पाक: 'फांसी देकर कब तक मूर्ख बनाएंगे'

pakistan jail-epa
    • Author, अखिल रंजन
    • पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग
  • प्रकाशित

पाकिस्तान में आजकल मौत की सज़ा पाए लोगों को धड़ाधड़ फांसी दी जा रही है जिस पर अब कई सवाल उठने लगे हैं.

मंगलवार को पंजाब और सिंध की अलग-अलग जेलों में 12 क़ैदियों को फांसी दी गई.

मौत की सज़ा पर लगी रोक हटने के बाद से पाकिस्तान में पिछले तीन महीने में अब तक 39 लोगों को फांसी दी जा चुकी है, और आने वाले दो-चार दिनों में और लोंगो को दी जा सकती है.

अब रोक नहीं

students' photos who died in peshawar-epa

वर्ष 2008 से पाकिस्तान में मौत की सज़ा पर रोक लगी हुई थी, लेकिन पिछले साल 16 दिसंबर को पेशावर के आर्मी स्कूल पर हुए चरमपंथी हमले के बाद चरमपंथी मामलों में मिली फांसी की सज़ा पर रोक को हटा लिया गया .

लेकिन पिछले हफ़्ते फांसी की सज़ा पर लगी रोक को पूरी तरह से ख़त्म कर दिया गया.

यानी अब पाकिस्तान में किसी भी मामले में मौत की सज़ा पाए अभियुक्त को फांसी दी जा सकती है, बशर्ते उनकी दया याचिका राष्ट्रपति ने ख़ारिज़ कर दी हो.

मीडिया और जनता का विरोध

church in pakistan-afp

सरकार के इस फ़ैसले की आलोचना करते हुए अंग्रेज़ी दैनिक डेली टाइम्स मंगलवार को अपने सम्पादकीय में लिखता है, "हालांकि आतंक के मामले में फांसी को लोगों ने एक हद तक स्वीकार लिया था, लेकिन अपर्याप्त सबूत, मजबूरी में दिया गया इकबालिया बयान और आपराधिक न्याय प्रणाली में मौजूद खामियों के बावजूद सभी तरह के मामलों में फांसी देना ठीक नहीं है."

मंगलवार को फांसी पर लटकाए गए 12 कैदियों में से कोई भी चरमपंथ के मामले में दोषी नहीं था.

कुछ इसी तरफ़ इशारा करती हुए इस्लामाबाद में रहने वाली नीलोफ़र अफ़रीदी क़ाज़ी ट्विटर पर लिखती हैं, "कोई मूर्ख ही मानेगा कि फाँसी आतंकवाद का हल है, आख़िर कितनी देर लोगों को मूर्ख बनाते रहोगे?"

prison in peshawar-afp

एक और अख़बार द नेशन ने अपने सम्पादकीय में सरकार के इस कदम को 'अन्याय का एक और रूप' बताते हुए लिखा है, "अच्छी तरह विचार-विमर्श के बाद एक नीतिगत निर्णय लेने के बजाय सैन्य अदालतों की स्थापना और मौत की सजा पर लगी रोक हटाना एक भयानक त्रासदी के सामने घुटने टेक देने जैसा है".

न्याय प्रणाली पर सवाल

लाहौर में एक चर्च पर हुए हालिया आत्मघाती हमले, फिर गुस्साई भीड़ का दो लोगों के ज़िंदा जलाना और उसके बाद से फैली बदअमनी के माहौल में उठाए गए इस क़दम पर दुःख जताते हुए टीवी पत्रकार निदा एफ. समीर ने ट्विटर पर लिखा है, "क्या हम सभी को इस वक़्त वैसा ही नहीं महसूस करना चाहिए जैसा कि फांसी पर चढ़ाए गए, ज़िंदा जला दिए गए और ब्लास्ट में मारे गए लोगों ने किया होगा."

वहीं इस तरह हो रही फाँसियों पर नाराज़गी दिखाते हुए फ़ातिमा भुट्टो लिखती हैं कि मौत की सज़ा पर ख़ुश हो रहे लोगों को शायद पता नहीं कि "पाकिस्तान की अदालतों में भ्रष्टाचार और राजनैतिक हस्तक्षेप" किस हद तक व्याप्त है.

इस बीच, पाकिस्तान में शफकत हुसैन नामक एक युवक को बचाने की क़वायद भी तेज़ हो गई है जिसे ग्यारह साल पहले एक 7 साल की बच्ची के साथ बलात्कार के आरोप में 19 मार्च को फाँसी दी जानी है.

लेकिन मुख्य धारा की मीडिया के साथ-साथ सोशल मीडिया में भी लोग उस पर 'जुवेनाइल जस्टिस प्रणाली' के तहत मुक़दमा चलाने मांग कर रहे है क्योंकि 2004 में जब उसे फाँसी की सज़ा दी गई थी, तब शफ़कत केवल 14 साल का था.

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