राजनीति में कभी नहीं जाऊंगाः तेंदुलकर

सचिन तेंडुलकर
    • Author, निकेश रुघानी
    • पदनाम, बीबीसी एशियन नेटवर्क
  • प्रकाशित

करीब एक हफ़्ते पहले सचिन तेंदुलकर की आत्मकथा जारी होने के बाद क्रिकेट जगत में हलचल मच गई थी.

ख़ासतौर पर ग्रेग चैपल को लेकर उनकी किताब के हिस्से पर काफ़ी प्रतिक्रियाएं सामने आईं- भारत से भी और ऑस्ट्रेलिया से भी.

बीबीसी एशियन नेटवर्क के निकेश रुघानी ने सचिन तेंदुलकर से किताब लिखने, इसके समय और क्रिकेट को लेकर बात की.

पढ़िए निकेश रुघानी से सचिन तेंदुलकर की पूरी बातचीत

किताब प्रकाशित होने के बाद, अपनी कहानी लोगों को बताने के बाद, अब कैसा लग रहा है?

सचिन तेंडुलकर

यह एक मुश्किल काम था. मुझे नहीं पता था कि इसमें इतना समय देना पड़ेगा. मुझे पता था कि जीवन में जो भी हुआ है उसे याद करना आसान नहीं होगा इसके लिए विशेष प्रयास करने पड़ेंगे.

मैंने कोशिश की है कि इस सब को सामने रखने में जितना हो सके ईमानदार रहूं. खेल के दिनों में मैं ज़्यादा बोलता नहीं था क्योंकि मैं चाहता था कि खेल पर ही ध्यान रखूं.

मैं सुर्खियों में आने के लिए बयानबाज़ी करने के बजाय अपने खेल से सुर्खियों में आना चाहता था. तो अब एक तरीका यह था कि सब कुछ सामने रखा जाए.

क्या आप ग्रेग चैपल के कार्यकाल को भारतीय क्रिकेट का सबसे ख़राब समय कहेंगे?

हमने बहुत से मैच खेले. इनमें से कुछ काफ़ी निराशाजनक भी थे, लेकिन यह खेल का हिस्सा है. लेकिन खराब मैच के बाद भी ड्रेसिंग रूम का माहौल ऐसा होना चाहिए कि अगले मैच की तैयारी की जा सके.

सचिन तेंडुलकर

लेकिन उनका सोचने का तरीका अलग था और हमारा अलग. ड्रेसिंग रूम में कई खिलाड़ी उनके काम करने के तरीके से असहज महसूस करते थे.

मेरा हमेशा से मानना रहा है कि अच्छा कोच बनने के लिए आपको दोस्त बनना होता है. अगर आप अपने कोच पर विश्वास कर सकते हैं, अगर आपको भरोसा होता है कि जो बात आप उससे कर रहे हैं वह आप दोनों के बीच ही रहेगी, तो इसके सकारात्मक परिणाम आते हैं.

मुझे महसूस हुआ कि इस क्षेत्र में वह कमज़ोर साबित हुए और जहां तक खेल का लुत्फ़ लेने का सवाल है वह वक्त क्रिकेट में कई सालों के दौरान सबसे ख़राब वक्त था.

अब बात करते हैं विश्वकप की, जिसे जीतना आपके जीवन का महत्वपूर्ण क्षण था. धोनी की टीम क्या अपने खिताब को बचा पाएगी?

सचिन तेंडुलकर, धोनी

आपने यह बहुत अच्छी बात कही है. जिन लोगों को ग्रेग चैपल बाहर करना चाहते थे, उन्हीं खिलाड़ियों ने चार साल बाद विश्व कप जीता. इसलिए आपको सोचना चाहिए कि उस वक्त वह (चैपल) क्या सोच रहे थे.

एम एस धोनी की कप्तानी में टीम बहुत शानदार लग रही है. हमने वन डे में कुछ जीत हासिल की हैं और हम उसे जारी रखना चाहेंगे.

और मैं इसलिए कह रहा हूं कि मानसिक रूप से मैं टीम के साथ ही हूं, चाहे वह अच्छे दौर से गुज़र रही हो या ख़राब दौर से.

क्या भारतीय टेस्ट क्रिकेट का भविष्य खतरे में है?

वन डे में हम नंबर वन हैं, इसका मतलब यह है कि हम अच्छा क्रिकेट खेल रहे हैं. लेकिन विदेश में टेस्ट मैचों में दिक्कत आ रही है. हम दक्षिण अफ़्रीका और न्यूज़ीलैंड में टेस्ट मैच करीब-करीब जीत ही गए थे.

सचिन तेंडुलकर

इंग्लैंड का दौरा मुश्किल था. हम दूसरा टेस्ट मैच जीते और तीसरे टेस्ट मैच में जो निर्णायक साबित हुआ, दिक्कत हमारी फ़ील्डिंग में थी. कई महत्वपूर्ण कैच छूट गए और मुझे लगा कि कई फ़ैसले हमारे ख़िलाफ़ गए. उसके बाद इंग्लैंड ने बेहतरीन खेल का प्रदर्शन किया और उसका श्रेय उसे मिलना चाहिए.

मुझे लगता है कि इंग्लैंड जाने से पहले हम दक्षिण अफ़्रीका और न्यूज़ीलैंड में जीत के करीब पहुंच गए थे. यानी कुछ चीज़ें सकारात्मक भी हैं.

हमें बस अच्छा करना होगा और लगातार करना होगा. क्योंकि टेस्ट क्रिकेट का मतलब ही है पांच दिन तक अच्छा खेलना, एक-आध सेशन में नहीं.

भविष्य की क्या योजनाएं हैं? कमेंट्री, कोचिंग या राजनीति?

जो खिलाड़ी होता है वह हमेशा खिलाड़ी रहता है, इसलिए राजनीति नहीं.

सचिन तेंडुलकर

जहां तक कोचिंग का सवाल है तो मैं अपनी टीम के खिलाड़ियों से संपर्क में हूं. जब भी उन्हें कोई बात पूछनी होती है, सलाह लेनी होती है तो वह मुझसे बात करते हैं और जब मुझे कोई ऐसी चीज़ दिखती है जिसे उन्हें बताया जाना चाहिए तो मैं बात करता हूं.

मेरे लिए महत्वपूर्ण यह है कि मैं क्या करता हूं, यह नहीं कि मैं कहां बैठता हूं. तो चाहे मैं आधिकारिक रूप से कोच बनूं न बनूं मैं जो कर सकता हूं कर रहा हूं.

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