध हटने का फ़ायदा भारत को कितना होगा?
भारत पिछले कुछ महीनों से दूसरों के युद्ध की क़ीमत चुका रहा है.
28 फ़रवरी को जब इसराइल और अमेरिका ने ईरान पर हमला किया तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर गंभीर सवाल उठने लगे.
अमेरिका के दबाव में भारत को कई नीतियां बदलनी पड़ीं. होर्मुज़ स्ट्रेट से ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने के कारण भारत को कई स्तरों पर संघर्ष करना पड़ा. दरअसल अमेरिका का भारी दबाव था कि भारत कहाँ से तेल ख़रीदे और कहाँ से नहीं.
भारत कच्चा तेल, एलएनजी और एलपीजी के लिए आयात पर निर्भर है. ईरान युद्ध ने हाल के महीनों में इन तीनों ईंधनों की क़ीमतों में भारी बढ़ोतरी की है.
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक, चौथा सबसे बड़ा एलएनजी आयातक और दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी आयातक है. घरेलू ऊर्जा उद्योग की बात करें तो भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा रिफाइनर और पांचवां सबसे बड़ा रिफाइंड पेट्रोलियम निर्यातक है.
हाल तक भारत के ज़्यादातर ऊर्जा आयात हॉर्मुज़ के रास्ते रूस से आते थे जबकि रिफाइंड उत्पादों का निर्यात भी इसी मार्ग से होता था.
जब होर्मुज़ पूरी तरह संचालन में था, तब भारत के लगभग 45 प्रतिशत कच्चे तेल, 50 प्रतिशत एलएनजी और 90 प्रतिशत एलपीजी आयात इसी रास्ते से गुज़रते थे.
भारत पहले ईरान के तेल पर काफ़ी निर्भर था. हालांकि हाल के वर्षों में ईरानी ऊर्जा पर कड़े प्रतिबंधों के कारण उसने अपनी निर्भरता मध्य-पूर्व के अन्य देशों इराक़, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत की ओर बढ़ा दी.
भारत की ज़्यादातर एलएनजी आपूर्ति क़तर, यूएई और ओमान से होती थी जबकि एलपीजी की आपूर्ति मुख्य रूप से यूएई, क़तर, कुवैत, सऊदी अरब और ओमान से होती थी.
प्रतिबंध के बावजूद मुश्किलें
2022 के बाद से भारत ने रूस पर भी ऊर्जा आपूर्ति के लिए काफ़ी निर्भरता बढ़ाई थी. हालांकि मॉस्को पर अमेरिकी प्रतिबंधों और पिछले साल राष्ट्रपति ट्रंप की टैरिफ़ धमकियों ने भारत को रूस के साथ ऊर्जा संबंध पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर किया.
मार्च में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ के अचानक बंद होने के बाद भारत को वैकल्पिक ऊर्जा आपूर्ति की व्यवस्था के लिए तेज़ी से क़दम उठाने पड़े.
अब अमेरिका ने ईरान से ऊर्जा आयात पर 60 दिनों की छूट दी है. ऐसे में भारत पर इसका क्या असर पड़ेगा?
एनर्जी इंटेलिजेंस ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''भारतीय रिफाइनर, सरकारी अधिकारी और मार्केट एनालिस्ट मानते हैं कि इस छूट से भारत को सीधे तौर पर बहुत ज़्यादा ईरानी क्रूड नहीं मिलेगा. इसके मुख्य कारण हैं, ईरानी तेल के लिए दूसरे ख़रीदारों से कड़ी प्रतिस्पर्धा और ईरान से जुड़ी भुगतान के साथ प्रतिबंध जोखिमों को लेकर भारतीय कंपनियों की सावधानी हैं.''
''इसके बजाय उम्मीद यह है कि इस क़दम से वैश्विक तेल बाज़ार में आपूर्ति अपेक्षाकृत सहज होगी, जिससे भारत को अप्रत्यक्ष लाभ मिल सकता है, जैसे कुछ कम क़ीमतें या बेहतर विकल्प. कच्चे तेल की तुलना में एलपीजी के मामले में भारत ईरान से ज़्यादा उम्मीद करेगा क्योंकि भारत को एलपीजी की ज़्यादा ज़रूरत है.''
मार्च की शुरुआत में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ बाधित होने से पहले भारत के कच्चे तेल आयात का 45 प्रतिशत, एलएनजी आयात का आधा और एलपीजी आयात का 90 प्रतिशत इसी रास्ते से आता था.
भारत ऐतिहासिक रूप से ईरानी तेल का ख़रीदार रहा है. लेकिन 2019 में ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध दोबारा लागू किए जाने के बाद भारत ने इराक़, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत से तेल ख़रीद बढ़ा दी थी.
एक विकल्प रूस हो सकता था लेकिन अमेरिकी टैरिफ और प्रतिबंधों ने इसे लंबी अवधि के समाधान के रूप में मुश्किल बना दिया है.
भारत-ईरान संबंधों पर अमेरिकी दबाव
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद जी-7 के प्राइस कैप के तहत भारत के कुल तेल आयात में रूसी तेल की हिस्सेदारी अप्रैल 2022 से सितंबर 2025 के बीच बढ़कर 33 प्रतिशत से अधिक हो गई थी.
बाइडन प्रशासन और यूरोपीय संघ ने भारत की ओर से रियायती रूसी कच्चे तेल की ख़रीद का समर्थन किया था ताकि वैश्विक तेल क़ीमतों में अस्थिरता सीमित रहे और रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों की कमी न हो.
हालांकि ट्रंप प्रशासन की रेसिप्रोकल टैरिफ़ पॉलिसी के तहत भारतीय सामानों पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ़ लगाया गया. फ़रवरी 2026 में द्विपक्षीय व्यापार समझौते के तहत इसे घटाकर 18 प्रतिशत किया गया. इसके बदले भारत ने रूस पर ऊर्जा निर्भरता कम करने और अमेरिका से ऊर्जा ख़रीद बढ़ाने का वादा किया.
ईरान भारत के लिए अहम देश है. मध्य एशिया में पहुँच के लिए ईरान भारत को रूट देता है और चाबहार पोर्ट को भी इसी पहुँच को मज़बूत करने के रूप में देखा जाता है. लेकिन ईरान से संबंध अमेरिका के कैसे हैं, इसका सीधा असर भारत के साथ संबंधों पर पड़ता है.
अगर ईरान और अमेरिका के संबंधों में तनातनी रहती है तो भारत और ईरान के संबंधों में गर्मजोशी नहीं रह पाती है.
ईरान को लेकर भारत की विदेश नीति
मिडिल ईस्ट इंस्टिट्यूट ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है, ''1947 में स्वतंत्रता के बाद भारत की विदेश नीति को तीन चरणों में बाँटा जा सकता है. पहला चरण, यानी 1947 से 1990 तक, भारत की विदेश नीति पर नेहरूवाद का प्रभाव था. इस दौर में भारत ने महाशक्तियों के साथ गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाई और तीसरी दुनिया के देशों के साथ सहयोग को प्राथमिकता दी.''
''दूसरा चरण, यानी 1991 से 2001 तक, नवउदारवादी विचारधारा और आर्थिक सुधार प्राथमिकता बन गए. इस दौर में भारत के मुख्य उद्देश्य उन्नत तकनीक हासिल करना, पड़ोसी देशों के साथ राजनीतिक विवाद सुलझाना और वैश्वीकरण की प्रक्रिया को तेज़ करना था.
तीसरा चरण, यानी 2001 से अब तक, भारत की विदेश नीति का फोकस अर्थव्यवस्था से हटकर सुरक्षा पर अधिक केंद्रित हो गया है. सैन्य शक्ति और रक्षा क्षमताओं की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो गई है. भारत महाशक्तियों के साथ गहरे संबंध, वैश्विक मामलों में अधिक प्रभाव और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता भी चाहता है.''
ईरान कई कारणों से भारत को महत्वपूर्ण मानता है. पहला, भारत की तरह ईरान भी एक एशियाई देश है और दोनों के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध हैं.
भारत की विदेश नीति कई मामलों में ईरान से मेल खाती है. दोनों अमेरिका की एकतरफा नीतियों और एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था का विरोध करते रहे हैं.
मिडिल ईस्ट इंस्टिट्यूट ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है, ''हालांकि, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण भारत को ईरानी तेल निर्यात में गिरावट आई. 2013 के पहले सात महीनों में भारत का ईरान से कच्चे तेल का आयात पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 46 प्रतिशत गिर गया था. चूंकि ईरान को भुगतान डॉलर के बजाय रुपये में किया जा रहा था. ऐसे में भारत 2013-14 वित्त वर्ष में 8.5 अरब डॉलर तक बचा सकता था, अगर भारत पहले जैसी मात्रा में ईरानी तेल आयात जारी रख पाता.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.